देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हाल ही में हुए एक सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर नाबालिग बच्चों की भागीदारी और उनकी सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला तूल पकड़ता जा रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस घटना पर गहरी नाराजगी जताई है और संबंधित अधिकारियों को सख्त कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। आयोग के इस कदम के बाद से राजनीतिक गलियारों और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि बच्चों को इस तरह के आयोजनों में झोंकना सीधे तौर पर बाल अधिकारों का हनन माना जा रहा है।
मानवाधिकार आयोग की सख्त कार्रवाई और जांच के आदेश
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया है। आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने इस पूरे प्रकरण को रखा गया, जिसके बाद मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के अंतर्गत औपचारिक संज्ञान लिया गया। यह शिकायत सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन के हेड ऑफ इंटरवेंशन सतीश वैद की ओर से दर्ज कराई गई थी। शिकायत में इस बात के पुख्ता प्रमाण दिए गए कि किस प्रकार प्रदर्शन के दौरान एक मासूम बच्चे को भीड़ के बीच हवा में उठाया गया और उससे उकसाने वाले नारे लगवाए गए।
आयोग ने इस बात की भी आशंका जताई है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रशासन की कड़ी कार्रवाई से बचने के लिए सुनियोजित तरीके से बच्चों को आगे किया गया होगा ताकि उनकी नाबालिग स्थिति का लाभ उठाकर कानून के शिकंजे से बचा जा सके। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए NHRC ने मुंबई पुलिस कमिश्नर, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), भारत में X Corp. के ग्रिवांस ऑफिसर और महाराष्ट्र के महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रधान सचिव को आधिकारिक नोटिस जारी किया है।
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सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और डिजिटल फॉरेंसिक जांच
इस पूरे विवाद के केंद्र में वे तस्वीरें और वीडियो हैं जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से प्रसारित हुए। आयोग ने इन सभी डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और उनकी फॉरेंसिक जांच कराने के निर्देश दिए हैं। जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या इन बच्चों को प्रदर्शन में शामिल करने की साजिश पहले से रची गई थी और इसके लिए किन-किन सोशल मीडिया ग्रुप्स या चैट का इस्तेमाल किया गया था।
आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जहां कहीं भी संज्ञेय अपराध (कॉग्निजेबल ऑफेंस) बनता है, वहां बिना किसी देरी के तुरंत एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए। इसके अलावा, जिन सोशल मीडिया अकाउंट्स से इन बच्चों के वीडियो और तस्वीरें धड़ल्ले से शेयर की गईं, उनकी भी तकनीकी जांच की जाएगी। X Corp. और MeitY को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि बच्चों की निजता और सुरक्षा से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने वाले कंटेंट पर तुरंत कार्रवाई हो।
बच्चों के अधिकारों और किशोर न्याय अधिनियम का शिकंजा
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की विभिन्न धाराओं के तहत भी शिकंजा कसने की तैयारी है। आयोग ने निर्देश दिए हैं कि इस बात की गहराई से जांच की जाए कि क्या इस घटना में किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 और 83(2) लागू होती है या नहीं। पुलिस को यह पता लगाने को कहा गया है कि वे कौन लोग थे जिन्होंने बच्चों को इन परिस्थितियों में धकेला, चाहे वे आयोजक हों, कोऑर्डिनेटर हों या फिर उनके साथ मौजूद कोई अन्य वयस्क।
"बच्चों को अपनी राजनीतिक या वैचारिक लड़ाइयों में ढाल के रूप में इस्तेमाल करना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। कानून का उल्लंघन करने वालों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।"— बाल अधिकार विशेषज्ञ
महाराष्ट्र के महिला एवं बाल विकास विभाग को भी इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया गया है। विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रभावित बच्चों का समुचित बचाव हो और उनकी देखभाल में कोई कमी न आए। जरूरत पड़ने पर इन बच्चों को बाल कल्याण समिति (CWC) के समक्ष पेश किया जाएगा, जहां उन्हें जरूरी काउंसलिंग, मनोसामाजिक सहायता और सुरक्षित पुनर्वास मुहैया कराया जाएगा ताकि उनके कोमल मन पर इस घटना का कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
एक सप्ताह के भीतर मांगी गई एक्शन टेकन रिपोर्ट
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्चों की पहचान, उनकी गरिमा और निजता की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने को कहा है। मीडिया या सोशल मीडिया पर बच्चों के चेहरे या पहचान को उजागर करने वाले माध्यमों पर भी कानूनी कार्रवाई की गाज गिर सकती है। आयोग ने सभी संबंधित विभागों और अधिकारियों को चेतावनी देते हुए एक सप्ताह के भीतर विस्तृत 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' (ATR) दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि मुंबई पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियां इस मामले में कितनी तेजी से और किस दिशा में कार्रवाई करती हैं। इस घटना ने एक बार फिर से इस राष्ट्रीय बहस को जिंदा कर दिया है कि क्या अपने हितों को साधने के लिए नाबालिगों को प्रदर्शनों की भीड़ में धकेलना बच्चों के बुनियादी अधिकारों का घोर उल्लंघन नहीं है। आने वाले दिनों में इस मामले में कई बड़े खुलासे होने की पूरी संभावना है।








