नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के ग्रामीण इलाकों में मजदूरी करने वाले गरीब परिवारों की मुसीबतें अचानक बहुत बढ़ गई हैं। मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की जगह लाए गए नए VB G-RAM-G कानून के लागू होने के बाद पहले ही महीने ग्रामीण रोजगार के आंकड़ों में भारी गिरावट देखी गई है। जमीनी रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण इलाकों में लोगों को मिलने वाले काम में सीधे पचास प्रतिशत की बड़ी कमी आई है। इस अचानक आए बदलाव से दिहाड़ी मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। सरकार के इस कदम के खिलाफ अब देश भर के मजदूरों और विपक्षी दलों में भारी गुस्सा देखने को मिल रहा है।
इस पूरे मामले को लेकर देश की सियासत में भूचाल आ गया है और संसद से लेकर सड़क तक विरोध के सुर तेज हो गए हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस नए कानून के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया और विधानसभा का घेराव करने की कोशिश की जिसे पुलिस ने नाकाम कर दिया। वहीं पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने भी केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार पूरी तरह से गरीब विरोधी एजेंडा चला रही है और गरीबों के हक छीिने जा रहे हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि इस नए कानून से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तबाह हो जाएगी और मजदूरों का पलायन तेजी से बढ़ेगा।
विपक्ष का राष्ट्रव्यापी मोर्चा और राहुल गांधी का बड़ा हमला
बढ़ते विरोध के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सरकार को सीधी चुनौती दी है। उन्होंने साफ शब्दों में ऐलान किया है कि इस गरीब विरोधी VB-G RAM G विधेयक को संसद से वापस कराने के लिए देश भर में एक बड़ा राष्ट्रव्यापी मोर्चा बनाया जाएगा। राहुल गांधी का कहना है कि सरकार उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए गरीबों के रोजगार की गारंटी छीन रही है जिसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विपक्षी दलों की योजना है कि इस मुद्दे को गांव-गांव तक ले जाया जाए ताकि केंद्र सरकार पर कानून वापस लेने का दबाव बनाया जा सके। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी टकराव और ज्यादा गहराने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं।
दूसरी ओर, सरकार का पक्ष रख रहे नुमाइंदों का कहना है कि इस नए कानून से ग्रामीण विकास के मॉडल को और अधिक आधुनिक व पारदर्शी बनाया जा रहा है। सरकार का दावा है कि पुरानी व्यवस्था में जो खामियां और लीकेज थीं, उन्हें दूर करने के लिए ही यह बदलाव किया गया है। अधिकारियों का तर्क है कि शुरुआती महीनों में व्यवस्था सेट होने में थोड़ा समय लगता है, इसलिए रोजगार के आंकड़ों में यह गिरावट अस्थायी है। हालांकि, सरकार के इन तर्कों से ग्रामीण इलाकों में काम की तलाश भटक रहे मजदूरों का गुस्सा शांत होता नहीं दिख रहा है। मजदूरों का कहना है कि वादों से उनके चूल्हे नहीं जलते, उन्हें तो हर महीने पक्का काम और समय पर मजदूरी चाहिए।
जमीनी हकीकत और मजदूरों की बढ़ती मुश्किलें
द फ्रीलान्स की टीम ने जब जमीनी स्तर पर जाकर हालात का जायजा लिया तो तस्वीर बेहद डरावनी नजर आई। गांवों में मनरेगा के तहत मिलने वाला काम अचानक बंद होने से मजदूरों के पास आय का कोई दूसरा साधन नहीं बचा है। कई परिवारों ने बताया कि उन्हें पिछले कई हफ्तों से कोई काम नहीं मिला है और वे अपने बच्चों का पेट भरने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो चुके हैं। स्थानीय प्रशासन के पास भी इस अचानक आई मंदी का कोई ठोस समाधान फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। नए पोर्टल और बदली हुई तकनीकी प्रक्रिया के कारण ग्रामीण इलाकों के आम मजदूर असमंजस में हैं कि वे काम के लिए आवेदन कहां और कैसे करें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रामीण रोजगार के मोर्चे पर स्थिति जल्द नहीं सुधरेगी तो देश के गांवों में आर्थिक संकट विकराल रूप ले लेगा। कृषि सत्र के बीच में यदि मजदूरों को काम नहीं मिला तो ग्रामीण क्रय शक्ति यानी खर्च करने की क्षमता पूरी तरह से बैठ जाएगी। इसका सीधा असर देश के कुल बाजार और उपभोक्ता उत्पादों की बिक्री पर भी पड़ेगा। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ग्रामीण भारत की रीढ़ को मजबूत रखे बिना देश की अर्थव्यवस्था का तेजी से आगे बढ़ना संभव नहीं है। अब देखना यह होगा कि सरकार मजदूरों के इस भारी गुस्से और विपक्षी दलों के राष्ट्रव्यापी मोर्चे के जवाब में क्या कदम उठाती है।
आगे की राजनीतिक रणनीति और संभावित टकराव
आने वाले हफ्तों में इस मुद्दे पर देश की राजनीति पूरी तरह से गरमाई रहने की पूरी संभावना है। राजनीतिक दलों ने तय कर लिया है कि इस कानून के विरोध में ग्रामीण क्षेत्रों में चौपालें लगाई जाएंगी और पंचायती राज संस्थाओं के जरिए सरकार पर दबाव बनाया जाएगा। मजदूर यूनियनों ने भी चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही रोजगार के आंकड़े बेहतर नहीं हुए तो वे बड़े पैमाने पर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू करेंगे। द फ्रीलान्स इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और आपको बताता रहेगा कि गांव के गरीब मजदूर की इस लड़ाई में आगे क्या नया मोड़ आता है।








