बेंगलुरु/ग्राउंड ब्यूरो — कर्नाटक के खेतों और मिलों के बाहर इस समय तनाव का माहौल साफ दिखाई दे रहा है। राज्य के गन्ना किसानों ने चीनी मिलों के खिलाफ सड़कों पर उतरकर बड़ा मोर्चा खोल दिया है। किसानों का साफ कहना है कि उनका बकाया पैसा तुरंत चुकाया जाए। कई महीनों से मिलों के चक्कर काटने के बाद भी जब भुगतान नहीं हुआ, तब किसानों ने यह कड़ा कदम उठाया है। हमारी जमीनी पड़ताल बताती है कि मिल मालिकों की मनमानी के कारण अन्नदाता आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे हैं।
राज्य के कई जिलों में किसान संघों ने मिलकर प्रदर्शन तेज कर दिए हैं। किसानों का आरोप है कि पिछले सीजन का गन्ना बेचने के बाद भी उन्हें तय रकम नहीं मिली है। बैंक का कर्ज और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंचकर किसानों को शांत कराने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन किसान अपनी जिद पर अड़े हैं कि जब तक लिखित में भरोसा और पैसा नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। मिल प्रबंधन की ओर से अभी तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं आया है।
चीनी मिलों पर बकाया भुगतान का भारी दबाव
कर्नाटक के कृषि बाज़ारों में इस समय गन्ने के दाम और भुगतान को लेकर भारी रस्साकशी चल रही है। किसानों का कहना है कि सरकार और मिल मालिक मिलकर उनकी मेहनत का सही दाम समय पर नहीं दे रहे हैं। हर साल फसल कटने के बाद भुगतान के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। इस बार किसानों ने साफ कह दिया है कि वे मौखिक वादों पर भरोसा नहीं करेंगे। मिलों के मुख्य द्वारों पर बैठकर किसान लगातार नारेबाजी कर रहे हैं और अपना हक मांग रहे हैं।
स्थानीय नेताओं और किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही भुगतान नहीं हुआ तो आंदोलन को और बड़ा किया जाएगा। हाईवे जाम करने और मिलों का कामकाज ठप करने की चेतावनी भी दी गई है। खुफिया एजेंसियां और स्थानीय पुलिस इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। किसानों का यह गुस्सा इस बात का सबूत है कि ग्रामीण इलाकों में आर्थिक संकट कितना गहराता जा रहा है। मिल प्रबंधन पर प्रशासन की तरफ से भी दबाव बनाया जा रहा है कि वह जल्द से जल्द किसानों का बकाया खाता साफ करे।
आम किसानों के लिए सरकार की नई समर्थन राशि योजना
एक तरफ जहां गन्ना किसान अपने बकाये के लिए लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार ने आम उत्पादकों को राहत देने का फैसला किया है। कर्नाटक सरकार ने राज्य के आम किसानों के लिए प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य तय कर दिया है। इसके तहत पात्र किसानों को प्रति क्विंटल के हिसाब से वित्तीय सहायता दी जाएगी। कृषि विभाग का मानना है कि इस कदम से बाजार में आम के गिरते दामों से किसानों को सुरक्षा मिलेगी। पिछले कुछ समय से मौसम की मार और कम कीमतों के कारण फल उत्पादक बहुत परेशान चल रहे थे।
मैदान पर हमारी टीम ने जब आम बागों के मालिकों से बात की, तो उन्होंने इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी। कुछ किसानों का कहना है कि यह राहत काफी है, तो कुछ का मानना है कि महंगाई के हिसाब से यह राशि और बढ़ाई जानी चाहिए। इसके अलावा, कावेरी नदी के पानी के मुद्दे पर भी राज्य के कलाकारों और किसानों में एकजुटता दिखाई दे रही है। कन्नड़ फिल्म कलाकारों ने भी कावेरी जल विवाद को लेकर किसानों के समर्थन में आवाज उठाई है। कुल मिलाकर, कर्नाटक का ग्रामीण और कृषि क्षेत्र इन दिनों कई मोर्चों पर उथल-पुथल का सामना कर रहा है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और आगे की स्थिति
द फ्रीलान्स की टीम ने जब मंडियों और गांवों का दौरा किया, तो यह बात खुलकर सामने आई कि किसानों की समस्याएं सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। फसल की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसके मुकाबले मुनाफा बहुत कम मिल रहा है। चीनी मिलों और सरकार के बीच पिसता हुआ किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में है। आने वाले दिनों में यदि प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन पूरे राज्य में फैल सकता है। हमारी नजर इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार बनी हुई है और हम हर ताजा अपडेट आप तक पहुंचाते रहेंगे।




