महाराष्ट्र का ग्रामीण अर्थतंत्र जिस सहकारी चीनी उद्योग की धुरी पर दशकों से घूमता रहा है, वह इन दिनों गंभीर संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रहा है। राज्य में चालू रहने वाली चीनी मिलों का परिचालन सत्र लगातार छोटा होता जा रहा है। जहां पहले चीनी मिलें साल में 150 से 180 दिनों तक पूरी रफ्तार से चलती थीं, वहीं अब कई प्रमुख मिलें करीब तीन महीने यानी 90 दिनों के भीतर ही पेराई का काम बंद करने को मजबूर हो रही हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने कड़ा कदम उठाया है और संबंधित विभागों को पूरे मामले की पड़ताल कर नया मॉडल तैयार करने का आदेश जारी किया है।
150 दिन का पहिया 90 दिनों में सिमटा: मिलों की भारी मशीनरी पर संकट
चीनी उत्पादन के क्षेत्र में महाराष्ट्र देश के अग्रणी राज्यों में शुमार है। ऐतिहासिक रूप से यहां की मिलें नवंबर से लेकर अप्रैल-मई तक लगातार धुएं उगलती थीं और लाखों टन गन्ने की पेराई होती थी। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह परिदृश्य तेजी से बदला है। अब आलम यह है कि सीजन शुरू होने के तीन महीने बाद ही मिलों के गेट पर ताले लटक जाते हैं। जब मिलें साल के केवल एक चौथाई हिस्से में काम करेंगी और बाकी नौ महीने बंद रहेंगी, तो उनकी महंगी मशीनरी, तकनीकी बुनियादी ढांचा और कर्मचारी साल के अधिकांश समय निष्क्रिय रहते हैं।
सरकार द्वारा गठित मंत्रिस्तरीय समिति की हालिया बैठक में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई। बैठक के कार्यवृत्त के अनुसार, चीनी आयुक्तालय, राज्य सहकारिता विभाग और राज्य सहकारी बैंक को संयुक्त रूप से निर्देश दिया गया है कि वे एक महीने के अंदर व्यापक अध्ययन कर रिपोर्ट पेश करें। सरकार यह समझना चाहती है कि आखिर गन्ने की उपलब्धता और मिलों की वास्तविक क्षमता के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों पैदा हो गया है कि सत्र आधा रह गया है।
"गन्ना पेराई सत्र का समय से पहले सिमट जाना केवल मिलों की आर्थिक सेहत को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि इससे पूरे सहकारिता तंत्र की साख पर सवाल खड़े होते हैं। हमें एक ऐसा व्यावहारिक ढांचा तैयार करना होगा जो उद्योग को दीर्घकालिक स्थिरता दे सके।" — सहकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारी
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कर्ज के जाल में फंसी सहकारी मिलें: पट्टे पर देने की मजबूरी
पेराई सत्र छोटा होने का सबसे सीधा और घातक असर मिलों की वित्तीय सेहत पर पड़ रहा है। किसी भी चीनी मिल को आधुनिक बनाने, नई डिस्टिलरी लगाने या को-जनरेशन पावर प्लांट स्थापित करने के लिए बैंकों से सैकड़ों करोड़ रुपये का कर्ज लिया जाता है। इन कर्जों की किस्तें और ब्याज का भुगतान तभी संभव है जब मिल पूरी क्षमता और पर्याप्त दिनों तक काम करे। जब पेराई 90 दिनों में ही बंद हो जाती है, तो मिलों के पास न तो पर्याप्त चीनी का स्टॉक बन पाता है और न ही उप-उत्पादों (बाय-प्रोडक्ट्स) जैसे एथेनॉल और बगास से होने वाली अतिरिक्त कमाई का लक्ष्य पूरा होता है।
नतीजतन, राज्य की कई ऐतिहासिक सहकारी चीनी मिलें डिफ़ॉल्ट के कगार पर पहुंच चुकी हैं। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि आर्थिक दबाव और परिचालन लागत न निकाल पाने के कारण कई सहकारी मिलों को निजी कंपनियों या बड़े पूंजीपतियों को लीज (पट्टे) पर दिया जा रहा है। यह रुझान सहकारी आंदोलन की मूल भावना के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि सहकारिता का उद्देश्य किसानों को मालिक बनाना था, न कि मिलों को निजी हाथों में सौंपना।
सीमित रकबा और कम उत्पादकता: क्या ड्रिप इरीगेशन बनेगी संजीवनी?
इस पूरे संकट की जड़ में गन्ने की खेती का रकबा और खेत स्तर पर उत्पादकता का सवाल छिपा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि महाराष्ट्र में गन्ने की बुआई का कुल क्षेत्रफल वर्षों से लगभग 13 लाख से 14 लाख हेक्टेयर के आसपास ही बना हुआ है। राज्य में भूजल स्तर की गिरावट और मानसूनी अनिश्चितताओं के चलते रकबे में असीमित विस्तार संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में मिलों की बढ़ती संख्या और उनकी पेराई क्षमता की तुलना में पर्याप्त गन्ना उपलब्ध ही नहीं हो पा रहा है।
विशेषज्ञों ने सरकार को सुझाव दिया है कि केवल गन्ने की बुआई का रकबा बढ़ाने के बजाय प्रति एकड़ उपज बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जाए। इसके लिए खेत स्तर पर माइक्रो-इरिगेशन यानी सूक्ष्म सिंचाई और ड्रिप इरीगेशन का विस्तार करना अनिवार्य होगा। कृषि विभाग और चीनी मिलों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करके किसानों को उन्नत बीज, समय पर खाद और वैज्ञानिक खेती की तकनीक मुहैया करानी होगी। जब तक एक ही खेत से गन्ने का उत्पादन 30 से 40 प्रतिशत तक नहीं बढ़ता, तब तक मिलों के लिए पेराई के दिनों को 150 तक खींच पाना बेहद मुश्किल बना रहेगा।
त्योहारी सीजन में केंद्र का एक्शन: स्टॉक लिमिट से जमाखोरी पर ब्रेक
एक तरफ जहां मिलों के संचालन को लेकर राज्य स्तर पर मंथन चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बाजार में आपूर्ति व्यवस्था को सख्त कर दिया है। त्योहारी सीजन के दौरान चीनी की कृत्रिम कमी और कालाबाजारी रोकने के लिए केंद्र ने चीनी व्यापारियों और थोक डीलरों के लिए कड़े स्टॉक नियम लागू कर दिए हैं। नए निर्देशों के तहत डीलर अब अधिकतम 1,000 क्विंटल चीनी का ही स्टॉक रख सकेंगे और उन्हें यह माल 15 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से बाजार में बेचना होगा।
हालांकि, पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए असम और कोलकाता के व्यापारियों के लिए यह सीमा 2,000 क्विंटल रखी गई है। कोलकाता उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक से चीनी का थोक उठाव कर पूरे पूर्वोत्तर में आपूर्ति करता है, इसलिए वहां नियमों में व्यावहारिक छूट दी गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन सख्त कदमों से अगस्त महीने के उच्च स्तर की तुलना में खुदरा कीमतों में स्थिरता आई है और एक्स-मिल भावों में भी करीब 28 प्रतिशत तक की नरमी दर्ज की गई है।
आम आदमी की रसोई और अन्नदाता की जेब पर क्या होगा असर?
चीनी उद्योग केवल चीनी के उत्पादन तक सीमित नहीं है, यह देश की ऊर्जा सुरक्षा (एथेनॉल सम्मिश्रण) और ग्रामीण आजीविका से सीधे जुड़ा हुआ है। यदि महाराष्ट्र में मिलों का संचालन लंबा खिंचता है, तो किसानों को समय पर उनके गन्ने का सही मूल्य (एफआरपी) मिल सकेगा और भुगतान में होने वाली देरी पर लगाम लगेगी। वहीं दूसरी ओर, जब मिलें साल भर चरणबद्ध तरीके से उत्पादन और बिक्री करेंगी, तो खुले बाजार में चीनी की कीमतों में अचानक आने वाला उछाल भी थमेगा।
राज्य सरकार की इस नई पहल से उम्मीद बंधी है कि अगले एक महीने में तैयार होने वाली संयुक्त रिपोर्ट से एक नया 'ऑपरेशनल मॉडल' सामने आएगा। अगर खेत स्तर पर उत्पादकता बढ़ाने और मिलों की वित्तीय रीस्ट्रक्चरिंग का कोई ठोस फॉर्मूला निकलता है, तो यह न केवल मिलों की चिमनियों को लंबे समय तक धुआं उगलने में मदद करेगा, बल्कि राज्य के लाखों गन्ना उत्पादक किसानों की मेहनत को भी मीठा फल दिला सकेगा।







