राजस्थान में ग्रामीण निकाय चुनावों का काउंटडाउन शुरू
राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर गांवों की चौपाल से लेकर राजधानी जयपुर तक हलचल तेज होने वाली है। पंचायतीराज संस्थाओं के चुनावों को लेकर लंबे समय से चली आ रही अटकलों पर अब विराम लगने जा रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किसी भी वक्त पंचायत चुनाव के पूरे कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा की जा सकती है। इस बड़े चुनावी ऐलान के साथ ही ग्रामीण राजस्थान में राजनीतिक दलों की सक्रियता अपने चरम पर पहुंच जाएगी और गांवों की सरकार चुनने की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू हो जाएगी।
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस बार के पंचायतीराज चुनाव कई चरणों में संपन्न कराए जा सकते हैं। चुनाव आयोग की ओर से तारीखों के ऐलान के साथ ही नामांकन दाखिल करने, उनकी जांच करने, नाम वापसी, मतदान की तारीखों और वोटों की गिनती की पूरी रूपरेखा स्पष्ट कर दी जाएगी। राज्य के ग्रामीण इलाकों में मतदाता भी अपने क्षेत्र के विकास के लिए नए नुमाइंदों को चुनने को लेकर पूरी तरह तैयार नजर आ रहे हैं।
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लागू होगी आचार संहिता और प्रशासनिक गतिविधियों पर रहेगी रोक
चुनाव आयोग द्वारा कार्यक्रम की घोषणा होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता तुरंत प्रभाव से लागू हो जाएगी। जानकारों का अनुमान है कि यह आचार संहिता पूरी चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने तक करीब दो महीने तक प्रभावी रह सकती है। आचार संहिता लागू होने के बाद ग्रामीण इलाकों में कई तरह के प्रशासनिक फैसलों और नई योजनाओं की घोषणाओं पर पाबंदी लग जाएगी, जिससे चुनावी मैदान पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बना रहे।
आचार संहिता के दायरे में आने के कारण सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादलों पर भी पूरी तरह रोक लग जाएगी। चुनाव प्रक्रिया के अंतिम चरण तक सरकार और स्थानीय प्रशासन को निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन के अनुसार ही काम करना होगा। इसके अलावा, मंत्रियों और नेताओं के दौरों, उद्घाटन कार्यक्रमों और सार्वजनिक मंचों से होने वाली घोषणाओं पर भी ब्रेक लग जाएगा, जिससे पूरा प्रशासनिक तंत्र चुनाव आयोग के अधीन आ जाएगा।
ईवीएम और बैलेट पेपर का होगा मिलाजुला इस्तेमाल
इस बार होने वाले पंचायत चुनावों में मतदान की प्रक्रिया को लेकर निर्वाचन आयोग ने खास तैयारियां की हैं। अलग-अलग पदों के चुनाव के लिए वोटिंग के तरीके भी भिन्न रखे गए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत स्तर पर होने वाले सरपंच और वार्ड पंचों के चुनाव पारंपरिक बैलेट पेपर यानी मतपत्रों के जरिए ही कराए जाएंगे। वहीं दूसरी ओर, त्रि-स्तरीय पंचायत राज व्यवस्था के बड़े पदों यानी पंचायत समिति सदस्यों और जिला परिषद सदस्यों के चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के माध्यम से संपन्न होंगे।
मतदान की इस दोहरी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिला प्रशासन और निर्वाचन विभाग ने प्रशिक्षण का दौर भी शुरू कर दिया है। ग्रामीण मतदाताओं को जागरूक करने के साथ-साथ मतदान केंद्रों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं ताकि चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से पूरे हो सकें। आयोग की यह कोशिश है कि किसी भी बूथ पर मतदाताओं को लंबी कतारों या तकनीकी दिक्कतों का सामना न करना पड़े।
लगभग 1.69 लाख नए जनप्रतिनिधि संभालेंगे ग्रामीण विकास की कमान
राजस्थान के इस महाकुंभ में बंपर संख्या में जनप्रतिनिधि चुनकर सामने आएंगे। आंकड़ों के मुताबिक, इस पूरी चुनावी प्रक्रिया के जरिए प्रदेश में कुल 1.69 लाख से ज्यादा नए पंचायतीराज प्रतिनिधि चुने जाएंगे। इनमें जिला परिषद सदस्यों से लेकर वार्ड पंचों तक के तमाम पद शामिल हैं। ग्रामीण विकास की धुरी कहे जाने वाले इन पदों पर चुने जाने वाले चेहरे तय करेंगे कि अगले कुछ सालों तक गांवों की सूरत कैसी होगी।
विस्तृत आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेशभर में कुल 1,403 जिला परिषद सदस्य और 8,245 पंचायत समिति सदस्य चुने जाएंगे। ये सभी निर्वाचित सदस्य मिलकर अपने-अपने जिलों में 41 जिला प्रमुख और 457 पंचायत समितियों के प्रधानों का चुनाव करेंगे। इसके साथ ही, राज्य की 14,403 ग्राम पंचायतों में सरपंच और उपसरपंच के अलावा 1,30,584 वार्ड पंचों के लिए भी जनता सीधे मतदान करेगी।
महिलाओं के लिए बंपर आरक्षण और राजनीतिक समीकरण
इन चुनावों का एक सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के लिए मिलने वाला 50 प्रतिशत आरक्षण है। इसके चलते इस बार पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रूप से मजबूत होने जा रही है। बड़ी संख्या में महिलाएं पहली बार चुनकर इन ग्रामीण संस्थाओं की कमान अपने हाथों में लेंगी और स्थानीय शासन में महत्वपूर्ण फैसले लेंगी।
आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के कुल 41 जिला प्रमुखों के पदों में से 20 पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर बीकानेर संभाग के सभी जिलों में जिला प्रमुख का पद महिला के लिए ही आरक्षित रहेगा। इसी तरह, 457 पंचायत समितियों में से 221 प्रधान पद महिलाओं के कोटे में गए हैं। जयपुर और जोधपुर जैसी बड़ी जगहों पर भी 11-11 पंचायत समितियों की प्रधान महिलाएं ही होंगी, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
राजनीतिक दलों और गांवों की सियासत पर असर
पंचायतीराज चुनावों की घोषणा से ठीक पहले प्रदेश की राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों ही इन चुनावों को आगामी विधानसभा या आम चुनावों से पहले जनता के मूड को भांपने के एक बड़े लिटमस टेस्ट के रूप में देख रहे हैं। गांवों के सियासी समीकरण तय करने में जातिगत आंकड़े, स्थानीय मुद्दे और विकास कार्य अहम भूमिका निभाएंगे।
"पंचायतीराज संस्थाएं लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव हैं। इन चुनावों के माध्यम से जमीनी स्तर पर नेतृत्व उभरकर सामने आता है और गांवों के विकास की रूपरेखा तय होती है। निर्वाचन आयोग की पूरी कोशिश है कि चुनाव निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और पारदर्शी हों।" — प्रशासनिक सूत्र, राज्य निर्वाचन आयोग
कुल मिलाकर देखा जाए तो राजस्थान के ग्रामीण अंचल में अब अगले दो महीनों तक चुनावी बयार बहने वाली है। टिकटों की दावेदारी से लेकर बैठकों और रैलियों का दौर शुरू होने जा रहा है। जनता को अब बस चुनाव आयोग के औपचारिक ऐलान का इंतजार है, जिसके बाद गांवों की सरकार चुनने की यह जंग आधिकारिक तौर पर परवान चढ़ जाएगी।








