बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ वामपंथियों का बड़ा शंखनाद
देशभर में लगातार विकराल रूप लेती महंगाई और बेरोजगारी की समस्या ने आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। इसी मुद्दे को लेकर हाल ही में एक महत्वपूर्ण सांगठनिक बैठक आयोजित की गई, जिसमें देश की वर्तमान आर्थिक दशा और आम आदमी की बुनियादी परेशानियों पर गंभीर चर्चा हुई। बैठक की अध्यक्षता स्थानीय स्तर पर प्रमुख नेताओं ने की, जबकि मुख्य वक्तृओं ने सरकारों की नीतियों को जनविरोधी करार दिया। वक्ताओं का स्पष्ट कहना था कि मौजूदा समय में देश का मेहनतकश वर्ग और मध्यम वर्ग महंगाई की चक्की में पिस रहा है, लेकिन हुक्मरान जमीनी हकीकत से पूरी तरह मुंह मोड़े हुए हैं।
बैठक के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस जैसी बेहद जरूरी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। आम आदमी के लिए अपने परिवार का भरण-पोषण करना तक मुश्किल हो गया है। सरकार एक ओर जनता को मितव्ययिता का पाठ पढ़ाती है और फिजूलखर्ची रोकने की सलाह देती है, वहीं दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में बड़े आयोजनों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग और जनता के टैक्स के पैसों के इस तरह के इस्तेमाल पर राजनीतिक दलों और नागरिकों में गहरा असंतोष पनप रहा है।
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कृषि संकट और अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर गंभीर सवाल
भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि सेक्टर पर मंडराते खतरों को लेकर भी बैठक में गहरी चिंता व्यक्त की गई। नेताओं ने आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे ट्रेड समझौते देश के करोड़ों किसानों के हितों पर सीधा कुठाराघात हैं। इन समझौतों के कारण घरेलू स्तर पर खेती किसानी की लागत लगातार बढ़ रही है और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। खाद, बीज और अन्य कृषि उपकरणों की बढ़ती कीमतों ने अन्नदाता की कमर तोड़ कर रख दी है।
बुनियादी स्तर पर खेती करने वाले छोटे और सीमांत किसानों के सामने आज अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ सरकारें किसानों की आय दोगुनी करने के बड़े-बड़े दावे करती हैं, तो दूसरी तरफ खाद और बीज की कालाबाजारी तथा मनमाने दामों के कारण किसानों को दर-दर भटकना पड़ता है। शासन-प्रशासन की इस उदासीनता के खिलाफ अब किसानों और मजदूरों में भारी गुस्सा देखने को मिल रहा है, जो कभी भी एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
महिला सुरक्षा और प्रशासनिक विफलताओं पर तीखा हमला
देश और राज्यों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और सुरक्षा के दावों की पोल खोलते हुए नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। 'बेटी बचाو, बेटी पढ़ाओ' जैसे नारों को केवल कागजी और प्रचार का माध्यम बताते हुए कहा गया कि जमीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सरकारें पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं। महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं ने समाज के हर वर्ग को झकझोर कर रख दिया है।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि सुरक्षा और सम्मान के मोर्चे पर सरकार के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं। कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। महिलाओं के अधिकार और उनकी सुरक्षा के लिए अब समाज के हर जागरूक नागरिक को आगे आने की जरूरत है, ताकि सत्ता में बैठे लोगों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराया जा सके।
"केंद्र और राज्य सरकार की जनविरोधी नीतियों के कारण आज देश का किसान, मजदूर और आम नागरिक त्रस्त हो चुका है। महंगाई और बेरोजगारी चरम पर है, इसलिए अब चुप बैठने का समय नहीं है, बल्कि सड़कों पर उतरकर निर्णायक संघर्ष करने की आवश्यकता है।" — प्रभाकर प्रसाद सिंह, बिहार राज्य कार्यकारिणी सदस्य
आगामी आंदोलनों की रूपरेखा और जेल भरो अभियान का ऐलान
जनता की इन तमाम समस्याओं और सरकारों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ एक व्यापक और जोरदार आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर ली गई है। इसके तहत आगामी 28 सितंबर को राजधानी पटना में एक विशाल लोक भवन मार्च निकाले जाने का निर्णय लिया गया है। इस मार्च में हजारों की संख्या में कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को गोलबंद करके सरकार तक सीधी आवाज पहुंचाई जाएगी।
इसके साथ ही, आने वाले महीनों में जिला मुख्यालयों को घेरने की बड़ी रणनीति बनाई गई है। कार्यक्रम के अनुसार, दिसंबर महीने की शुरुआती तारीखों में समाहरणालय का घेराव कर बड़े पैमाने पर 'जेल भरो आंदोलन' का आयोजन किया जाएगा। स्थानीय संगठन ने यह भी तय किया है कि 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के अवसर पर जिला कार्यालयों में सांप्रदायिक सद्भावना दिवस मनाया जाएगा, ताकि समाज में भाईचारा और एकता का संदेश मजबूती के साथ दिया जा सके।





