नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की राजनीति से इस वक्त एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। केंद्र सरकार में मंत्री रहे एल मुरुगन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा तत्काल प्रभाव से मंजूर भी कर लिया है। एल मुरुगन ने न सिर्फ मंत्री पद छोड़ा है, बल्कि उन्होंने अपनी राज्यसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है। उनके इस अचानक उठाए गए कदम से राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर उन्होंने यह बड़ा फैसला क्यों लिया है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, एल मुरुगन को अब एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। वे आने वाले दिनों में दक्षिण भारत के अहम राज्य तमिलनाडु में पार्टी का काम संभालेंगे। तमिलनाडु में पार्टी की स्थिति को मजबूत करना इस समय भाजपा के लिए बहुत जरूरी है। एल मुरुगन राज्य के बड़े नेता हैं और जमीन पर उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। पार्टी चाहती है कि वे दिल्ली के कामकाज से मुक्त होकर पूरी तरह तमिलनाडु पर ध्यान दें। आगामी चुनावी रणनीतियों को जमीन पर उतारने के लिए उनका राज्य में रहना बहुत जरूरी माना जा रहा है।
मोदी कैबिनेट से विदाई और नया सियासी रास्ता
एल मुरुगन का मोदी सरकार से बाहर होना इस बात का साफ संकेत है कि पार्टी अब पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुकी है। दक्षिण के राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भाजपा बड़े बदलाव कर रही है। एल मुरुगन को केंद्र सरकार में मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के साथ-साथ सूचना और प्रसारण मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी मिली हुई थी। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई योजनाओं को आगे बढ़ाने का काम किया था। लेकिन अब राष्ट्रीय राजनीति छोड़कर उनका पूरा ध्यान पूरी तरह से क्षेत्रीय राजनीति पर केंद्रित हो गया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि एल मुरुगन का यह फैसला तमिलनाडु में पार्टी की जड़ों को गहरा करने में मदद करेगा। राज्य में द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसी बड़ी पार्टियों के बीच अपनी जगह मजबूत करना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में मुरुगन जैसे कद्दावर नेता का सीधे मैदान में उतरना पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश भरेगा। उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता भी इसलिए छोड़ी है ताकि वे बिना किसी संवैधानिक बंधन के पूरी तरह संगठन के काम को वक्त दे सकें।
तमिलनाडु में भाजपा की नई रणनीति और जमीनी तैयारी
तमिलनाडु की राजनीति में जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दे बहुत मायने रखते हैं। एल मुरुगन दलित समुदाय से आते हैं और राज्य के एक बड़े नेता के तौर पर जाने जाते हैं। उनका इस्तीफा और राज्य वापसी इस बात का सबूत है कि भाजपा अब दक्षिण भारत में बिना किसी समझौते के अपनी सियासी जमीन तैयार करना चाहती है। पार्टी हाईकमान का मानना है कि स्थानीय स्तर पर जनता के बीच रहकर ही पार्टी का दायरा बढ़ाया जा सकता है। दिल्ली में बैठकर राज्य के चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं।
दूसरी ओर, दिल्ली के राजनीतिक हलकों में इस बात की भी चर्चा है कि राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता लगातार राष्ट्रपति को पत्र लिखकर विभिन्न मुद्दों पर दबाव बना रहे हैं। हाल ही में अंकिता भंडारी मामले और अन्य मुद्दों को लेकर भी सियासत गर्म है। हालांकि, एल मुरुगन का इस्तीफा पूरी तरह से सांगठनिक और चुनावी रणनीति से जुड़ा हुआ मामला है। आने वाले हफ्तों में वे चेन्नई पहुंचकर पार्टी के स्थानीय नेताओं के साथ बैठक करेंगे और आगामी रोडमैप तैयार करेंगे।
संगठन को मजबूत करने के लिए बड़ा दांव
भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण के राज्यों में विस्तार के लिए 'साउथ मिशन' पर बहुत पहले से काम शुरू कर दिया है। कर्नाटक के बाद अब पार्टी तमिलनाडु और केरल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है। एल मुरुगन का इस्तीफा इसी रणनीति का एक बहुत अहम हिस्सा है। जब केंद्र का एक बड़ा मंत्री खुद अपनी मर्जी से मंत्री पद छोड़कर राज्य में काम करने जाता है, तो इससे पार्टी का संदेश साफ जाता है। कार्यकर्ता भी यह समझते हैं कि पार्टी के लिए संगठन का काम सरकार में कुर्सी पर बैठने से ज्यादा जरूरी है।
द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है। आने वाले दिनों में यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि एल मुरुगन के तमिलनाडु लौटने के बाद वहां की राजनीति में क्या नए समीकरण बनते हैं। क्या भाजपा उनकी अगुवाई में कोई बड़ा सियासी चमत्कार कर पाएगी या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा। फिलहाल, इस बड़े राजनीतिक बदलाव के बाद तमिलनाडु की सियासत का पारा काफी हाई हो चुका है और सभी दलों की नजरें मुरुगन के अगले कदमों पर टिकी हुई हैं।









