बिहार में प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की बड़ी मुहिम शुरू
बिहार के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़े दौरे की हलचल तेज हो गई है। राज्य के शासन तंत्र को और अधिक पारदर्शी, जिम्मेदार और जनहित के प्रति समर्पित बनाने के लिए विधानमंडल स्तर पर एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। इसी कड़ी में बिहार विधानसभा की प्रत्यायुक्त विधान समिति का अध्ययन दल-1 आने वाले दिनों में व्यापक राज्यव्यापी दौरे पर निकलने जा रहा है। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकार द्वारा बनाई गई नीतियां, नियम और उपनियम केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका धरातल पर पूरी कड़ाई के साथ पालन हो रहा है या नहीं।
यह दौरा केवल एक सामान्य प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि इसे सरकारी विभागों की कार्यशैली पर पैनी नजर रखने वाले एक बड़े विधायी कदम के रूप में देखा जा रहा है। समिति के इस अभियान से जिला स्तर पर तैनात तमाम महकमों के अधिकारियों में हड़कंप की स्थिति है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान प्रशासनिक अमले ने कितनी दक्षता और ईमानदारी के साथ कामकाज किया है, इसका कच्चा-चिट्ठा अब जनता के प्रतिनिधियों के सामने खुलेगा।
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छह जिलों को बनाया गया है इस विशेष अध्ययन यात्रा का केंद्र
विधान समिति की इस महत्वपूर्ण यात्रा के दायरे में उत्तर और पूर्व बिहार के कुल छह अति महत्वपूर्ण जिले शामिल किए गए हैं। तय कार्यक्रम के अनुसार यह यात्रा मुजफ्फरपुर, दरभंगा, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार जिलों तक विस्तार लेगी। इन सभी जिलों में प्रशासनिक व्यवस्थाओं का बारीकी से अध्ययन किया जाएगा। समिति के सदस्य सीधे तौर पर क्षेत्रीय अधिकारियों से संवाद करेंगे और मैदानी स्तर पर आ रही दिक्कतों के साथ-साथ विभागीय सफलताओं-असफलताओं का जायजा लेंगे।
इन जिलों का चयन बेहद रणनीतिक रूप से किया गया है, क्योंकि ये क्षेत्र विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक निगरानी के लिहाज से काफी संवेदनशील माने जाते हैं। जल संसाधन विभाग समेत कई अन्य प्रमुख महकमों ने इन तमाम जिलों के शीर्ष अधिकारियों को पहले ही आगाह कर दिया है ताकि वे अपनी सभी रिपोर्ट और फाइलें पूरी तरह दुरुस्त रखें। किसी भी स्तर पर लापरवाही पाए जाने पर कड़े प्रशासनिक रुख के संकेत भी दिए गए हैं।
विगत पांच वर्षों के कामकाज और नियमों का होगा कड़ा लेखा-जोखा
इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु पिछले पांच वर्षों के दौरान हुए प्रशासनिक कार्यों की समीक्षा करना है। समिति यह गहराई से जांच करेगी कि शासन के विभिन्न विभागों से जिला स्तर के अधिकारियों को नियम, विनियम, विधि और उपविधि से संबंधित कुल कितने निर्देश प्राप्त हुए। इसके साथ ही, उन निर्देशों को धरातल पर उतारने के लिए क्षेत्रीय पदाधिकारियों द्वारा कौन-कौन से ठोस और सकारात्मक कदम उठाए गए हैं, इस पर भी विस्तार से मंथन किया जाएगा।
कानूनों और नियमों के अनुपालन में यदि कहीं कोई प्रशासनिक कोताही बरती गई है, तो उसकी जवाबदेही भी तय की जाएगी। समिति यह देखेगी कि क्या आम जनता तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए तय प्रक्रियाओं का ईमानदारी से पालन हुआ है या कागजी घोड़े दौड़ाकर इतिश्री कर ली गई है। जनता के पैसों के सदुपयोग और विधायी नियमों की तामील को लेकर यह अब तक की सबसे बड़ी समीक्षा बैठकों में से एक मानी जा रही है।
तारीखों के हिसाब से तय किया गया है पूरा रूट मैप
इस उच्च स्तरीय अध्ययन यात्रा की शुरुआत महीने के अंतिम सप्ताह से होगी और यह अक्टूबर के शुरुआती दिनों तक चलेगी। प्रशासनिक पारदर्शिता की इस यात्रा का एक तय रूट और टाइम टेबल जारी कर दिया गया है, जिसके तहत समिति के सदस्य अलग-अलग तारीखों पर विभिन्न जिलों में डेरा डालेंगे। निर्धारित शेड्यूल के मुताबिक, समिति 28 सितंबर को अररिया पहुंचेगी जहां स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मैराथन बैठक होगी।
इसके ठीक अगले दिन यानी 29 सितंबर को यह टीम किशनगंज का रुख करेगी और वहां के विभागीय कामकाज की समीक्षा करेगी। इसके बाद 30 सितंबर को पूर्णिया जिले में बैठकों का दौर चलेगा, जहां विकास कार्यों की जमीनी रिपोर्ट खंगाली जाएगी। इस व्यापक दौरे का अंतिम चरण एक अक्टूबर को कटिहार जिले में संपन्न होगा, जहां सीमांचल के इन इलाकों से जुड़े प्रशासनिक और विधिक मामलों की अंतिम समीक्षा की जाएगी।
प्रशासनिक अमले में मचा हड़कंप, सुधार के लिए कड़े निर्देश
विधान समिति के इस तयशुदा दौरे की खबर मिलते ही संबंधित जिलों के प्रशासनिक महकमों में रातों-रात तैयारियां तेज हो गई हैं। अधिकारी अपनी पुरानी फाइलों को खंगालने में जुट गए हैं ताकि पिछले पांच वर्षों में किए गए कामों का पूरा और संतोषजनक हिसाब समिति के समक्ष पेश किया जा सके। विभागीय बैठकों का दौर शुरू हो चुका है और कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें सुधारने पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि विधायी समिति के तीखे सवालों के सामने किसी भी तरह की लापरवाही छुप नहीं सकती।
"राज्य के विकास और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रशासनिक पारदर्शिता सबसे पहली शर्त है। विधान समिति का यह दौरा यह सुनिश्चित करने के लिए है कि हर नियम और कानून का लाभ सही मायनों में आम आदमी तक पहुंचे और कोताही बरतने वाले बख्शे न जाएं।" — प्रशासनिक मामलों के जानकार
निष्कर्ष और आगे की प्रशासनिक दिशा
कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार विधानसभा की इस समिति का दौरा नौकरशाही को चुस्त-दुरुस्त करने और जवाबदेही तय करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। जब जनप्रतिनिधि खुद मैदान में उतरकर कागजी दावों और जमीनी हकीकत की तुलना करते हैं, तो व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश स्वतः बढ़ जाती है। अब देखना यह होगा कि इस उच्च स्तरीय अध्ययन यात्रा के बाद प्रशासनिक अमले में किस तरह के सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं और जनता को इसका कितना सीधा लाभ मिलता है।







