इंदौर में राहुल गांधी के कार्यक्रम पर सियासी पारा चढ़ा
मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आगामी कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्मा गया है। आगामी 19 सितंबर को इंदौर में 'छात्रों की गूंज' नाम से एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया जाना है। इस आयोजन से ठीक पहले सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन द्वारा तय की गई शर्तों को लेकर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं। स्थानीय पुलिस प्रशासन ने इस कार्यक्रम के शांतिपूर्ण आयोजन और सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए कुल 31 शर्तें रखी हैं। इन शर्तों में आयोजन स्थल पर भारी भीड़ को नियंत्रित करने से लेकर लोगों के आने-जाने के रास्तों और सुरक्षा प्रबंधों की संयुक्त जिम्मेदारी तय की गई है।
हालांकि, यह मामला तब तूल पकड़ गया जब कांग्रेस पार्टी ने दावा किया कि पुलिस द्वारा दिए गए सुरक्षा शर्तों वाले आधिकारिक दस्तावेज में वर्मा आयोग की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। कांग्रेस का आरोप है कि इस दस्तावेज में 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में हुई उस दर्दनाक घटना का जिक्र किया गया है, जिसमें देश के पूर्व प्रधानमंत्री और राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। विपक्षी दल इस बात से बेहद नाराज है कि किसी राजनीतिक कार्यक्रम की अनुमति के दौरान इस तरह के ऐतिहासिक और संवेदनशील संदर्भों का उपयोग क्यों किया गया।
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वर्मा आयोग की रिपोर्ट और राजीव गांधी हत्याकांड का जिक्र
भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे संवेदनशील पन्नों में से एक राजीव गांधी हत्याकांड की गूंज अब मध्य प्रदेश के स्थानीय प्रशासन और पुलिस के सुरक्षा दस्तावेजों में सुनाई दे रही है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, देश के शीर्ष नेताओं की सुरक्षा के तय प्रोटोकॉल और ऐतिहासिक सुरक्षा चूकों से सबक लेते हुए आयोजकों को सतर्क करने के लिए इस रिपोर्ट का संदर्भ दिया गया है। 21 मई 1991 को एक चुनावी सभा के दौरान आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की जान चली गई थी, जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था की खामियों की जांच के लिए वर्मा आयोग का गठन किया गया था।
मध्य प्रदेश पुलिस का पक्ष है कि राहुल गांधी को देश में जेड-प्लस सुरक्षा श्रेणी प्राप्त है और उनकी सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार की चूक से बचने के लिए स्थानीय प्रशासन पूरी तरह गंभीर है। एडिशनल डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस राजेश डंडोतिया ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा दस्तावेजों में वर्मा आयोग की रिपोर्ट का उल्लेख इसलिए किया गया है ताकि बड़े सार्वजनिक आयोजकों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया जा सके। इसमें कार्यक्रम स्थल पर बैरिकेडिंग, प्रवेश और निकासी द्वारों की उचित व्यवस्था जैसे बिंदु शामिल हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।
कांग्रेस नेताओं का तीखा हमला: 'बीजेपी बेशर्मी की हदें पार कर रही है'
सुरक्षा शर्तों में राजीव गांधी हत्याकांड का जिक्र आने के बाद कांग्रेस आक्रामक मुद्रा में आ गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार और पुलिस प्रशासन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि राज्य की बीजेपी सरकार ने बदले की भावना और ओछी राजनीति की सभी हदें पार कर दी हैं। उन्होंने कहा कि पहले केंद्र सरकार ने साल 2019 में राहुल गांधी की एसपीजी सुरक्षा वापस ली और अब उनके स्थानीय कार्यक्रम के लिए अनुमति देते समय उनके दिवंगत पिता की हत्या का हवाला देकर एक तरह से मानसिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।
पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने भी इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि प्रशासन का यह रवैया बेहद निंदनीय है।
"मध्य प्रदेश पुलिस ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी हैं। पहले राहुल गांधी जी को इंदौर में होने वाले छात्रों की गूंज कार्यक्रम से पहले उनके पिता, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी की दुखद हत्या का हवाला देकर धमकाने की कोशिश की गई। यह तानाशाही कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।" — पवन खेड़ा, मीडिया प्रमुख, कांग्रेस
कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सत्ताधारी पार्टी हरसंभव यह कोशिश कर रही है कि राहुल गांधी के इस बड़े युवा कार्यक्रम में किसी तरह की बाधा उत्पन्न की जाए और युवाओं को उनसे जुड़ने से रोका जाए।
बीजेपी ने कांग्रेस के इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि विपक्ष हर मुद्दे पर अनावश्यक राजनीति करने की आदत से मजबूर है। राज्य के बीजेपी प्रवक्ता राकेश सिंह यादव ने बयान जारी कर कहा कि कांग्रेस पार्टी कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों की वास्तविक संख्या और अन्य जरूरी प्रशासनिक जानकारियों को साझा करने में सहयोग नहीं कर रही है।
उन्होंने कहा, “वर्मा आयोग की रिपोर्ट का हवाला केवल और केवल राहुल गांधी की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए एक एहतियात के तौर पर दिया गया है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से बचा जा सके। अगर कांग्रेस सहयोग नहीं करती और बाद में कोई अव्यवस्था फैलती, तो वे इसका पूरा ठीकरा प्रशासन और सरकार पर फोड़ने की कोशिश करते।” बीजेपी का कहना है कि पुलिस प्रशासन अपने नियमों और दायित्वों के तहत काम कर रहा है और इसमें किसी भी प्रकार की राजनीतिक दुर्भावना नहीं है।
वॉलंटियर्स की फौज और मैदान को लेकर हुआ था विवाद
पुलिस द्वारा तय की गई 31 शर्तों के मुताबिक, इस कार्यक्रम के सफल और शांतिपूर्ण आयोजन के लिए कांग्रेस को भारी-भरकम बंदोबस्त करने होंगे। शर्तों के अनुसार, आयोजकों को कार्यक्रम स्थल पर कम से कम 1,500 वॉलंटियर्स तैनात करने की सख्त हिदायत दी गई है। इनमें से कम से कम 500 वॉलंटियर महिलाएं होंगी, जो भीड़ प्रबंधन में सहयोग करेंगी। इसके अलावा, यदि तय क्षमता से अधिक भीड़ मैदान में पहुंचती है, तो पुलिस के पास भीड़ के प्रवेश को रोकने का पूरा अधिकार सुरक्षित रहेगा। साथ ही, किसी भी धर्म, जाति या समुदाय के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी या आपत्तिजनक बैनर-पोस्टर लगाने पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है।
इससे पहले इस कार्यक्रम के वेन्यू को लेकर भी काफी खींचतान देखने को मिली थी। शुरुआत में कांग्रेस ने इंदौर के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में यह कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए साफ कर दिया था कि स्टेडियम का इस्तेमाल केवल खेल गतिविधियों या सरकारी आयोजकों के लिए ही किया जा सकता है। इसके चलते कांग्रेस को अपना प्लान बदलना पड़ा और उन्होंने 19 सितंबर की नई तारीख तय करते हुए रीजनल पार्क के सामने स्थित जमीन के लिए आवेदन किया। इस जमीन के लिए पार्टी ने इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) के पास तीन दिन के अस्थायी लीज के रूप में 10 लाख रुपये से अधिक की राशि भी जमा कराई, जिसे लेकर बाद में अतिरिक्त शुल्कों पर भी राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिली थी।
निष्कर्ष: सुरक्षा बनाम सियासत की जंग में आगे क्या?
राहुल गांधी के इंदौर दौरे को लेकर छिड़ा यह विवाद स्पष्ट करता है कि देश में राजनीतिक दलों के बीच हर छोटे-बड़े प्रशासनिक फैसले को भी किस तरह वैचारिक और चुनावी जंग का अखाड़ा बना दिया जाता है। एक तरफ जहां पुलिस प्रशासन अपनी संवैधानिक और सुरक्षात्मक जिम्मेदारियों का हवाला दे रहा है, वहीं मुख्य विपक्षी दल इसे अपनी आवाज दबाने और दिवंगत नेता की शहादत का राजनीतिकरण करने का प्रयास मान रहा है। 19 सितंबर को होने वाले इस 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम पर अब न सिर्फ राजनीतिक विश्लेषकों बल्कि आम जनता की भी पैनी नजर टिकी हुई है, क्योंकि सुरक्षा और अनुमति की इन तमाम बंदिशों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अपने इस आयोजन को किस तरह सफल बनाती है और यह सियासी पारा आने वाले दिनों में क्या नया मोड़ लेता है।







