केरल की राजनीति में बड़ा उलटफेर: तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा के सामने संकट
दक्षिण भारत के राज्य केरल की राजनीति में इस समय जबरदस्त हलचल मची हुई है। राजधानी तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने ऐतिहासिक जीत हासिल कर दशकों पुराना वामपंथी किला ढहा दिया था। भगवा खेमे ने इस जीत को अपनी सबसे बड़ी सफलताओं में गिना था और पूरे राज्य में जश्न का माहौल था। हालांकि, यह खुशी ज्यादा लंबी नहीं टिक पाई और चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों के भीतर पार्टी के भीतर की अंदरूनी कलह और मतभेद खुलकर सड़क पर आ गए।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) आर. श्रीलेखा हैं। हाल ही में हुए निकाय चुनावों में चुनावी मैदान में उतरकर जीत दर्ज करने वाली आर. श्रीलेखा के शास्तमंगलम वार्ड के पार्षद पद से इस्तीफा देने की खबरों ने सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह अंदरूनी कलह समय रहते नहीं सुलझाई गई, तो पार्टी को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
आर. श्रीलेखा के इस कथित कदम के बाद से ही विपक्षी दलों यानी एलडीएफ (LDF) और यूडीएफ (UDF) खेमे में भी रणनीतिक हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दल इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की फिराक में हैं। दूसरी ओर, भाजपा का प्रदेश नेतृत्व इस पूरे गतिरोध को पाटने और नाराज नेताओं को मनाने के लिए लगातार बंद कमरे में बैठकें कर रहा है।
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मेयर की कुर्सी का विवाद और अंदरूनी असंतोष की पूरी कहानी
आखिर आर. श्रीलेखा के बागी तेवर अपनाने की मुख्य वजह क्या रही, इस पर राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नाराजगी की सबसे बड़ी जड़ मेयर का पद न मिलना है। सूत्रों के अनुसार, जब आर. श्रीलेखा अक्टूबर 2024 में भाजपा में शामिल हुई थीं, तब उन्हें यह उम्मीद बंधाई गई थी कि पार्टी उन्हें नगर निगम चुनाव में महापौर (मेयर) पद का चेहरा बनाकर उतारेगी। इसी शर्त और भरोसे के तहत उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखने का फैसला किया था।
लेकिन दिसंबर 2025 में जब चुनाव संपन्न हुए और नतीजे सामने आए, तो पार्टी नेतृत्व ने समीकरणों को साधते हुए वीवी राजेश को महापौर पद के लिए चुन लिया। ऐन वक्त पर हुए इस फैसले से आर. श्रीलेखा असहज महसूस करने लगीं और उनके भीतर का असंतोष धीरे-धीरे बढ़ता चला गया। हालांकि स्थानीय स्तर पर और मीडिया के सामने भाजपा नेताओं ने इन तमाम अटकलों को खारिज करते हुए इसे व्यक्तिगत कारणों से जोड़ा है, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।
दूसरी तरफ, तिरुवनंतपुरम के मेयर ने मीडिया के सामने आकर यह दावा किया है कि आर. श्रीलेखा ने कोई इस्तीफा नहीं दिया है और वह अपने पद पर पूरी तरह बनी हुई हैं। इस विरोधाभासी बयानों के बीच स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है, लेकिन इतना तय है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
अंकगणित का खेल: 50 से घटकर 49 हुई एनडीए पार्षदों की संख्या
तिरुवनंतपुरम नगर निगम के कुल 101 वार्डों में चुनाव हुए थे, जहां जादुई आंकड़ा हासिल करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास कुल 50 पार्षद थे और पार्टी ने एक निर्दलीय पार्षद के समर्थन से नगर निगम की सत्ता अपने हाथों में ली थी। केरल के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी दक्षिणपंथी पार्टी ने इस निगम में अपना बोर्ड बनाया था।
यदि आर. श्रीलेखा का इस्तीफा आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया जाता है, तो नगर निगम परिषद में भाजपा नीत एनडीए की संख्या घटकर 49 रह जाएगी। ऐसे में सदन के भीतर बहुमत का जादुई आंकड़ा बनाए रखना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा। एक अदद पार्षद के कम होने से निगम में पार्टी की स्थिति नाजुक हो सकती है और विपक्ष किसी भी समय अविश्वास प्रस्ताव या सदन में घेराबंदी का दांव चल सकता है।
इसी गणितीय संकट को भांपते हुए भाजपा का केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व तुरंत हरकत में आ गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता नाराज चल रही पूर्व आईपीएस अधिकारी से लगातार संपर्क साध रहे हैं ताकि किसी भी तरह से इस आंतरिक कलह को खत्म किया जा सके और नगर निगम की सत्ता पर पार्टी की पकड़ कमजोर न पड़े।
कौन हैं आर. श्रीलेखा? एक नजर उनके शानदार करियर पर
आर. श्रीलेखा का राजनीतिक और प्रशासनिक करियर बेहद बेदाग और शानदार रहा है। वर्ष 1987 बैच की पूर्व आईपीएस अधिकारी आर. श्रीलेखा केरल कैडर की पहली महिला आईपीएस अफसर होने का गौरव रखती हैं। इसके अलावा, वह केरल पुलिस इतिहास में डीजीपी के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाली भी पहली महिला अधिकारी थीं। अपने लंबे प्रशासनिक सेवाकाल के दौरान उन्होंने कई संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मामलों की जांच की और अपनी एक सख्त व ईमानदार अधिकारी की छवि बनाई।
वर्ष 2020 में केरल फायर एंड रेस्क्यू सर्विसेज के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और देशहित की नीतियों से गहरी प्रभावित होकर उन्होंने अक्टूबर 2024 में औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। पार्टी ने भी उनकी प्रशासनिक छवि को भुनाने के लिए उन्हें स्थानीय निकाय चुनाव में मैदान में उतारा था।
"राजनीति में प्रवेश करने के बाद प्रशासनिक अनुभव और जनभावनाओं के बीच संतुलन बनाना कभी-कभी कठिन हो जाता है। संगठन को हर कार्यकर्ता के सम्मान का ध्यान रखना पड़ता है, खासकर जब कोई दिग्गज अधिकारी राजनीति में नई पारी शुरू कर रहा हो।" — राजनीतिक विश्लेषक
विपक्षी दलों की नजरें और आगे की राजनीतिक राह
केरल जैसे राजनीतिक रूप से बेहद सचेत राज्य में भाजपा के लिए यह जीत जितनी बड़ी थी, उतनी ही बड़ी चुनौती अब इसे बचाए रखने की है। वाम मोर्चे (LDF) और कांग्रेस नीत यूडीएफ (UDF) के दशकों पुराने गढ़ में सेंध लगाने वाली भाजपा के लिए यह आंतरिक उठापटक एक बड़ा झटका साबित हो सकती है। विपक्षी दल इस मौके को गंवाना नहीं चाहते और वे लगातार निगम के अंदर और बाहर दबाव बनाने की रणनीति तैयार कर रहे हैं।
यदि यह विवाद जल्द ही नहीं सुलझा, तो आने वाले दिनों में तिरुवनंतपुरम नगर निगम की राजनीति में और बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल केरल भाजपा के तमाम बड़े दिग्गज इस डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं कि किसी तरह पूर्व डीजीपी का गुस्सा शांत किया जाए और पार्टी की स्थानीय सरकार को सुचारू रूप से आगे बढ़ाया जाए।




