कर्नाटक में मतदाता सूची से नाम हटाने का सनसनीखेज मामला
देश के दक्षिणी राज्य कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) अभियान के दौरान एक गंभीर चुनावी धोखाधड़ी का पर्दाफाश हुआ है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में फर्जी आपत्तियों और फॉर्म-7 के माध्यम से पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर करवाने की साजिश रची जा रही थी। इस पूरे प्रकरण ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, जिसके बाद निर्वाचन आयोग और पुलिस प्रशासन ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है।
बेलगावी जिले में भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता रवि पाटिल और उनके सहयोगियों पर अल्पसंख्यक समुदाय के करीब दो सौ मतदाताओं के नाम सूची से कटवाने के लिए सुनियोजित प्रयास करने का गंभीर आरोप लगा है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, इस सिलसिले में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक षड्यंत्र, जालसाजी और धोखाधड़ी के मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई है। जांच एजेंसियां इस बात की गहराई से पड़ताल कर रही हैं कि इस अवैध कवायद के पीछे और कौन-कौन लोग शामिल थे।
संबंधित खबरें
बूथ लेवल एजेंट की शिकायत पर एक्शन
यह पूरा मामला तब खुलकर सामने आया जब बेलगावी उत्तर विधानसभा क्षेत्र के वार्ड नंबर 12 में बूथ लेवल एजेंट (BLA) के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे मीरासाब सनदी ने स्थानीय मार्केट पुलिस स्टेशन में आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई। अपनी शिकायत में उन्होंने विस्तार से बताया कि किस तरह से एक सोची-समझी रणनीति के तहत उनके खुद के परिवार समेत सैकड़ों मुस्लिम नागरिकों के नाम हटाने के लिए दस्तावेजों में हेरफेर किया गया।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, सितंबर महीने के आखिर में लगभग बीस से पच्चीस लोगों का एक समूह उनके पास पहुंचा था। इन लोगों ने मतदाता सत्यापन प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की और चुनाव आयोग के पोर्टल पर जमा किए जाने वाले फॉर्म-7 का दुरुपयोग किया। आरोप है कि बीएलओ पर मानसिक दबाव बनाया गया और फोन पर फर्जी तरीके से खुद को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) बताने वाले व्यक्ति से बात करवाकर फर्जी स्वीकृतियां हासिल करने का कुत्सित प्रयास किया गया।
बीदर जिले में भी बड़े पैमाने पर अनियमितताएं
सिर्फ बेलगावी ही नहीं, बल्कि कर्नाटक के अन्य जिलों से भी ऐसी ही चौंकाने वाली शिकायतें सामने आई हैं। बीदर जिले के भालकी इलाके से एक और सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है, जहां लगभग साढ़े तीन हजार मतदाताओं के नाम को गलत तरीके से 'शिफ्टेड' या 'एब्सेंट' श्रेणी में दर्ज करा दिया गया। स्थानीय निवासियों और कारोबारियों की तरफ से जब इसकी पड़ताल की गई, तो पता चला कि बिना किसी प्रमाणिक दस्तावेज के बड़े पैमाने पर आपत्तियां दाखिल की गई थीं।
बीदर के एक स्थानीय नागरिक की शिकायत पर पुलिस ने संज्ञान लेते हुए तीन दर्जन से अधिक आरोपियों के खिलाफ नामजद मुकदमे दर्ज किए हैं। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि मतदाताओं की बिना जानकारी के उनके जाली हस्ताक्षर तैयार किए गए और उन्हें निर्वाचन अधिकारियों के पास वास्तविक बताकर जमा कर दिया गया। इस तरह के मामलों से स्थानीय स्तर पर तनाव और आक्रोश की स्थिति उत्पन्न हो गई थी, जिसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी।
राजनीतिक सरगर्मी और मुख्यमंत्री का कड़ा रुख
इस बड़े पैमाने पर चल रहे कथित चुनावी फर्जीवाड़े के खिलाफ राज्य की राजनीति में भी उबाल देखने को मिला। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और उनके मंत्रिमंडल के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने बेंगलुरू स्थित मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) वी. अनबुकुमार के कार्यालय के बाहर जमकर विरोध प्रदर्शन किया था। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया था कि राज्य के अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी समुदायों के लाखों वोटरों के नाम सोची-समझी साजिश के तहत सूची से गायब करने की कोशिश की जा रही है।
"राज्य के विभिन्न हिस्सों में ईआरओ के समक्ष फॉर्म-7 के जरिए बड़ी संख्या में फर्जी आवेदन दाखिल किए जाने के मामले संज्ञान में आए हैं। संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि ऐसे झूठे दावे पेश करने वाले और कानून का उल्लंघन करने वाले लोगों के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।" — मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय, कर्नाटक
निर्वाचन आयोग की सख्ती और आगामी कानूनी कदम
विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच इस तीखे टकराव के बाद मुख्य निर्वाचन आयोग ने पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की है। आयोग ने सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों और ईआरओ को स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए हैं कि फॉर्म 6, 6A, 7 और 8 के जरिए आने वाले हर एक आवेदन की अत्यंत बारीकी से जांच की जाए। यदि किसी भी स्तर पर जानबूझकर झूठी घोषणा या फर्जी दस्तावेज जमा करने की पुष्टि होती है, तो संबंधित आवेदक के खिलाफ बिना किसी ढिलाई के फौजदारी मुकदमे चलाए जाएंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है, और इस प्रकार की धांधली चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार करती है। फिलहाल, पुलिस और प्रशासनिक अमला इस बात की थाह लेने में जुटा है कि क्या इन वारदातों के पीछे कोई संगठित गिरोह सक्रिय था जो राजनीतिक लाभ के लिए मतदाताओं के अधिकारों को छीनने का प्रयास कर रहा था। पुलिस की जांच आगे बढ़ने पर कई अन्य बड़े नामों के बेनकाब होने की संभावना भी जताई जा रही है।








