संयुक्त राष्ट्र मंच पर एक बार फिर उठा नापाक राग
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की आदत तुर्किए लंबे समय से पाले बैठा है। एक बार फिर ऐसा ही देखने को मिला जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने कश्मीर का जिक्र छेड़ दिया। दक्षिण एशिया के मुद्दों पर बोलते हुए उन्होंने इस संवेदनशील विषय को यूएन चार्टर के दायरे में हल करने की सलाह दी। हालांकि, वैश्विक मंचों पर भारत विरोधी ताकतों को हवा देने वाले बयानों पर अब नई दिल्ली ने चुप्पी साधने के बजाय बेहद आक्रामक और स्पष्ट कूटनीतिक प्रहार किया है।
भारत की तरफ से साफ कर दिया गया है कि देश की संप्रभुता और अखंडता से जुड़े मामलों में किसी भी तीसरे देश या अंतरराष्ट्रीय संगठन की कोई भूमिका नहीं हो सकती। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर उस देश को तुरंत और कड़े शब्दों में जवाब दे रहा है जो अनावश्यक रूप से घरेलू मामलों में टांग अड़ाने की कोशिश करते हैं। विदेश मंत्रालय का यह रुख यह बताने के लिए काफी है कि भारत अपनी संप्रभुता पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा।
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विदेश मंत्रालय की दो टूक: बाहरी दखल का कोई अधिकार नहीं
नई दिल्ली में आयोजित नियमित साप्ताहिक प्रेस वार्ता के दौरान विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस पूरे प्रकरण पर भारत का पक्ष दुनिया के सामने रखा। मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के तुर्किए के राष्ट्रपति की टिप्पणियों को खारिज कर दिया। प्रवक्ता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है, और इस पर किसी भी बाहरी मुल्क को टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि इस तरह के गैर-जरूरी संदर्भों का कोई वैधानिक आधार नहीं है। भारत सरकार ने हमेशा से यह नीति अपनाई है कि भारत और पाकिस्तान के बीच यदि कोई द्विपक्षीय मुद्दा है भी, तो उस पर किसी तीसरे देश की मध्यस्थता या बयानबाजी की कोई गुंजाइश नहीं है। शिमला समझौते के तहत दोनों देशों को आपसी बातचीत से ही मसले सुलझाने हैं, और तुर्किए जैसे देशों का इस तरह बार-बार बयान देना उनकी कूटनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है।
"आपने देखा होगा कि जिन टिप्पणियों का आपने जिक्र किया, वे तुर्किए के राष्ट्रपति द्वारा की गई थीं। भारत, संयुक्त राष्ट्र महासभा में तुर्किए के राष्ट्रपति द्वारा भारत और भारत के केंद्र-शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के बारे में की गई गैर-जरूरी टिप्पणियों को खारिज करता है। यह मामला भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता से जुड़ा है, और इस मुद्दे पर किसी बाहरी पक्ष का कोई अधिकार या भूमिका नहीं है।" — रणधीर जायसवाल, विदेश मंत्रालय प्रवक्ता
आखिर क्या कहा था तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगन ने?
पूरा विवाद संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान शुरू हुआ, जब तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन मंच से भाषण दे रहे थे। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दों के साथ-साथ दक्षिण एशिया का भी जिक्र किया। एर्दोगन ने कहा कि दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिए यह जरूरी है कि कश्मीर समेत सभी क्षेत्रीय विवादों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संबंधित प्रस्तावों के तहत बातचीत के माध्यम से सुलझाया जाए।
विश्लेषकों का मानना है कि तुर्किए के राष्ट्रपति अपनी घरेलू राजनीति और इस्लामिक दुनिया में खुद को एक बड़े नेता के रूप में पेश करने के लिए अक्सर ऐसे मंचों का इस्तेमाल करते हैं। गाजा संकट और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तुर्किए की भूमिका को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। पाकिस्तान के साथ अपने पारंपरिक करीबी रिश्तों के चलते तुर्किए समय-समय पर इस तरह के बयानों के जरिए कूटनीतिक संतुलन साधने की कोशिश करता है, जिसका भारत हमेशा से पुरजोर विरोध करता आया है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत का कड़ा संदेश
पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति में एक स्पष्ट और मुखर बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसी टिप्पणियों को कई बार नजरअंदाज कर दिया जाता था, वहीं अब भारत 'सॉफ्ट स्टेट' की छवि से बाहर निकलकर हर मंच पर डटकर जवाब दे रहा है। चाहे आतंकवाद का मुद्दा हो या क्षेत्रीय अखंडता का, भारत ने दुनिया को यह बता दिया है कि वह अपने आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा।
तुर्किए के साथ भारत के व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध भी रहे हैं, लेकिन जब-जब संप्रभुता का सवाल आया है, भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है। जानकारों का कहना है कि तुर्किए को यह समझ लेना चाहिए कि बार-बार भारत विरोधी बयानों से उसे द्विपक्षीय रिश्तों में नुकसान के अलावा कुछ हासिल नहीं होने वाला है। भारत का यह सख्त संदेश वैश्विक पटल पर एक बार फिर यह साबित करता है कि देश की सुरक्षा और अखंडता के मामले में किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
निष्कर्ष और आगे की स्थिति
संयुक्त राष्ट्र के मंच पर तुर्किए के राष्ट्रपति द्वारा कश्मीर का राग अलापा जाना कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन भारत की तरफ से मिला यह करारा जवाब दुनिया के उन तमाम देशों के लिए एक कड़ा संदेश है जो अनावश्यक रूप से भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश करते हैं। विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हो चुका है कि भारत कूटनीतिक मोर्चे पर पूरी तरह सतर्क और मजबूत स्थिति में है। आने वाले समय में भी यदि इस तरह के प्रयास किए जाते हैं, तो भारत का रुख इसी प्रकार अडिग और कड़ा रहने की पूरी उम्मीद है।







