भारत और चीन के व्यापार समीकरण में ऐतिहासिक बदलाव
भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक संबंधों में एक दिलचस्प और बड़ा मोड़ आया है। आमतौर पर दोनों देशों के बीच व्यापार में चीन का पलड़ा हमेशा भारी रहा है, जहां भारत उससे भारी मात्रा में सामान आयात करता था। लेकिन अब तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में अगस्त तक के शुरुआती पांच महीनों में चीन को भारत का कुल निर्यात लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इस शानदार बढ़ोतरी का सबसे बड़ा श्रेय इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग गुड्स को जाता है, जो ट्रेडिशनल रूप से चीन के भारत को होने वाले प्रमुख निर्यात उत्पाद रहे हैं।
आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि भले ही यह उछाल एक लो बेस से आया हो, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर निर्माण से बढ़ी वैश्विक मांग ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। यह ट्रेंड इस बात का संकेत है कि भारत-चीन व्यापार संबंधों में एक दीर्घकालिक और सकारात्मक बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। चीनी निर्माता अब भारत से कुछ चुनिंदा इंटरमीडिएट इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की खरीद में रुचि दिखा रहे हैं, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की स्थिति मजबूत हो रही है।
इस बदलाव के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। दशकों तक यह आम धारणा रही है कि भारत केवल चीन से कच्चे माल या पुर्जे आयात कर उन्हें असेंबल करता है। लेकिन अब भारत से तैयार और अर्ध-तैयार इलेक्ट्रॉनिक घटकों का चीन की ओर बहना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ग्लोबल मार्केट में अपनी पकड़ तेजी से मजबूत कर रहा है।
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PCBA निर्यात में आया 40 गुना का जबर्दस्त उछाल
चीन को होने वाले निर्यात में इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल पीसीबीए (Printed Circuit Board Assembly) के आंकड़े हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत का पीसीबीए निर्यात चीन को 40 गुना से अधिक बढ़कर सीधे 1.5 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। हैरानी की बात यह है कि इससे ठीक एक साल पहले यह आंकड़ा मात्र 3.6 करोड़ डॉलर था। इतना ही नहीं, भारत के कुल पीसीबीए निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन को गया है, जो इस बात को साबित करता है कि चीनी टेक कंपनियां भारत में बने इन कंपोनेंट्स पर भरोसा कर रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन अब अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को अधिक वैल्यू एडेड और एडवांस टेक्नोलॉजी वाले क्षेत्रों जैसे सेमीकंडक्टर और एआई सर्वस पर केंद्रित कर रहा है। ऐसे में, वह अपेक्षाकृत सरल इलेक्ट्रॉनिक असेंबली और सब-असेंबली के लिए भारत जैसे पड़ोसी देशों पर निर्भरता बढ़ा रहा है। चीन का यह रुख भारत के लिए एक सुनहरा अवसर लेकर आया है, जहां देश के एमएसएमई और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर्स इस मांग को पूरा करने के लिए तेजी से आगे आ रहे हैं।
यह प्रवृत्ति दिखाती है कि वैश्विक स्तर पर कंपनियां अब सिंगल-सोर्सिंग मॉडल से हटकर डाइवर्सिफिकेशन पर जोर दे रही हैं। भारत सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं और घरेलू स्तर पर मजबूत हो रहे आपूर्ति तंत्र ने इसमें उत्प्रेरक का काम किया है।
सरकारी योजनाओं और नीतियों का दिखा स्पष्ट असर
भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई इस क्रांति के पीछे केंद्र सरकार की सोची-समझी नीतियां हैं। देश अब अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स रणनीति के शुरुआती दौर से आगे निकल चुका है, जो पहले केवल तैयार स्मार्टफोड की असेंबली तक सीमित था। अब नीति निर्माताओं का पूरा फोकस कंपोनेंट्स, सब-असेंबली, कच्चे माल और अत्याधुनिक मैन्युफैक्चरिंग उपकरणों के घरेलू उत्पादन पर है। सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के वित्तीय आवंटन को ₹22,919 करोड़ से बढ़ाकर सीधे ₹40,000 करोड़ कर दिया है, जिससे इस सेक्टर को बड़ा वित्तीय संबल मिला है।
आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि इन योजनाओं का जमीन पर कितना गहरा असर हुआ है। अगस्त तक के आंकड़ों के अनुसार, लगभग ₹69,548 करोड़ के भारी-भरकम निवेश वाले 106 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें से 38 अत्याधुनिक प्लांट्स या तो पूरी तरह चालू हो चुके हैं या निर्माण के अंतिम और उन्नत चरणों में हैं। इन प्रयासों का परिणाम यह रहा है कि देश में कुल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014-15 के ₹1.9 लाख करोड़ से छलांग लगाकर वित्त वर्ष 2025-26 में ₹13.11 लाख करोड़ के ऐतिहासिक आंकड़े पर पहुंच गया है।
"भारत अब केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन का एक अनिवार्य और मजबूत स्तंभ बन रहा है। सरकारी नीतियां और स्थानीय उद्योगों का तालमेल इस सफलता की मुख्य कुंजी है।" — वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक
निर्यात के मोर्चे पर नए रिकॉर्ड और भविष्य की राह
उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ देश से होने वाले निर्यात में भी रिकॉर्ड तेजी दर्ज की गई है। इसी अवधि में भारत का कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात लगभग ₹38,000 करोड़ से बढ़कर आसमान छूते हुए ₹4.24 लाख करोड़ के स्तर को पार कर गया है। यह आंकड़ा भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती ताकत और वैश्विक बाजार में उसकी स्वीकार्यता का स्पष्ट प्रमाण है। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि घरेलू वैल्यू एडिशन अभी लगभग 18 से 20 प्रतिशत के दायरे में है, जिसे भविष्य में और अधिक बढ़ाने की जरूरत है।
भारत को एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में रातों-रात चीन को पूरी तरह से रिप्लेस करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसे रणनीतिक रूप से चुनिंदा इंटरमीडिएट प्रोडक्शन फेजेस में खुद को सबसे किफायती और भरोसेमंद विकल्प के रूप में स्थापित करना होगा। डिजाइन-आधारित मैन्युफैक्चरिंग और एडवांस सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन जैसे सेक्टरों में अभी देश को लंबा सफर तय करना है, लेकिन शुरुआती सफलताएं यह भरोसा दिलाती हैं कि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।
निष्कर्ष: आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ता एक और मजबूत कदम
संक्षेप में कहें तो, भारत और चीन के व्यापारिक आंकड़ों में आया यह बदलाव केवल एक मामूली व्यावसायिक उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की बढ़ती महत्ता की कहानी कहता है। सरकार की दूरदर्शी योजनाएं, घरेलू निर्माताओं का बढ़ता हौसला और तकनीकी क्षमताओं का विस्तार मिलकर देश को एक नया ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बना रहे हैं। आने वाले समय में जैसे-जैसे घरेलू वैल्यू एडिशन बढ़ेगा और कंपोनेंट्स इकोसिस्टम मजबूत होगा, भारत दुनिया के नक्शे पर इलेक्ट्रॉनिक्स महाशक्ति के रूप में अपनी स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करेगा।






