नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में एक लंबे समय तक अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने एक बार फिर खुलकर अपनी बात रखी है। ताजा घटनाक्रम में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद और देश के विश्वविद्यालयों में चल रहे छात्र आंदोलनों पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि देश में संविधान का उल्लंघन होता है, तो उस पर सवाल उठना और चर्चा होना पूरी तरह स्वाभाविक है। उन्होंने्र अब्राहम लिंकन के करीब दो सौ साल पुराने उस विचार को भी याद किया, जिसमें निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों को सबसे ऊपर रखा गया था।
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और चल रहे सियासी घमासान पर बात करते हुए मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि लोकतंत्र की असली ताकत उसके निष्पक्ष चुनावों में छिपी होती है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बचाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। यदि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होंगे, तो जनता का लोकतंत्र से भरोसा उठ जाएगा। उन्होंने यह भी साफ किया कि विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और केवल विरोध के लिए विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत बनाने में सहयोग देना चाहिए।
छात्रों के आंदोलन पर सरकार को सख्त नसीहत
विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि और अन्य मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हो रही पुलिस कार्रवाई को लेकर भी जोशी ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने मोदी सरकार और प्रशासन को सलाह देते हुए कहा कि बच्चों और छात्रों की बात को हमेशा संवेदनशीलता के साथ सुना जाना चाहिए। छात्रों की आवाज को दबाने के लिए उन पर लाठीचार्ज करना या डंडे बरसाना किसी भी समस्या का सही समाधान नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को युवाओं के साथ संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए और उनकी जायज मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए।
उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। जानकारों का मानना है कि पार्टी के एक वरिष्ठ और संस्थापक सदस्य की ओर से इस तरह की दो टूक बातें आना एक बड़ा संदेश देता है। जोशी हमेशा से अपनी बेबाक और वैचारिक स्पष्टता के लिए जाने जाते रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि लोकतांत्रिक देश में असहमति के स्वरों का सम्मान होना चाहिए और असहमति को कुचलने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।
निष्पक्ष चुनाव और लोकतंत्र की असली कसौटी
अपने लंबे राजनीतिक सफर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि देश ने कई दौर देखे हैं, लेकिन संविधान और चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता से कभी समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के समय में राजनीतिक दलों को अपनी प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। चुनाव आयोग को लेकर जिस तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं, उनका समाधान पारदर्शिता के साथ किया जाना चाहिए ताकि आम नागरिकों के मन में किसी भी प्रकार का संशय न बचे।
स्थानीय स्तर पर भी इस बयान के बाद युवाओं और विभिन्न छात्र संगठनों के बीच सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। छात्रों का कहना है कि एक वरिष्ठ नेता द्वारा उनके पक्ष में बात रखना यह साबित करता है कि विश्वविद्यालयों की आवाज को पूरी तरह दबाया नहीं जा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि जोशी के इस बयान से सरकार पर भी नीतिगत स्तर पर थोड़ा दबाव बढ़ सकता है, खासकर युवा वर्ग से जुड़े मुद्दों को लेकर।
संवाद और सहिष्णुता से ही चलेगा देश
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, मुरली मनोहर जोशी का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश की राजनीति में ध्रुवीकरण और विरोध प्रदर्शन अपने चरम पर हैं। उन्होंने साफ तौर पर यह संदेश देने की कोशिश की है कि देश को चलाने के लिए संवाद और सहिष्णुता सबसे बड़े हथियार हैं। डंडे और बल का प्रयोग लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि सरकार और विपक्ष इस सलाह को कितनी गंभीरता से लेते हैं और किस प्रकार अपनी नीतियों में बदलाव करते हैं।





