संसद के शीतकालीन सत्र में जारी गतिरोध के बीच राजघाट पर विपक्षी दलों का शक्ति प्रदर्शन
भारतीय संसद के वर्तमान सत्र में लगातार चल रहे हंगामे और गतिरोध के बीच विपक्षी दलों के सांसदों ने एक नए और प्रतीकात्मक विरोध का रास्ता चुना है। राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक राजघाट पर आज सुबह विपक्षी सांसदों का एक बड़ा काफिला पहुंचा। महात्मा गांधी की समाधि स्थल पर इन सभी सांसदों ने देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और संसदीय प्रणाली के हालातों को लेकर मौन धरना दिया।
संसद भवन से निकलकर सीधे राजघाट पहुंचे इन सांसदों के हाथों में संविधान की प्रतियां और देश में लोकतांत्रिक मर्यादाओं की बहाली से जुड़े नारे लिखे बैनर नजर आए। विपक्ष का कहना है कि संसद के भीतर उनकी आवाज को लगातार कुचला जा रहा है और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा से सरकार बच रही है। इसी के विरोध स्वरूप राष्ट्रपिता बापू की शरण में आकर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात देश के सामने रखने का यह निर्णय लिया गया है।
विपक्ष के इस प्रदर्शन में देश की कई प्रमुख विपक्षी पार्टियों के वरिष्ठ नेता और सांसद शामिल रहे। सुबह से ही राजघाट परिसर के आसपास सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे ताकि किसी भी प्रकार की असुविधा से बचा जा सके। विपक्षी नेताओं ने एक सुर में कहा कि देश के संघीय ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं पर जिस तरह के खतरे मंडरा रहे हैं, उसके खिलाफ जनता को जागरूक करना उनका नैतिक दायित्व है।
महात्मा गांधी की समाधि के समक्ष मौन व्रत और संविधान की रक्षा का संकल्प
राजघाट पर पहुंचे सांसदों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर पुष्प अर्पित किए और उसके बाद वहां मौन व्रत धारण कर बैठ गए। इस दौरान विपक्षी खेमे के नेताओं ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि महात्मा गांधी ने हमेशा सत्य, अहिंसा और संवाद की वकालत की थी, लेकिन वर्तमान सरकार संसद के भीतर संवाद की हर परंपरा को तोड़ने का काम कर रही है।
सांसदों का यह भी आरोप था कि देश की बुनियादी समस्याओं पर सदन के अंदर चर्चा कराने की मांग करने पर विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया जाता है या उनकी माइक म्यूट कर दी जाती है। ऐसे में जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए महात्मा गांधी के सिद्धांतों का स्मरण करना और उनके मार्ग पर चलकर सरकार को आईना दिखाना ही एकमात्र विकल्प बचता है।
धरने के दौरान विपक्षी दलों के नेताओं ने आपाधापी भरी राजनीति से ऊपर उठकर देश के संविधान और भाईचारे को बचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि आज देश की जो सामाजिक और राजनीतिक आबोहवा है, वह गांधीजी के सपनों के भारत के बिल्कुल विपरीत है। विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट किया कि जब तक सरकार तानाशाही रवैया छोड़2कर लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान नहीं करती, उनका यह वैचारिक संघर्ष विभिन्न माध्यमों से जारी रहेगा।
संसदीय कार्यवाही के बहिष्कार और विरोध की नई रणनीति पर मंथन
राजघाट पर हुए इस धरने को महज एक सांकेतिक विरोध नहीं बल्कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर अपनाई जाने वाली बड़ी रणनीतिक तैयारियों का हिस्सा माना जा रहा है। विपक्षी दलों के फ्लोर लीडर्स लगातार इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए किस तरह से जनता के बीच जाया जाए।
सांसदों का कहना है कि वे हर उस मंच का इस्तेमाल करेंगे जहां देश के आम नागरिकों की आवाज को बुलंद किया जा सके। संसद के भीतर भले ही सत्ता पक्ष के पास बहुमत का संख्या बल हो, लेकिन सड़क से लेकर समाधि स्थलों तक जनता के मुद्दों को गूंजने से रोकने में सरकार कामयाब नहीं हो पाएगी। विपक्ष की इस लामबंदी से दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी काफी बढ़ गई है और आने वाले दिनों में सदन की कार्यवाही बेहद हंगामेदार रहने के पूरे आसार हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शीतकालीन सत्र के इन आखिरी दिनों में विपक्ष का यह आक्रामक रुख सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। हालांकि, सरकार की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि वह हर मुद्दे पर नियम-कानून के तहत चर्चा करने को तैयार है, बशर्ते सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलने दिया जाए।
"देश के संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की हर साजिश का हम पुरजोर विरोध करेंगे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्श ही आज हमें अन्याय के खिलाफ लड़ने की शक्ति दे रहे हैं।" — विपक्षी सांसद प्रतिनिधिमंडल
आम जनता से जुड़े मुद्दों पर संसद में चर्चा न होने का मलाल
धरना स्थल पर मौजूद कई युवा सांसदों ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि देश में महंगाई, बेरोजगारी, किसानों के मुद्दे और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों पर संसद के भीतर सार्थक बहस नहीं हो पा रही है। उनका कहना है कि करदाताओं के पैसों से चलने वाली संसद यदि जनता के काम न आ सके, तो ऐसी कार्यप्रणाली का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि देश की जनता जिन उम्मीदों के साथ अपने प्रतिनिधियों को चुनकर भेजती है, उन उम्मीदों पर पानी फेरा जा रहा है। राजघाट पर मौन धरने के जरिए उन्होंने देशवासियों को यह संदेश देने का प्रयास किया है कि वे संसद के भीतर और बाहर दोनों जगहों पर जनहित की लड़ाई पूरी मजबूती के साथ लड़ते रहेंगे।
इस विरोध प्रदर्शन के बाद अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार और विपक्ष के बीच किसी प्रकार की आम सहमति बन पाती है या फिर संसद के शेष सत्र में गतिरोध और गहराएगा। फिलहाल राजनीतिक पटल पर यह घटनाक्रम एक नया मोड़ लेकर आया है।











