नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — आज गूगल ट्रेंड्स पर 'रूस' यानी रशिया शब्द को लेकर अचानक बड़ी खोज देखने को मिली है। भारत और रूस के बीच आपसी रिश्तों, रक्षा समझौतों और कच्चे तेल के आयात को लेकर सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की खबरों में चर्चा तेज हो गई है। आम लोग यह जानना चाहते हैं कि मौजूदा वैश्विक हालात में दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीति पर क्या असर पड़ रहा है। द फ्रीलान्स की टीम ने इस मामले पर जमीनी स्तर के आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों को खंगालकर पूरी स्थिति को साफ करने की कोशिश की है।
बीते कुछ हफ्तों में पश्चिमी देशों के दबाव और वैश्विक प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को संतुलित रखा है। भारत को रियाद और ओपेक देशों के मुकाबले रूस से सस्ते दामों पर कच्चा तेल मिल रहा है, जिससे देश की घरेलू अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिली है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर रूस भारत का एक बेहद भरोसेमंद साझेदार साबित हुआ है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली और भुगतान के तरीकों को लेकर अभी भी कुछ छोटी-सी तकनीकी रुकावटें बनी हुई हैं, जिन्हें सुलझाने पर दोनों देशों के अधिकारी लगातार काम कर रहे हैं।
रूस से रक्षा उपकरणों की सप्लाई और तकनीकी साझेदारी
भारत और रूस के पुराने रक्षा संबंधों पर भी आज कई बड़े मंचों पर चर्चा हुई है। भारतीय सेना के पास मौजूद साठ फीसदी से ज्यादा हथियार और रक्षा उपकरण रूसी मूल के हैं, जिनके कलपुर्जे और रखरखाव के लिए रूस का सहयोग बेहद जरूरी है। पिछले कुछ महीनों में यूक्रेन युद्ध के चलते रक्षा सप्लाई की टाइमलाइन पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है, लेकिन दोनों देशों ने मेक इन इंडिया पहल के तहत भारत में ही हथियारों के सह-उत्पादन पर जोर देना शुरू कर दिया है। इसके तहत उत्तर प्रदेश के एक प्लांट में आधुनिक असॉल्ट राइफलों का निर्माण तेजी से चल रहा है, जो दोनों देशों की रक्षा साझेदारी को एक नई दिशा दे रहा है।
रूस के विदेश मंत्रालय और भारत के विदेश मंत्रालय के बीच हाल ही में कई दौर की उच्च स्तरीय बैठकें भी हुई हैं। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य आपसी व्यापार को डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं यानी भारतीय रुपये और रूसी रूबल में आगे बढ़ाना है। हालांकि इस व्यवस्था में कुछ व्यावहारिक मुश्किलें आ रही हैं क्योंकि भारत के मुकाबले रूस में भारतीय सामानों की मांग कम है, जिससे भुगतान का संतुलन थोड़ा गड़बड़ा जाता है। फिर भी दोनों देशों के बैंक इस वित्तीय उलझन को सुलझाने के लिए लगातार नए रास्ते तलाश रहे हैं ताकि व्यापार बिना किसी रुकावट के चलता रहे।
वैश्विक राजनीति और कूटनीतिक मोर्चे पर नई हलचल
संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत हमेशा से स्वतंत्र विदेश नीति का पक्षधर रहा है। भारत ने कभी भी पश्चिमी देशों के दबाव में आकर रूस के साथ अपने दशकों पुराने कूटनीतिक रिश्तों को कमजोर नहीं होने दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी मुलाकातों ने यह साफ कर दिया है कि बदलती दुनिया में भी भारत और रूस की दोस्ती उतनी ही मजबूत है जितनी पहले हुआ करती थी। विश्लेषकों का मानना है कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत के लिए रूस का साथ रणनीतिक रूप से बहुत जरूरी है।
आम नागरिकों और देश के युवाओं के बीच भी रूस को लेकर एक अलग ही उत्सुकता देखने को मिलती है। रूस में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों और वहां काम करने वाले पेशेवरों के लिए भी वीजा नियमों और उड़ानों को लेकर नई सहूलियतें दी जा रही हैं। मास्को और नई दिल्ली के बीच सीधी उड़ानों की संख्या बढ़ाने पर विचार चल रहा है ताकि पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में लोगों का आना-जाना और ज्यादा आसान हो सके। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ है कि आने वाले दिनों में भारत और रूस के रिश्ते क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से और अधिक प्रगाढ़ होने वाले हैं।
ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य के व्यापारिक समझौते
देश के ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी, तब तक भारत के लिए रूस से तेल आयात करना एक आर्थिक मजबूरी और जरूरत दोनों रहेगा। इससे देश में पेट्रोल और डीजल के दाम काबू में रखने में काफी मदद मिलती है। इसके अलावा परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के तीसरे और चौथे चरण का काम भी तय समय सीमा के भीतर पूरा करने पर जोर दिया जा रहा है। रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसातोम इस प्रोजेक्ट में भारत की पूरी मदद कर रही है, जो भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मील का पत्थर साबित होगा।






