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मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का कायाकल्प: सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल पर देने की तैयारी, उठ रहे सवाल

मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य के 9 सरकारी मेडिकल कॉलेजों और 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत चलाने का फैसला किया है। इस कदम से स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसे लेकर विरोध के सुर भी उठने लगे हैं।
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24 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का कायाकल्प: सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल पर देने की तैयारी, उठ रहे सवाल
📷 मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का कायाकल्प: सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल पर देने की तैयारी, उठ रहे सवाल — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • मध्य प्रदेश सरकार 9 सरकारी मेडिकल कॉलेजों और 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पीपीपी मॉडल पर सौंपने की योजना बना रही है।
  • पिछले दो दशकों में राज्य में एमबीबीएस सीटों की संख्या में चार से पांच गुना की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
  • सरकार का मानना है कि इस मॉडल से डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी।
  • मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन ने आशंका जताई है कि इससे इलाज और शिक्षा महंगी हो सकती है।
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मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव

देश के सबसे बड़े राज्यों में शुमार मध्य प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे में एक बड़ा और अहम बदलाव होने जा रहा है। राज्य की मोहन यादव सरकार ने सूबे के कई सरकारी मेडिकल संस्थानों को निजी हाथों के सहयोग से संचालित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इस नई व्यवस्था के तहत कई जिलों के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य केंद्रों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल पर सौंपने की तैयारी अंतिम चरण में है। सरकार का दावा है कि इस पहल से दूरदराज के इलाकों में भी मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा और डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे अस्पतालों को राहत मिलेगी। हालांकि, इस फैसले के सामने आते ही चिकित्सा जगत में बहस छिड़ गई है और इसके दूरगामी प्रभावों को लेकर तमाम तरह की आशंकाएं जताई जा रही हैं।

इस पूरी नीति के तहत राज्य सरकार लगभग नौ सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अठारह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी साझीदारों के साथ मिलकर चलाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है। दिलचस्प बात यह है कि जिन संस्थानों को इस सूची में शामिल किया गया है, उनमें से कई पर पहले ही जनता के खून-पसीने की कमाई से भारी-भरकम निवेश किया जा चुका है। जानकारों के अनुसार, इन कॉलेजों पर अब तक करीब चार हजार करोड़ रुपये का सरकारी धन खर्च हो चुका है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की हिस्सेदारी शामिल है। ऐसे में, पहले से ही संचालित हो रहे सरकारी संस्थानों को निजी भागीदारी के हवाले करना एक बड़ा नीतिगत कदम माना जा रहा है।

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एमबीबीएस सीटों में भारी बढ़ोतरी और मौजूदा स्थिति

बीते कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश के भीतर मेडिकल एजुकेशन के क्षेत्र में सीटों के लिहाज से उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, शैक्षणिक सत्र 2026-27 के दौरान प्रदेश के कुल 34 मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की कुल 6,120 सीटें उपलब्ध हैं। इनमें से 20 सरकारी कॉलेज हैं जिनके पास 3,020 सीटें हैं, जबकि 14 निजी कॉलेज 3,100 सीटों का संचालन कर रहे हैं। यदि हम दो दशक पीछे यानी साल 2003 की स्थिति पर नजर डालें, तो उस समय सरकारी कॉलेजों में केवल 660 एमबीबीएस सीटें हुआ करती थीं। समय के साथ यह संख्या बढ़कर पहले 2,275 हुई और फिर हालिया वर्षों में बढ़कर लगभग तीन हजार के करीब पहुंच गई।

इन आंकड़ों से साफ जाहिर होता है कि पिछले बाईस वर्षों में सरकारी मेडिकल सीटों की संख्या में चार से पांच गुना तक का इजाफा हुआ है। बावजूद इसके, सरकार का यह तर्क है कि कई इलाकों में आज भी योग्य डॉक्टरों, सर्जनों और चिकित्सा विशेषज्ञों की भारी कमी बनी हुई है। इसी कमी को पाटने के लिए सरकार ने पीपीपी मॉडल को एक अचूक उपाय के रूप में चुना है। प्रशासन का मानना है कि निजी क्षेत्र के जुड़ने से फैकल्टी की कमी दूर होगी, आधुनिक उपकरणों का रखरखाव बेहतर होगा और छात्रों को भी उच्च स्तरीय व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त हो सकेगा।

पायलट प्रोजेक्ट और डॉक्टरों की कमी का संकट

विशेषज्ञों की कमी से निपटने के लिए सरकार ने पहले ही चरणबद्ध तरीके से कदम उठाने शुरू कर दिए थे। इसी साल जून के महीने में मध्य प्रदेश कैबिनेट ने रीवा, देवास और गुना जिलों के अठारह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पीपीपी मोड पर चलाने की मंजूरी दे दी थी। सरकार का पक्ष यह रहा है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के इन अस्पतालों में डॉक्टरों का टिकना मुश्किल होता है, जिससे आम जनता को छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी जिला मुख्यालयों या बड़े शहरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत बुनियादी ढांचा, इमारतें और दवाइयों की जिम्मेदारी सरकार के पास रहेगी, जबकि निजी साझीदार अस्पताल में डॉक्टरों, विशेषज्ञों और जरूरी मेडिकल स्टाफ की आपूर्ति करेगा। सरकार का मानना है कि इस सहभागिता से संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा और मरीजों को लंबी कतारों से राहत मिलेगी। हालांकि, आलोचकों का सवाल है कि जब सरकार ने खुद भारी निवेश करके कॉलेज और अस्पताल खड़े किए हैं, तो उनका कुप्रबंधन सुधारने के बजाय उन्हें निजी हाथों में सौंपना कितना तार्किक है।

मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन की कड़ी आपत्ति

सरकार के इस कदम पर मध्य प्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। एसोसिएशन के चेयरमैन डॉ. राकेश मालवीय ने इस नीति पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि जनता के पैसों से बनी संपत्तियों को निजी कंपनियों को सौंपना जनहित में नहीं है। उनका मानना है कि सरकार को निजी साझीदारों को लाने के बजाय अपनी अंदरूनी कमियों, प्रशासनिक सुस्ती और फैकल्टी की भर्ती प्रक्रिया में सुधार करना चाहिए।

"सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जमीन, भवन और अत्याधुनिक उपकरणों पर पहले ही जनता के खून-पसीने के पैसे से भारी निवेश किया जा चुका है। ऐसे में इनका संचालन निजी हाथों में देने के बजाय सरकार को अपनी आंतरिक कमियों और प्रबंधन को सुधारना चाहिए। निजी निवेशकों का मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है, जबकि सरकार का उद्देश्य जन स्वास्थ्य सेवा देना है। इस टकराव का अंततः खामियाजा आम मरीजों और पढ़ाई करने वाले छात्रों को भुगतना पड़ सकता है।" — डॉ. राकेश मालवीय, चेयरमैन, मध्य प्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन

निजी निवेशकों को वित्तीय सुरक्षा और वीजीएफ का प्रावधान

इस पूरी प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाने के लिए प्रशासन ने एक ट्रांजेक्शन एडवाइजर नियुक्त करने का निर्णय लिया है, जो यह तय करेगा कि किस प्रारूप के तहत इन मेडिकल कॉलेजों का संचालन किया जाएगा। इस मॉडल की एक खास बात यह है कि इसमें 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' यानी वीजीएफ का प्रावधान भी रखा गया है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि यदि किसी निजी साझीदार को इन संस्थानों को चलाने में पर्याप्त व्यावसायिक मुनाफा नहीं मिलता या उसे वित्तीय घाटा उठाना पड़ता है, तो सरकार उसकी आर्थिक भरपाई अपनी ओर से करेगी।

यह बात आलोचकों को सबसे ज्यादा अखर रही है। जानकारों का कहना है कि एक तरफ तो सरकार बुनियादी सुविधाएं और जरूरत पड़ने पर वित्तीय सहायता भी मुहैया कराएगी, वहीं दूसरी तरफ निजी पार्टी वहां अपने व्यावसायिक हितों को साधने का प्रयास करेगी। नीमच, श्योपुर और सिंगरौली जैसे जिलों में जहां मेडिकल कॉलेज पहले से ही सौ-सौ सीटों के साथ संचालित हो रहे हैं, वहां इस मॉडल के लागू होने से फीस स्ट्रक्चर और इलाज के खर्च पर क्या असर पड़ेगा, इसको लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक बड़ी बहस का रूप ले सकता है, क्योंकि स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत के निजीकरण पर हर आम नागरिक की नजर टिकी हुई है।

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