ड्रोन हमलों से परेशान पाकिस्तान अब उनसे निपटने के लिए एक ऐसा तरीका अपना रहा है, जिसे देखकर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल है। अफगानिस्तान की सीमा से लगे खैबर पख्तूनख्वा में कुछ पुलिस और सुरक्षा चौकियों के ऊपर मछली पकड़ने वाले जाल लगाए जा रहे हैं। इसका मकसद है- विस्फोटक लेकर आने वाले ड्रोन को हवा में ही रोकना या उसके हमले का असर कम करना।
पाकिस्तान के इस अजीबोगरीब इंतजाम की जानकारी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, हंगू जिले में ड्रोन हमलों के खतरे के बीच पुलिस ने चौकियों की छतों और बाहरी दीवारों के बीच जाल तान दिए हैं। यही तरीका अब अफगानिस्तान सीमा के पास स्थित दूसरे संवेदनशील इलाकों में भी अपनाया जा रहा है।
ड्रोन के प्रोपेलर जाल में फंसाने की कोशिश
इस व्यवस्था के पीछे सीधा-सा तर्क है। अगर कोई ड्रोन चौकी के ऊपर उड़ता हुआ आता है और उसका प्रोपेलर जाल में उलझ जाता है तो वह नीचे गिर सकता है या उसे रोका जा सकता है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, ड्रोन जाल में फंसने पर उसे निष्क्रिय करने या रोकने की संभावना रहती है।
पुलिस का यह भी मानना है कि अगर ड्रोन जाल के ठीक ऊपर विस्फोट कर देता है तो उसके छर्रे और मलबे का कुछ हिस्सा सीधे नीचे मौजूद जवानों तक पहुंचने के बजाय अलग दिशा में फैल सकता है। यानी जाल को किसी आधुनिक एंटी-ड्रोन सिस्टम के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त सुरक्षा परत के रूप में देखा जा रहा है। हंगू में इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत उस समय ज्यादा महसूस हुई, जब अप्रैल में एक पुलिस चौकी पर ड्रोन हमला हुआ था, जिसके बाद टीटीपी के लड़ाकों ने सुरक्षा बलों पर गोलीबारी भी की थी।
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महंगे डिफेंस सिस्टम की जगह सस्ता जुगाड़
मछली पकड़ने वाले जाल का एक बड़ा फायदा इसकी कम कीमत बताई जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक सामान्य पुलिस चौकी को इस तरह के जाल से ढकने में करीब 4 लाख पाकिस्तानी रुपये यानी लगभग 1.3 लाख भारतीय रुपये खर्च होते हैं।
इसके मुकाबले आधुनिक ड्रोन रोधी प्रणालियां काफी महंगी होती हैं। यही वजह है कि सीमित संसाधनों वाली चौकियों के लिए जाल को एक सस्ता अतिरिक्त सुरक्षा उपाय माना जा रहा है। हंगू के अलावा कोहाट, करक, बन्नू, लक्की मरवत और डेरा इस्माइल खान जैसे जिलों में भी संवेदनशील चौकियों के ऊपर इस तरह के जाल लगाए जाने की जानकारी सामने आई है।
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