नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारत का आयात बाजार इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए विदेशों से सामान मंगाने की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय बाजार अभी भी चीनी सामान के आयात के जाल में गहराई से फंसता चला जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक सामान से लेकर रोजमर्रा की चीजें तक भारी मात्रा में चीन से आ रही हैं। इससे स्थानीय निर्माताओं को कड़ी टक्कर मिल रही है और घरेलू बाजार पर बड़ा असर पड़ रहा है।
सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा जरूरतों का गणित भी पूरी तरह बदल चुका है। रूस से कच्चा तेल महंगा होने के बाद अब भारत ने दूसरे देशों की तरफ रुख किया है। ताजा खुलासे बताते हैं कि भारत ने अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए अब अन्य देशों से ज्यादा तेल खरीदना शुरू कर दिया है। इसके साथ ही वेनेजुएला से कच्चे तेल का आयात सात साल के सबसे ऊंचे रेकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर यह कदम बहुत अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे देश में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
पाम तेल और खाद्य तेल के नए स्रोतों की तलाश
खाने के तेल की मांग को पूरा करने के लिए भारत लगातार नए विकल्पों पर काम कर रहा है। देश में पाम तेल का आयात बहुत बड़े पैमाने पर होता है। लेकिन पारंपरिक स्रोतों पर निर्भरता कम करने के लिए अब पाम तेल आयात के लिए नए देशों और नए स्रोतों की तलाश तेजी से जारी है। सरकार और व्यापारी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि देश में खाद्य तेल की आपूर्ति में कोई कमी न आए और कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर न जाएं।
दूसरी तरफ, कीमती धातुओं के बाजार में भी हलचल तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों से कम ज्वेलरी खरीदने की अपील के बाद अब नीति स्तर पर बड़े बदलाव की तैयारी है। जीएसटी काउंसिल की आगामी बैठक में सोने और चांदी के आयात पर मिलने वाले टैक्स छूट या नियमों की नए सिरे से समीक्षा की जा सकती है। इस कदम का सीधा असर सर्राफा बाजार और आम खरीदारों की जेब पर पड़ना तय माना जा रहा है।
स्थानीय उद्योगों और घरेलू बाजार पर आयात का असर
विदेशों से लगातार बढ़ रहे सामान और कच्चे माल के आयात का सीधा असर देश के छोटे और मंझोले उद्योगों पर दिख रहा है। सस्ते विदेशी उत्पादों के कारण स्थानीय कारीगरों और निर्माताओं के लिए अपने उत्पाद बेचना मुश्किल होता जा रहा है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह देश के उद्योगों को बचाए रखे और साथ ही बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए आयात को भी संतुलित रखे।
आम जनता के लिए इन तमाम बदलावों का मतलब है कि आने वाले दिनों में बाजार की कीमतें और जरूरी चीजों की उपलब्धता सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार नीतियों से तय होगी। चाहे वह गाड़ी में डलने वाला तेल हो या घर में आने वाला खाने का सामान, हर मोर्चे पर भारत की आयात रणनीति बदल रही है। द फ्रीलान्स की टीम इन सभी पहलुओं पर लगातार नजर बनाए हुए है ताकि देश के सामने आयात की यह पूरी और सच्ची तस्वीर साफ हो सके।







