सरकारी दफ्तरों के चक्कर और दशकों पुराना संघर्ष
देशभर में सरकारी महकमों की कार्यशैली और लालफीताशाही अक्सर आम नागरिकों के लिए जी का जंजाल बन जाती है। आम आदमी जब अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए दफ्तरों की सीढ़ियां चढ़ता है, तो उसे महीनों और कभी-कभी सालों का लंबा इंतजार करना पड़ता है। लेकिन जब यह इंतजार तीन दशकों यानी 36 साल से भी ज्यादा लंबा हो जाए, तो किसी भी इंसान का धैर्य टूटना लाजिमी है। कुछ ऐसा ही मार्मिक और झकझोर देने वाला मामला हाल ही में एक उच्च स्तरीय पेंशन अदालत के दौरान देखने को मिला, जहां न्याय की आस लगाए एक बुजुर्ग का सब्र आखिरकार आंसुओं के रूप में छलक पड़ा।
जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) द्वारा आयोजित इस विशेष पेंशन अदालत में दूर-दराज के इलाकों से कई फरियादी अपनी उम्मीदें लेकर पहुंचे थे। अधिकारियों का उद्देश्य यही था कि वर्षों से अटके मामलों का मौके पर ही निपटारा किया जा सके। इस दौरान एक ऐसा वाकया हुआ जिसने वहां मौजूद हर शख्स को अंदर तक हिलाकर रख दिया। न्याय की गुहार लगाते-लगाते एक फरियादी विभाग के बड़े अधिकारी के सामने ही अपने आंसू नहीं रोक पाया और बुरी तरह रोने लगा।
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सांभरलेक से आया था दर्द और उम्मीदों का पिटारा लेकर
यह पूरा मामला सांभरलेक क्षेत्र से ताल्लुक रखता है, जहां से राजेश वर्मा नामक व्यक्ति अपनी बुजुर्ग मां को लेकर इस उम्मीद के साथ पहुंचे थे कि शायद इस बार उनकी वर्षों पुरानी सुनवाई हो जाएगी। राजेश वर्मा के अनुसार, उनके परिवार को पिछले 36 सालों से लगातार प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। उनके पिता के निधन के बाद से ही उनकी मां के हिस्से की पेंशन का मामला सरकारी फाइलों में ऐसा उलझा कि आज तक सुलझ नहीं पाया। इस लंबे अंतराल में न जाने कितने अधिकारी आए और चले गए, नियमों की दुहाई दी गई, लेकिन फाइल आगे नहीं बढ़ सकी।
राजेश वर्मा ने बताया कि वे अपनी मां को बुजुर्ग अवस्था में भी दफ्तर-दफ्तर लेकर जाने को मजबूर हैं। हर बार उन्हें केवल आश्वासन और तारीखें ही मिलती रहीं, लेकिन नतीजे के नाम पर हमेशा निराशा ही हाथ लगी। इतने लंबे समय तक चले इस मानसिक और शारीरिक संघर्ष ने इस परिवार को पूरी तरह तोड़ दिया है। जब अदालत में उनकी बारी आई, तो उनका दर्द शब्दों के जरिए बाहर आने के बजाय आंसुओं के सैलाब में बदल गया।
प्रमुख सचिव के सामने फफक पड़ा फरियादी, मची खलबली
पेंशन अदालत की अध्यक्षता कर रहे प्रमुख सचिव हेमंत गेरा जब फरियादियों की समस्याएं व्यक्तिगत रूप से सुन रहे थे, तभी राजेश वर्मा अपनी व्यथा बताते-बताते अचानक फफक-फफक कर रो पड़े। उन्होंने हाथ जोड़कर अपनी मां की दयनीय स्थिति का हवाला दिया और कहा कि वे बूढ़ी मां को लेकर कहां-कहां भटकें। इस मार्मिक दृश्य को देखकर वहां मौजूद अधिकारी भी कुछ पलों के लिए अवाक रह गए। एक नागरिक की ऐसी लाचारी और सरकारी तंत्र की सुस्ती पर हर कोई स्तब्ध था।
"साहब, हम पिछले 36 साल से अपनी मां की पेंशन के लिए दर-दर भटक रहे हैं, कोई हमारी सुनने वाला नहीं है। हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता है, लेकिन हक नहीं मिलता।" — राजेश वर्मा, पीड़ित फरियादी
इस प्रकार की घटनाएं इस बात की तस्दीक करती हैं कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक संवेदनशीलता कितनी गायब हो चुकी है। फाइलों के लाल फीते में उलझे मामलों के कारण कैसे आम इंसानों की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा दफ्तरों के चक्कर काटते हुए बीत जाता है, यह इसका जीता-जागता उदाहरण है।
प्रमुख सचिव हेमंत गेरा का सख्त रुख और रिपोर्ट तलब
फरियादी का दर्द और रोना सुनने के बाद प्रमुख सचिव हेमंत गेरा ने मामले की गंभीरता को तुरंत भांप लिया। उन्होंने न सिर्फ बुजुर्ग को ढांढस बंधाया, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर हुई इस भयानक देरी को लेकर कड़ी नाराजगी भी व्यक्त की। उन्होंने तुरंत मौके पर मौजूद मुख्य अभियंता (प्रशासन) मुकेश बंसल को तलब किया और इस पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए।
अधिकारियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि आखिर 36 साल तक एक ही मामले को लटकाए रखने के पीछे कौन-कौन से जिम्मेदार कारक रहे हैं, इसकी पूरी छानबीन की जाए। जनता की शिकायतों के त्वरित निस्तारण के लिए लगाई जाने वाली ऐसी अदालतें तभी सार्थक साबित हो सकती हैं जब वर्षों पुरानी फाइलों का निस्तारण प्राथमिकता के आधार पर हो। अब देखना यह होगा कि इस उच्च स्तरीय हस्तक्षेप के बाद क्या वाकई पीड़ित परिवार को उनका हक मिल पाता है या यह आदेश भी फाइलों में ही दफन होकर रह जाता है।
निष्कर्ष
सरकारी व्यवस्था और नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर यह घटना एक गंभीर सवालिया निशान लगाती है। जब तक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी संवेदनशीलता के साथ नहीं निभाएंगे, तब तक आम जनता को इसी तरह अदालतों और दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे। इस मामले में अब प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर सबकी नजर टिकी हुई है।




