ट्रेन के डिब्बों में बिजली का रहस्य: आखिर कहां से मिलती है निरंतर ऊर्जा
जब हम भारतीय रेलवे की किसी ट्रेन में सफर करते हैं, तो हमारे मन में कई तरह के सवाल आते हैं। खासकर जब हम रात के वक्त किसी लंबी दूरी की ट्रेन में होते हैं, तब डिब्बे के अंदर जलने वाली रोशनी, पंखों की हवा और एसी की ठंडक हमें हमेशा मिलती रहती है। यहां तक कि जब ट्रेन किसी सुनसान स्टेशन पर या मुख्य सिग्नल पर घंटों रुकी रहती है, तब भी बोगियों की बत्तियां नहीं बुझतीं। एक आम मुसाफिर के लिए इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है कि आखिर इस विशालकाय ट्रेन में इतनी भारी मात्रा में बिजली कहां से आ रही है। क्या हर डिब्बे के नीचे कोई बहुत बड़ा बैटरी बैंक छिपा होता है, या फिर इसके पीछे कोई दूसरा तकनीकी विज्ञान काम करता है?
दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली इन सुविधाओं के पीछे रेलवे का एक बेहद जटिल और सुरक्षित इलेक्ट्रिकल सिस्टम काम करता है। ट्रेन चाहे राजधानी एक्सप्रेस जैसी हाई-स्पीड गाड़ी हो, वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेन हो या फिर आम दिनों की पैसेंजर ट्रेन, हर एक में बिजली पहुंचाने का तरीका उसकी बनावट और इंजन के प्रकार पर निर्भर करता है। रेलवे के जानकारों और लोको पायलटों के मुताबिक, ट्रेन में लाइट और चार्जिंग पॉइंट्स के लिए बिजली ओवरहेड तारों, जनरेटर कारों और कोच के नीचे लगी बैटरियों के संयुक्त तालमेल से आती है। आइए आज इस दिलचस्प विषय को बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं और जानते हैं कि पटरी पर दौड़ने वाली इन गाड़ियों का इलेक्ट्रिकल आर्किटेक्चर कैसे काम करता है।
संबंधित खबरें
इलेक्ट्रिक ट्रेनों का हाई-वोल्टेज नेटवर्क और पेंटोग्राफ की भूमिका
आज के समय में भारतीय रेलवे का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से विद्युतीकृत हो चुका है। अधिकतर एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनें इलेक्ट्रिक इंजनों द्वारा ही संचालित की जाती हैं। इन ट्रेनों में बिजली की मुख्य सप्लाई पावर ग्रिड से आती है, जो रेलवे के सब-स्टेशन तक पहुंचती है। इसके बाद यह बिजली पटरियों के ठीक ऊपर बिछाए गए हाई-टेंशन ओवरहेड वायर (OHE) में दौड़ती रहती है। जब ट्रेन पटरी पर आगे बढ़ती है, तो इंजन की छत पर एक विशेष प्रकार का मेटल डिवाइस लगा होता है, जिसे 'पेंटोग्राफ' कहा जाता है। यह पेंटोग्राफ लगातार ऊपर के तारों को छूकर करंट खींचता है और उसे सीधे ट्रेन के इंजन तक पहुंचाता है।
इंजन तक पहुंचने वाली यह बिजली बेहद हाई-वोल्टेज होती है, जिसे सीधे डिब्बों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके लिए आधुनिक इंजनों में 'होटल लोड सिस्टम' (Hotel Load System) जैसी अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो इंजन इस हाई-वोल्टेज करंट को ट्रांसफॉर्मर के जरिए सुरक्षित और उपयुक्त वोल्टेज में बदलता है। इसके बाद यही बिजली ट्रेन के सभी एसी कोच, स्लीपर बोगियों और जनरल डिब्बों तक भेजी जाती है, जिससे यात्रियों के लिए लाइट, पंखे और मोबाइल चार्जिंग पॉइंट सुचारू रूप से काम करते रहते हैं। इस प्रणाली की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ट्रेन के चलते रहने के दौरान बिजली की कमी कभी नहीं होती।
डीजल इंजन वाली ट्रेनों में कैसे होती है बिजली की सप्लाई
देश के कई ऐसे दूर-दराज के रूट और पहाड़ी इलाके हैं जहां आज भी विद्युतीकरण का काम पूरा नहीं हुआ है। ऐसे मार्गों पर ट्रेनों को खींचने के लिए डीजल इंजनों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब डीजल इंजन से ट्रेन चलती है, तो फिर डिब्बों के अंदर पंखे और लाइट कैसे जलते हैं? इसका जवाब है 'एंड ऑन जेनरेशन' (End on Generation - EOG) सिस्टम। जिन रूटों पर बिजली के तार यानी ओएचई लाइन नहीं होती, वहां चलने वाली ट्रेनों के दोनों सिरों पर विशेष डीजल जनरेटर कार या पावर कार लगाई जाती है।
ये पावर कार असल में बड़े-बड़े साइलेंट जनरेटर होते हैं जो डीजल से चलते हैं। यही जनरेटर पूरे ट्रेन के डिब्बों को लाइट, पंखे, हीटर और एयर कंडीशनिंग चलाने के लिए पर्याप्त बिजली सप्लाई करते हैं। इन जनरेटर कारों से निकलने वाली बिजली को केबल्स के जरिए पूरी ट्रेन में आगे से पीछे तक डिब्बों में पहुंचाया जाता है। यही कारण है कि डीजल इंजन वाली एक्सप्रेस ट्रेनों के सबसे आगे या सबसे पीछे एक या दो अलग तरह के डिब्बे दिखाई देते हैं, जिनमें से हल्की गड़गड़ाहट की आवाज भी आती है। यह पूरा सिस्टम स्वतंत्र रूप से काम करता है ताकि यात्रियों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
पारंपरिक और पुरानी ट्रेनों का एक्सेल व बैटरी सिस्टम
आधुनिक तकनीकों के आने से पहले और आज भी कई लोकल या पारंपरिक पैसेंजर ट्रेनों में बिजली आपूर्ति का एक अलग और पुराना तरीका इस्तेमाल होता है, जिसे एक्सेल और बैटरी सिस्टम कहा जाता है। इन पुराने कोचों के पहियों के साथ एक 'अल्टरनेटर' जुड़ा होता है। जब ट्रेन पटरी पर दौड़ती है, तो पहियों की गति यानी मैकेनिकल एनर्जी इस अल्टरनेटर के जरिए बिजली में बदल जाती है। इसके अलावा, हर कोच के नीचे भारी-भरकम बैटरी बैंक लगे होते हैं। जब ट्रेन चलती रहती है, तो पहियों से पैदा होने वाली बिजली से ये बैटरियां लगातार चार्ज होती रहती हैं।
इन बैटरियों का सबसे बड़ा काम तब होता है जब ट्रेन किसी रेलवे स्टेशन पर आकर रुक जाती है या फिर जब इंजन बंद रहता है। ट्रेन के रुकने के बावजूद डिब्बे के अंदर की लाइटें और पंखे इसलिए बंद नहीं होते क्योंकि कोच के नीचे मौजूद बैटरियां पावर बैकअप का काम करती हैं। हालांकि, अगर ट्रेन लंबे समय तक बिना चले खड़ी रहे, तो ये बैटरियां डिस्चार्ज भी हो सकती हैं, इसलिए रेलवे स्टेशनों पर इन्हें मेंटेन रखने के लिए कई बार एक्सटर्नल पावर सप्लाई का भी इस्तेमाल किया जाता है।
"रेलवे का इलेक्ट्रिकल सिस्टम यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखकर बेहद वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन किया गया है। चाहे ट्रेन ओएचई लाइन से चले, जनरेटर कार से या फिर बैटरियों के बैकअप पर आधारित हो, हर स्थिति में निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है ताकि सफर के दौरान किसी को भी परेशानी न हो।" — रेलवे तकनीकी विशेषज्ञ
निष्कर्ष: तकनीक का ऐसा तालमेल जो सफर बनाता है आरामदायक
भारतीय रेलवे का यह पूरा इलेक्ट्रिकल नेटवर्क इस बात का प्रमाण है कि इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी ने मिलकर हमारे सफर को कितना सुगम बना दिया है। चाहे हम वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेन में सफर कर रहे हों या किसी सामान्य एक्सप्रेस गाड़ी में, बिजली का यह अदृश्य चक्र लगातार काम करता रहता है। ओवरहेड तारों से लेकर पेंटोग्राफ, होटल लोड सिस्टम, डीजल पावर कार और बैटरी बैंकों का यह मेल यह सुनिश्चित करता है कि यात्री देश के किसी भी कोने में जाएं, उन्हें घर जैसी सुविधाएं मिलती रहें। अब जब भी आप अगली बार ट्रेन में अपना मोबाइल चार्ज करें या पंखे की हवा का आनंद लें, तो आप जान गए होंगे कि इसके पीछे कौन सा तकनीकी चक्रव्यूह काम कर रहा है।





