बीमा बाजार में महंगे प्रीमियम से परेशान आम आदमी को मिलेगी बड़ी राहत
यदि आप हाल ही में कोई नई बीमा पॉलिसी खरीदने के बारे में विचार कर रहे हैं, तो यह खबर सीधे तौर पर आपकी जेब और भविष्य की वित्तीय सुरक्षा से जुड़ी हुई है। हमारे देश में बीते एक दशक से अधिक समय से यह देखा जा रहा है कि बीमा पॉलिसियों का प्रीमियम लगातार आसमान छू रहा है, लेकिन इसके मुकाबले ग्राहकों को मिलने वाले कवरेज का दायरा या तो स्थिर है या उसमें कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। इस पूरी स्थिति के पीछे एक बड़ा कारण यह रहा है कि अधिकांश बीमा कंपनियां नए ग्राहकों की जरूरतों को पूरा करने के बजाय अपने डिस्ट्रीब्यूटर्स और ब्रोकर्स को भारी-भरकम कमीशन बांटने में ज्यादा व्यस्त रही हैं।
इस अनियंत्रित व्यवस्था को पूरी तरह से दुरुस्त करने के लिए देश का बीमा नियामक यानी बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) अब एक कड़े और बड़े बदलाव की तैयारी में है। नियामक के नए प्रस्तावों के अनुसार, आने वाले समय में बीमा एजेंटों और ब्रोकर्स को मिलने वाले पहले साल के कमीशन की अधिकतम सीमा तय कर दी जाएगी। इस व्यवस्था के लागू होने से कंपनियों के परिचालन खर्च में भारी कमी आएगी और ग्राहकों द्वारा दिए जाने वाले प्रीमियम का अधिक हिस्सा सीधे तौर पर निवेश योजनाओं में लग सकेगा, जिससे पॉलिसी मेच्योरिटी पर रिटर्न भी बेहतर मिलने की उम्मीद है।
संबंधित खबरें
प्रबंधन खर्चों में कटौती का प्रस्ताव: कंपनियों को तय सीमा में रहना होगा
वर्तमान समय में बीमा कंपनियों के पास अपने प्रबंधन और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए काफी छूट है, जिसके तहत वे कुल प्रीमियम का बड़ा हिस्सा खर्च कर सकती हैं। नियामक के नए दिशानिर्देशों के तहत आने वाले पांच वर्षों में इस प्रबंधन खर्च को घटाकर एक तय सीमा तक लाने की सख्त योजना बनाई जा रही है। जानकारों का मानना है कि वर्ष 2023 के दौरान बीमा कंपनियों को उनके खर्चों में जो विशेष छूट दी गई थी, उसका असल फायदा आम ग्राहकों तक बिल्कुल भी नहीं पहुंच पाया।
कंपनियां लगातार अपने बीमा उत्पादों के प्रीमियम में तो बढ़ोतरी करती चली गईं, लेकिन उसके अनुपात में नए ग्राहकों को जोड़ने या पुराने ग्राहकों को बनाए रखने में वे नाकाम साबित हुईं। नियामक का साफ मानना है कि जब तक कंपनियों के आंतरिक खर्चों पर लगाम नहीं लगाई जाएगी, तब तक आम जनता के लिए बीमा पॉलिसियों को खरीदना और उन्हें लंबे समय तक चलाना आर्थिक रूप से कठिन बना रहेगा।
जीडीपी की रफ्तार से पिछड़ता बीमा बाजार और घटती पॉलिसी ग्रोथ
देश के आर्थिक आंकड़ों पर यदि नजर डाली जाए तो पिछले दस वर्षों के दौरान देश की जीडीपी ने औसतन अच्छी खासी रफ्तार से तरक्की की है, लेकिन इसके उलट जीवन बीमा का कारोबार और सामान्य बीमा का क्षेत्र उस गति से आगे नहीं बढ़ सका। देश की कुल आय और आर्थिक संपन्नता में वृद्धि होने के बावजूद देश की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी पर्याप्त बीमा सुरक्षा के दायरे से बाहर है।
नियामक के विश्लेषण के मुताबिक, जब कंपनियों को खर्चों के मोर्चे पर रियायतें दी गई थीं, तो यह उम्मीद की गई थी कि इसका सीधा लाभ आम लोगों को सस्ता बीमा दिलाकर दिया जाएगा। इसके विपरीत, हुआ यह कि कंपनियों ने अपनी व्यावसायिक रणनीतियों में बदलाव करने के बजाय केवल बिचौलियों और एजेंटों को लुभावने और भारी कमीशन बांटने पर ही अपना पूरा जोर बनाए रखा, जिससे बीमा बाजार की वास्तविक वृद्धि प्रभावित हुई।
पॉलिसीधारकों का पैसा अब सीधे निवेश में होगा इस्तेमाल
बीमा सेक्टर के जानकारों का कहना है कि जब उत्पादों की बिक्री पर अत्यधिक कमीशन दिया जाता है, तो अंततः उस वित्तीय बोझ का सामना आम पॉलिसीधारक को ही करना पड़ता है। इससे या तो ग्राहकों को अपनी जेब से बहुत ज्यादा महंगा प्रीमियम चुकाना पड़ता है या फिर उस बीमा उत्पाद से मिलने वाला रिटर्न काफी कम हो जाता है। इसी खामी को दूर करने के लिए IRDAI ने प्रीमियम भुगतान की अवधि के आधार पर कमीशन को युक्तिसंगत बनाने का अहम प्रस्ताव पेश किया है।
कमीशन व्यवस्था में इस तरह की सख्त कटौती होने से निवेशकों और पॉलिसीधारकों की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा प्रशासनिक लागत में बर्बाद होने से बच जाएगा और वह सुरक्षित वित्तीय फंड्स में निवेश हो पाएगा। इससे लंबी अवधि में पॉलिसीधारकों को वित्तीय सुरक्षा के साथ-साथ एक मजबूत और संतोषजनक फंड मिलने की पूरी संभावना बनेगी।
पॉलिसी सरेंडर करने के बढ़ते आंकड़े और कंपनियों की प्राथमिकताओं में बदलाव
आंकड़े इस बात की ओर भी गंभीर इशारा करते हैं कि बीमा कंपनियां सिर्फ नई पॉलिसियों की ताबड़तोड़ बिक्री करने पर ही अपना पूरा ध्यान केंद्रित रखती हैं, जबकि ग्राहकों को लंबे समय तक अपने साथ जोड़े रखना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं होता है। स्थिति यह है कि देश में कई बीमा पॉलिसियां अपने पांच साल यानी 61वें महीने तक आते-आते बंद हो जाती हैं।
यानी आधे से ज्यादा ग्राहक बीच रास्ते में ही अपनी पॉलिसी को सरेंडर करने के लिए मजबूर हो जाते हैं क्योंकि वे भारी-भरकम प्रीमियम का बोझ उठाने में असमर्थ हो जाते हैं। नियामक के इस नए और दूरदर्शी कदम से उम्मीद की जा रही है कि न केवल एजेंटों के लालच पर लगाम लगेगी, बल्कि बीमा कंपनियां भी ऐसे प्रोडक्ट्स बाजार में लाएंगी जो ग्राहकों के हितों की पूरी रक्षा कर सकें।
"बीमा सेक्टर का मुख्य उद्देश्य आम नागरिक को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है, न कि केवल बिचौलियों की झोली भरना। जब तक प्रीमियम का अधिकांश हिस्सा सही दिशा में निवेश नहीं होगा, तब तक ग्राहकों का विश्वास पूरी तरह से नहीं जीता जा सकता।" — वरिष्ठ बीमा विश्लेषक एवं वित्तीय सलाहकार








