दिल्ली में बुलाई गई I.N.D.I.A. ब्लॉक की बैठक पर टिकी देश की नजरें
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A. ब्लॉक की एक और बड़ी बैठक होने जा रही है। इस बैठक का मुख्य एजेंडा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR और चुनाव आयोग के कामकाज के तौर-तरीकों को लेकर सामने आए मतभेदों पर मंथन करना है। पिछले तीन वर्षों के दौरान विपक्षी दलों की यह आठवीं बैठक है, जिसे आगामी चुनावी रणनीतियों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। हालांकि, बैठक शुरू होने से पहले ही विपक्षी एकता की मजबूती पर कई तरह के सवाल खड़े होने लगे हैं क्योंकि गठबंधन के कई प्रमुख चेहरे और दल इस महत्वपूर्ण मंथन से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं।
विपक्षी गठबंधन के भीतर समन्वय स्थापित करने के प्रयासों के बीच क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने सियासी समीकरण और प्राथमिकताएं इस बैठक की चमक को फीकी करती दिख रही हैं। कांग्रेस पार्टी और अन्य प्रमुख सहयोगी दलों द्वारा बुलाई गई इस बैठक में कई दिग्गज नेताओं की अनुपस्थिति इस बात की गवाही दे रही है कि तमाम कोशिशों के बावजूद आंतरिक असंतोष और मतभेद पूरी तरह से खत्म नहीं हो पाए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की रणनीतिक बैठकों से प्रमुख दलों का किनारा करना गठबंधन के भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
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अखिलेश यादव का किसानों के सम्मेलन में व्यस्त रहना और सपा की रणनीति
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस हाई-प्रोफाइल बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो रहे हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, उनका पहले से ही लखनऊ में एक बड़े किसान सम्मेलन में शामिल होने का कार्यक्रम तय था। इसके अलावा, राज्यसभा चुनाव से जुड़ी राजनीतिक व्यस्तताओं और नामांकन प्रक्रियाओं के कारण उनका दिल्ली आना संभव नहीं हो पाया है। हालांकि, समाजवादी पार्टी ने यह स्पष्ट किया है कि बैठक से पूरी तरह मुंह मोड़ने के बजाय पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता इस मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे और पार्टी के रुख को मजबूती से रखेंगे।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अखिलेश यादव की अनुपस्थिति के पीछे केवल प्रशासनिक व्यस्तता ही नहीं, बल्कि हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और सीट शेयरिंग को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान भी एक बड़ी वजह हो सकती है। उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटे अखिलेश यादव अपनी प्राथमिकताओं को क्षेत्रीय स्तर पर अधिक महत्व दे रहे हैं। इसके बावजूद, कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनकी बातचीत लगातार जारी है और पार्टी के प्रतिनिधि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के साझा एजेंडे में अपना योगदान देते रहेंगे।
DMK और AAP की तल्खी: कांग्रेस के साथ बढ़ रही दूरियां
इस बैठक से सबसे ज्यादा दूरी बनाने वाले दलों में दक्षिण भारत की प्रमुख पार्टी DMK और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) का नाम सबसे ऊपर है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इन दोनों ही दलों का कोई भी प्रतिनिधि इस बैठक में हिस्सा नहीं लेगा। तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद से ही DMK और कांग्रेस के बीच राजनीतिक समीकरणों में कुछ खटास देखने को मिली है, जिसके बाद से दोनों दलों के बीच असहजता बनी हुई है।
उधर, दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच जिस तरह की राजनीतिक तनातनी देखने को मिली थी, उसका असर अब राष्ट्रीय स्तर के गठबंधनों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। AAP का यह रुख पुराना रहा है कि जहां कांग्रेस मजबूत स्थिति में होगी या जहां सीधा मुकाबला होगा, वहां उनके साथ समन्वय बिठाना आसान नहीं होगा। चुनाव आयोग और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने की मुहिम में भले ही ये दल सैद्धांतिक रूप से साथ हों, लेकिन व्यावहारिक मंचों पर इनकी दूरियां विपक्षी एकता के दावों की पोल खोलती नजर आ रही हैं।
उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी का रुख: जूम के जरिए जुड़ेंगे शिवसेना प्रमुख
शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे इस बैठक में शारीरिक रूप से उपस्थित होने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग यानी जूम के जरिए जुड़ेंगे। पार्टी सांसद संजय राउत ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि उनकी पार्टी मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आयोजित होने वाले एक बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारियों में पूरी तरह व्यस्त है। दो अक्टूबर को होने वाले इस आंदोलन और उससे जुड़ी रैलियों की रूपरेखा तैयार करने में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे समेत तमाम स्थानीय नेता जुटे हुए हैं, जिसके चलते उनका दिल्ली आना कठिन हो गया है।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए व्यक्तिगत रूप से दिल्ली पहुंच चुकी हैं। उनके साथ तृणमूल कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेता भी इस मंथन का हिस्सा बनेंगे। ममता बनर्जी का इस बैठक में शामिल होना विपक्षी खेमे के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है क्योंकि वे लगातार क्षेत्रीय ताकतों को एकजुट करने की वकालत करती रही हैं। हालांकि, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की ओर से शरद पवार के ऑनलाइन जुड़ने और सुप्रिया सुले जैसे नेताओं के शारीरिक रूप से मौजूद रहने की खबर है।
संजय राउत का बड़ा बयान और शरद पवार की स्थिति पर स्थिति स्पष्ट
शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने मीडिया से बातचीत करते हुए विपक्षी गठबंधन की एकजुटता को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लगाने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार I.N.D.I.A. ब्लॉक और महाविकास आघाड़ी के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक हैं और उनके कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता। राउत ने कहा कि पवार साहब को लेकर जो भी कयास लगाए जा रहे हैं, वे पूरी तरह निराधार हैं और वे हमेशा वैचारिक रूप से विरोधी ताकतों के खिलाफ डटे रहे हैं।
"शरद पवार साहब कहीं नहीं जा रहे हैं। वे INDIA ब्लॉक और महाविकास आघाड़ी के स्तंभ और प्रमुख हैं। वे हमेशा हमारे साथ रहेंगे और वैचारिक लड़ाई में हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे।" — संजय राउत, सांसद, शिवसेना (UBT)
केंद्रीय सत्ता का विपक्षी गठबंधन पर तीखा हमला
इस पूरी राजनीतिक हलचल के बीच सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने विपक्षी दलों की इस बैठक और उनकी अंदरूनी कलह पर तीखा तंज कसा है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने खुले तौर पर बयान देते हुए कहा कि यह कोई वास्तविक और स्वाभाविक गठबंधन नहीं है, बल्कि यह केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक भय के कारण बनाया गया एक अस्थायी ढांचा है। उन्होंने दावा किया कि विपक्षी दलों में न तो वैचारिक मेल है और न ही जमीनी स्तर पर कोई ठोस तालमेल।
गिरिराज सिंह ने विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच चल रही वार्ताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने का जोखिम उठाएगी तो उसकी स्थिति बेहद दयनीय हो जाएगी। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि कागजों पर तैयार होने वाले ये गठबंधन चुनाव के समय जनता के सामने पूरी तरह बिखर जाते हैं क्योंकि इनमें आपसी स्वार्थ के अलावा कोई साझा जनहित का एजेंडा नहीं होता है। बहरहाल, तमाम आलोचनाओं और आंतरिक असहजताओं के बीच होने वाली यह बैठक विपक्षी दलों के लिए अपनी साख बचाने की एक और बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है।








