नई दिल्ली और मॉस्को — रूस के ठंडे इलाके साइबेरिया से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। यहाँ की एक प्रमुख प्रयोगशाला में काम करने वाली एक महिला वैज्ञानिक की संदिग्ध हालात में मौत हो गई है। शुरुआती दौर में इस मौत को खतरनाक प्लेग बीमारी से जोड़कर देखा जा रहा था। इस घटना के सामने आते ही वैश्विक स्तर पर चिंता की लहर दौड़ गई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस घटना के बाद से स्थानीय प्रशासन ने तुरंत कड़े कदम उठाए हैं और करीब दो सौ लोगों को आइसोलेट कर दिया गया है ताकि संक्रमण फैलने से रोका जा सके।
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए अब वैश्विक महाशक्तियां भी सक्रिय हो गई हैं। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मामले में बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा है कि उनका देश रूस के इस लैब हादसे और वहां फैल रही रहस्यमयी बीमारी के हालात पर बेहद करीब से नजर रख रहा है। अमेरिकी खुफिया और स्वास्थ्य एजेंसियां इस बात की लगातार समीक्षा कर रही हैं कि क्या यह कोई सामान्य लैब दुर्घटना है या फिर किसी खतरनाक जैविक रिसर्च का परिणाम है। इस बयान के बाद से कूटनीतिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है और आने वाले दिनों में रूस और अमेरिका के बीच इस पर उच्च स्तरीय बातचीत हो सकती है।
रूसी लैब में वुहान जैसी घटना की आशंका
सोशल मीडिया और कई व्यावसायिक मीडिया मंचों पर इस घटना की तुलना सीधे तौर पर कोविड-19 के शुरुआती दौर से की जा रही है। लोग इसे रूसी लैब का वुहान जैसा कांड बता रहे हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि अति-सुरक्षित मानी जाने वाली इन प्रयोगशालाओं में जिस तरह से शोधकर्ताओं की जान जा रही है, वह जैव सुरक्षा मानकों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। क्या सुपरपावर रूस में कोरोना के बाद अब किसी दूसरे खतरनाक वायरस या बीमारी का दौर शुरू होने वाला है? इन सवालों ने आम जनता के मन में डर पैदा कर दिया है कि कहीं यह दुनिया के लिए एक और बड़ी महामारी की आहट तो नहीं है।
दूसरी ओर, रूसी सरकार और वहां के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन तमाम अटकलों और दावों का खंडन किया है। रूसी अधिकारियों का साफ कहना है कि महिला वैज्ञानिक की मौत एक अज्ञात बीमारी की वजह से हुई है और इसका प्लेग या किसी महामारी से कोई लेना-देना नहीं है। रूस का दावा है कि स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है और घबराने की कोई जरूरत नहीं है। इसके बावजूद, एहतियाती उपायों के तहत लैब के संपर्क में आए सभी लोगों को कड़ी निगरानी में रखा गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ भी इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है और लगातार रूसी प्रशासन से ताजा अपडेट ले रहा है।
साइबेरिया से लेकर वाशिंगटन तक कूटनीतिक सरगर्मी
साइबेरिया की इस घटना ने एक बार फिर से दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में होने वाले खतरनाक शोध और उनकी सुरक्षा पर बहस छेड़ दी है। जानकारों का कहना है कि जब तक रूस स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को इस लैब की जांच करने की अनुमति नहीं देता, तब तक दुनिया भर में फैल रही यह दहशत कम नहीं होगी। ऐतिहासिक रूप से ऐसे कई मामले आए हैं जहां शुरुआती बयानों में बीमारियों को छुपाने की कोशिश की गई, जिसके बाद में गंभीर परिणाम भुगतने पड़े। यही वजह है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं हैं।
आम नागरिकों और स्थानीय लोगों के बीच इस बात को लेकर भारी असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि वे किस पर भरोसा करें। एक तरफ रूसी प्रशासन इसे सामान्य और नियंत्रित घटना बता रहा है, तो दूसरी तरफ लैब के भीतर दो सौ लोगों को आइसोलेट किया जाना इस बात की गवाही देता है कि खतरा पूरी तरह टला नहीं है। 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड टीम इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही वैज्ञानिक जांच के आधिकारिक आंकड़े सामने आएंगे, पाठकों तक सबसे पहले सटीक जानकारी पहुंचाई जाएगी।
भविष्य के एहतियाती कदम और वैश्विक चिंताएं
इस पूरी घटना का असर आने वाले दिनों में वैश्विक स्वास्थ्य नीतियों और लैब सुरक्षा कानूनों पर पड़ना तय है। दुनिया भर के वैज्ञानिक संगठन अब यह मांग कर रहे हैं कि सभी देशों की उच्च-सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं की अंतरराष्ट्रीय निगरानी बढ़ाई जानी चाहिए। जब तक इस बात की पुष्टि नहीं हो जाती कि महिला वैज्ञानिक की मौत किस सटीक बीमारी से हुई है, तब तक अंतरराष्ट्रीय यात्राओं और व्यापारिक समझौतों पर भी इसका मनोवैज्ञानिक असर देखने को मिल सकता है। अमेरिका और रूस के बीच इस मुद्दे पर संभावित बातचीत आने वाले हफ्तों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगी।




