नई दिल्ली/इस्लामाबाद: दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक पटल पर इन दिनों बयानों का ज्वार और कूटनीतिक चालों का दौर चरम पर है। पिछले कुछ घंटों से गूगल ट्रेंड्स पर छाए 'सिंधु जल संधि' (IWT) विवाद और पाकिस्तानी मंत्रियों के आत्मप्रशंसा वाले बयानों ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच ठंडे बस्ते में पड़ी कूटनीति को सतह पर ला दिया है। 'द फ्रीलान्स' के लिए मेरी ऑन-द-ग्राउंड पड़ताल बताती है कि पाकिस्तान के भीतर मची राजनीतिक खलबली और बाहरी ताकतों के साथ उसकी जुगलबंदी असल में उसकी घरेलू विफलताओं से ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी रणनीति है। आइए, इस पूरे घटनाक्रम के हर पहलू की तह तक जाते हैं।
शहबाज शरीफ का भाषण और सोशल मीडिया पर छिड़ा विवाद
हाल ही में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के एक भाषण को वहां के मंत्रियों ने 'ऐतिहासिक' करार दिया। दावा किया गया कि सिंधु जल संधि के मुद्दे पर भारत कथित तौर पर पीछे हटा है। हालांकि, इस बयान के आते ही सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी मंत्री खुद बुरी तरह ट्रोल हो गए। भारतीय कूटनीतिक गलियारों और अंतरराष्ट्रीय जल विशेषज्ञों ने इसेरीति-नीति से कोसों दूर एक कोरा राजनीतिक शिगूफा बताया है। जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की आंतरिक अर्थव्यवस्था और भुखमरी की कगार पर पहुंच चुकी अवाम का ध्यान मोड़ने के लिए ऐसे जुमलों का सहारा लिया जा रहा है।
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ऑपरेशन सिंदूर और कूटनीतिक बर्फ पिघलने के दावे
एक तरफ जहां जुबानी जंग जारी है, वहीं 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद पहली बार एक भारतीय दल के पाकिस्तान दौरे ने कई विश्लेषकों को चौंका दिया है। क्या वाकई रिश्तों की बर्फ पिघल रही है या इसके पीछे कोई गहरी कूटनीतिक मजबूरी है? हमारी रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह के दौरे तकनीकी और द्विपक्षीय वार्ताओं के तयशुदा दायरे का हिस्सा हैं, जिन्हें कतई कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सामान्य स्थिति का ढोंग रचने की कोशिश कर रहा है।
अरब सागर में ड्रैगन की चाल और भारतीय बंदरगाहों पर खतरा
महज पानी और कूटनीति तक ही यह खेल सीमित नहीं है। खबरें आ रही हैं कि पाकिस्तान ने चीनी पनडुब्बी की मदद से मिसाइल का परीक्षण किया है, जिससे भारत के तीन सबसे बड़े बंदरगाहों के पास सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। बीजिंग और इस्लामाबाद की यह सांठगांठ हिंद महासागर में रणनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कुत्सित कोशिश है। भारतीय नौसेना और सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं। ड्रैगन की पीठ थपथपाने से पाकिस्तान को तात्कालिक खुशी तो मिल सकती है, लेकिन यह उसकी क्षेत्रीय संप्रभुता को और अधिक कमजोर करेगा।
सिंधु जल संधि: पाकिस्तान के लिए 'नासूर' बनता जल संकट
जमीनी हकीकत यह है कि सिंधु जल संधि अब पाकिस्तान के लिए किसी नासूर से कम नहीं है। भारत ने जिस तरह से इस संधि के नियमों और संशोधनों पर रुख कड़ा किया है, उससे पाकिस्तान की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की चूलें हिल गई हैं। आने वाले दिनों में यदि पानी के प्राकृतिक प्रवाह और तकनीकी फेरबदल पर भारत ने पूरी तरह शिकंजा कस लिया, तो पाकिस्तान की 'थाली से रोटी गायब' होने जैसी स्थिति सच साबित हो सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत ने कूटनीतिक मोर्चे पर जो खेल खेला है, उसका तोड़ पाकिस्तानी हुक्मरां के पास नहीं है।
इस्लामिक NATO की सुगबुगाहट और सऊदी अरब की बैठक
एक तरफ ईरान-इजराइल जंग जैसे वैश्विक संकट मंडरा रहे हैं, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान सऊदी अरब के मंच पर कुछ मुस्लिम देशों के साथ मिलकर तथाकथित 'इस्लामिक NATO' जैसी अवधारणा को जिंदा करने की जुगत में लगा है। हालांकि, मध्य पूर्व के देश अब भली-भांति समझ चुके हैं कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति खुद ऐसी नहीं है कि वह किसी सुरक्षा गठबंधन का नेतृत्व कर सके। यह बैठक महज कूटनीतिक दिखावे से ज्यादा कुछ नजर नहीं आती।
'द फ्रीलान्स' का निष्कर्ष स्पष्ट है: कागजी बयानों और चीनी पनडुब्बियों के सहारे पाकिस्तान चाहे जितनी बयानबाजी कर ले, लेकिन भारत की रणनीतिक दृढ़ता और जल कूटनीति के आगे उसकी हर चाल अंततः बेअसर साबित हो रही है।








