हरियाणा में अतिथि शिक्षकों का फूटा गुस्सा, शिक्षा मंत्री के घर के बाहर प्रदर्शन
हरियाणा के शिक्षा विभाग में सेवारत अतिथि शिक्षकों का गुस्सा आखिरकार सड़क पर आ गया है। राज्यभर के गेस्ट टीचर्स अपनी लंबित पड़ी मांगों और पक्की नौकरी की मांग को लेकर बुधवार को पानीपत में शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा के आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। प्रदर्शनकारी शिक्षकों का साफ कहना है कि जब तक सरकार उनकी सेवाओं को नियमित करने का स्पष्ट ऐलान नहीं करती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। मंत्री के आवास के बाहर भारी संख्या में शिक्षकों के जुटने से प्रशासनिक अमले में भी हलचल तेज हो गई है।
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब सरकार की ओर से हाल ही में नए सेवा नियमों की अधिसूचना जारी की गई। इन नियमों से राहत मिलने के बजाय शिक्षकों की नाराजगी और अधिक बढ़ गई है। शिक्षकों का तर्क है कि वे लंबे समय से अपनी अनिश्चित नौकरियों को स्थायी कराने के लिए कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन सरकार ने जो प्रावधान किए हैं वे उनकी उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत हैं।
मौजूदा हालात को देखते हुए शिक्षा विभाग के अधिकारी और मंत्री का स्थानीय स्टाफ आंदोलनरत शिक्षकों से बातचीत करने का प्रयास कर रहा है, हालांकि शुरुआती दौर की वार्ताओं में कोई ठोस नतीजा निकलता नजर नहीं आ रहा है। शिक्षक संगठन अपनी पुरानी और अडिग मांग पर कायम हैं कि उन्हें किसी भी हाल में सेवा नियम-2026 के दायरे में नहीं, बल्कि कोर्ट के पुराने फैसलों के आधार पर पक्का किया जाए।
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क्या हैं नए हरियाणा अतिथि सेवा नियम-2026, जिन पर मचा है बवाल
बीते मंगलवार को ही प्रदेश सरकार की तरफ से 'हरियाणा अतिथि सेवा नियम-2026' की आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई थी। इन नए नियमों में अतिथि शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की आयु 58 वर्ष तय की गई है। इसके अलावा महिला और एकल पुरुष अतिथि शिक्षकों के लिए पूरी सेवा अवधि के दौरान बिना वेतन के 730 दिनों के बाल देखभाल अवकाश यानी चाइल्ड केयर लीव का प्रावधान भी जोड़ा गया है। सरकार का तर्क था कि इन नियमों से शिक्षकों को एक निश्चित सुरक्षा मिलेगी और उन्हें अचानक नौकरी से हटाने जैसी अनिश्चितताओं का सामना नहीं करना पड़ेगा।
अधिसूचना के अनुसार, जिस महीने संबंधित गेस्ट टीचर की उम्र 58 वर्ष पूरी होगी, उसी महीने के आखिरी दिन उनकी सेवा समाप्त मानी जाएगी। इसके साथ ही पुरुष अतिथि शिक्षकों के लिए भी दो जीवित बच्चों तक की शर्त के साथ 15 दिन के पितृत्व अवकाश का नियम बनाया गया है, जिसे प्रसव से छह महीने के भीतर लिया जा सकता है। सरकार का मानना था कि इन सुविधाओं से शिक्षकों की नौकरी में एक स्थिरता आएगी और प्रशासनिक कार्यप्रणाली भी नियमित शिक्षकों के जैसी अनुशासित हो सकेगी।
हालांकि, इन तमाम लुभावने प्रावधानों के बावजूद शिक्षक संगठनों ने इन नियमों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि जब तक उनकी मूल मांग यानी बिना शर्त सेवा नियमितीकरण का लाभ नहीं मिलता, तब तक इस तरह के नियम उनके किसी काम के नहीं हैं। शिक्षकों का आरोप है कि सरकार उन्हें सिर्फ उलझाने का प्रयास कर रही है, जबकि वे वर्षों से अपनी मेहनत का पूरा हक मांग रहे हैं।
अदालती फैसलों का हवाला देकर पक्की नौकरी की जिद पर अड़े शिक्षक
गेस्ट टीचर्स एसोसिएशन के नेताओं का कहना है कि वे न्यायपालिका के पुराने और स्पष्ट आदेशों के क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं। संगठन के मीडिया प्रभारी डॉ. अजय लोहान ने मीडिया से बातचीत में दो टूक शब्दों में कहा कि सरकार ने अदालती फैसलों को लागू करने के बजाय जो नए सेवा नियम थोपे हैं, वे उनकी मूल मांग का हिस्सा कभी थे ही नहीं। प्रदेशभर के करीब बारह हजार अतिथि शिक्षकों की सिर्फ एक ही मुख्य और स्पष्ट मांग है कि उन्हें अदालत के फैसलों के अनुरूप तुरंत प्रभाव से पक्का किया जाए।
"प्रदेश सरकार ने कोर्ट का फैसला लागू करने के बजाय जो सेवा नियम बनाए हैं, ये हमारी मांग ही नहीं थी। 12 हजार गेस्ट टीचर्स की एक ही मांग है कि कोर्ट का फैसला लागू करके पक्का किया जाए। इससे कम कुछ भी मंजूर नहीं है।"— डॉ. अजय लोहान, मीडिया प्रभारी, हरियाणा गेस्ट टीचर्स एसोसिएशन
संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों का यह भी कहना है कि नए नियमों में ईपीएफ, वेतन में सम्मानजनक बढ़ोतरी, मेडिकल लीव या नियमितीकरण की प्रक्रिया को लेकर किसी भी प्रकार का कोई संतोषजनक जिक्र नहीं किया गया है। यही वजह है कि शिक्षकों में सरकार के प्रति भारी रोष व्याप्त है और वे धरने पर बैठने के लिए मजबूर हुए हैं। उनका मानना है कि इतने लंबे सेवाकाल के बाद भी उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का वह अधिकार नहीं मिल रहा है जिसके वे असल हकदार हैं।
दंड के प्रावधानों और वेतन विसंगतियों पर भी भड़के अतिथि शिक्षक
नए सेवा नियमों में केवल फायदों का ही जिक्र नहीं है, बल्कि इसमें शिक्षकों के लिए कड़े प्रशासनिक और अनुशासनात्मक दंड के प्रावधान भी जोड़े गए हैं। नए नियमों के मुताबिक अब अतिथि शिक्षकों पर भी नियमित शिक्षकों की तरह ही नियुक्ति एवं दंड प्राधिकारी के सभी नियम समान रूप से लागू होंगे। यदि किसी शिक्षक की तरफ से कार्य में कोई गंभीर लापरवाही बरती जाती है या विभागीय आदेशों का उल्लंघन होता है, तो उसके सर्विस रिकॉर्ड में चेतावनी या निंदा दर्ज की जा सकती है। इतना ही नहीं, लापरवाही से हुए किसी भी वित्तीय या अन्य नुकसान की भरपाई सीधे तौर पर उनके वेतन से वसूली के रूप में की जा सकती है।
शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग इन दंडात्मक प्रावधानों को लेकर खासे गुस्से में है। उनका तर्क है कि जब सरकार उन्हें नियमित कर्मचारियों की तरह पूर्ण सेवा सुरक्षा और वेतनमान नहीं दे रही है, तो उन पर नियमित शिक्षकों वाले कड़े अनुशासन और दंड के नियम थोपना पूरी तरह से अनुचित है। वे लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि अल्प मानदेय पर काम करने वाले शिक्षकों से इस तरह की दंडात्मक शर्तें जोड़ना उनके साथ सरासर अन्याय है।
लगातार बढ़ता जा रहा है विरोध प्रदर्शन, आगे क्या होगी रणनीति
अतिथि शिक्षकों का यह आंदोलन केवल पानीपत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी आंच पूरे हरियाणा में फैलती नजर आ रही है। राज्य कार्यकारिणी के सदस्य मेवा सिंह पिलानिया, बलजीत सिंह ढिल्लों और कुलदीप कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी आवाज को पूरी तरह से सुना नहीं जाता, उनका संघर्ष ऐसे ही जारी रहेगा। इससे पहले भी नियमितीकरण की मांग को लेकर जून महीने से लगातार लघु सचिवालयों के बाहर विरोध और अनिश्चितकालीन धरने का दौर चल रहा है।
राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में भी इस प्रदर्शन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्ष ने भी सरकार के इन नए नियमों को लेकर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार और शिक्षा विभाग इन नाराज शिक्षकों को मनाने के लिए क्या नया कदम उठाते हैं या फिर यह विरोध प्रदर्शन आने वाले दिनों में और अधिक उग्र रूप धारण करता है। शिक्षकों की जिद साफ है कि वे इस बार बिना मुकम्मल समाधान के पीछे हटने वाले नहीं हैं।

