राजस्थान में ग्रामीण सरकारों के गठन की प्रक्रिया शुरू
राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य निर्वाचन आयोग ने बहुप्रतीक्षित पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों का पूरा कार्यक्रम आधिकारिक तौर पर जारी कर दिया है। इस घोषणा के साथ ही प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है। आचार संहिता लागू होने के बाद से मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा सरकारी वाहनों के उपयोग से लेकर नीतिगत तबादलों तक कई प्रकार की पाबंदियां प्रभावी हो गई हैं। चुनाव आयोग की ओर से साझा की गई जानकारी के मुताबिक, इस बार की चुनावी प्रक्रिया करीब पचास दिनों तक अलग-अलग चरणों में पूरी की जाएगी।
लोकतंत्र की इस सबसे बड़ी ग्रामीण इकाई के चुनाव को लेकर प्रशासनिक अमला पूरी तरह मुस्तैद नजर आ रहा है। राज्य के विभिन्न जिलों में जिला परिषद सदस्यों, पंचायत समिति सदस्यों, सरपंचों और वार्ड पंचों के पदों के लिए होने वाले इन मुकाबलों में चार करोड़ से ज्यादा पंजीकृत मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। चुनाव की घोषणा के साथ ही गांवों में राजनीतिक दलों और संभावित प्रत्याशियों की हलचल काफी बढ़ गई है। हर कोई अपने समर्थकों के साथ चुनावी गणित बैठाने और जनसंपर्क अभियान को धार देने में जुट गया है।
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चार चरणों में बंटी चुनावी प्रक्रिया और मतदान की तिथियां
राज्य निर्वाचन आयोग के तयशुदा शेड्यूल के अनुसार, पंचायती राज के इन चुनावों को पारदर्शी और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए कुल चार चरणों का खाका तैयार किया गया है। जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव के पहले चरण का मतदान नियत तारीख पर होगा, जबकि अन्य चरण इसके बाद के दिनों में क्रमिक रूप से पूरे किए जाएंगे। इसी प्रकार, ग्राम पंचायतों में सरपंच और वार्ड पंच पदों के लिए भी चार अलग-अलग चरणों में मतदाता अपने मत डालेंगे। ग्रामीण इलाकों के मतदाता सुबह से लेकर शाम तक अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे।
चुनावी चरणों का यह गणित जिलों की भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक सुविधाओं को ध्यान में रखकर तय किया गया है। कुछ जिलों में चुनाव एक या दो चरणों में सिमट जाएंगे, तो वहीं जयपुर जैसे घनी आबादी वाले और बड़े जिलों में मतदान की प्रक्रिया चार चरणों तक खींची जाएगी। आयोग ने स्पष्ट किया है कि हर चरण के मतदान के बाद सुरक्षा व्यवस्था और मतगणना के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाएगा, ताकि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हो सके।
ईवीएम और बैलेट पेपर का अलग-अलग होगा इस्तेमाल
इस बार के पंचायती राज चुनावों में मतदान की तकनीकों को लेकर भी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी गई है। जिला परिषद और पंचायत समिति के सदस्यों के चुनाव आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के माध्यम से कराए जाएंगे। इसके विपरीत, गांवों की सरकार की धुरी माने जाने वाले सरपंच और वार्ड पंच के पदों के लिए पारंपरिक बैलेट पेपर यानी मतपत्रों का ही इस्तेमाल किया जाएगा। आयोग का मानना है कि इससे मतगणना में पारदर्शिता बनी रहेगी और ग्रामीण मतदाताओं को भी अपने मताधिकार का प्रयोग करने में किसी प्रकार की तकनीकी उलझन का सामना नहीं करना पड़ेगा।
चुनाव प्रक्रिया के दौरान नामांकन दाखिल करने से लेकर नाम वापसी और चुनाव प्रचार तक के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। उम्मीदवारों को निर्धारित समय सीमा के भीतर ही अपने कागजात दाखिल करने होंगे। निर्वाचन अधिकारियों द्वारा नामांकन पत्रों की बारीकी से जांच की जाएगी और तय तिथि पर नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव मैदान में डटे अंतिम प्रत्याशियों की तस्वीर साफ हो जाएगी। इसके तुरंत बाद चुनाव चिन्हों का आवंटन किया जाएगा, जिसके बाद चुनावी सभाओं और रैलियों का दौर तेज हो जाएगा।
चार करोड़ से अधिक मतदाता और महिलाओं की मजबूत भागीदारी
आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो राजस्थान के पंचायती राज चुनाव देश के सबसे बड़े स्थानीय चुनावों में गिने जाते हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों में कुल मिलाकर चार करोड़ से अधिक मतदाता पंजीकृत हैं, जो ग्रामीण विकास की दिशा तय करने वाले अपने नुमाइंदों को चुनेंगे। खास बात यह है कि इन चुनावों में महिला मतदाताओं की संख्या भी पुरुषों के करीब पहुंच रही है, जिसमें कुल मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं का है। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान होने के कारण इस बार भी ग्रामीण राजनीति की कमान संभालने में महिलाओं की भूमिका बेहद निर्णायक रहने वाली है।
विभिन्न जिलों में मतदाताओं के आंकड़ों पर नजर डालें तो जयपुर जिले में सबसे ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, वहीं जैसलमेर जैसे क्षेत्रफल में बड़े लेकिन कम आबादी वाले जिलों में मतदाताओं की संख्या इसके मुकाबले काफी कम है। फलोदी और सलूंबर जैसे नए बने जिलों की अपनी अलग चुनावी इकाइयां होंगी, जहां स्थानीय मुद्दों पर यह दंगल लड़ा जाएगा। ग्रामीण विकास, पेयजल संकट, सड़क निर्माण, और आवास योजनाओं जैसी बुनियादी जरूरतें इस चुनाव के मुख्य मुद्दे रहने वाले हैं।
जिला प्रमुख और प्रधान के चुनाव की पूरी रूपरेखा
सदस्यों के चुनाव परिणामों के आने के बाद जिला स्तर पर जिला प्रमुख और पंचायत समिति स्तर पर प्रधान के चुनाव कराए जाएंगे। तय कार्यक्रम के अनुसार, नवंबर माह के अंतिम सप्ताह में इन शीर्ष पदों के लिए वोटिंग होगी। जिला प्रमुख और प्रधान पद के चुनाव के अगले ही दिन उपजिला प्रमुख और उपप्रधान के चुनाव संपन्न करा लिए जाएंगे। हालांकि, कुछ विशेष जिलों जैसे कोटा, श्रीगंगानगर, बारां और करौली में मौजूदा प्रमुख और प्रधानों का कार्यकाल नियमानुसार बाद में पूरा होना है, इसलिए वहां के शीर्ष पदों के चुनाव बाद में कराए जाएंगे, लेकिन इन जिलों में भी जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव अन्य क्षेत्रों के साथ ही तय समय पर संपन्न होंगे।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि आदर्श आचार संहिता के लागू होने के साथ ही सरकारी तंत्र पूरी तरह से चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के तहत काम कर रहा है। ग्रामीण इलाकों में किसी भी तरह की राजनीतिक आचार संहिता के उल्लंघन से सख्ती से निपटने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस विभाग ने भी संवेदनशील और अति-संवेदनशील मतदान केंद्रों की पहचान कर ली है, ताकि किसी भी अप्रिय घटना को समय रहते रोका जा सके।
"पंचायती राज संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। सभी जिलों में प्रशासनिक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और मतदाता बिना किसी भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें, इसके पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।" — राज्य निर्वाचन आयोग, राजस्थान सरकार
निष्कर्ष और आगे की प्रशासनिक तैयारियां
राजस्थान में पंचायती राज के इस बड़े महासमर के शंखनाद के साथ ही गांवों की राजनीति में पारा चढ़ने लगा है। विकास के दावों और वादों के बीच अब जनता तय करेगी कि आने वाले पांच सालों के लिए उनके गांवों और पंचायतों की बागडोर किसके हाथों में होगी। चुनाव आयोग के कड़े पहरे और प्रशासनिक अमले की मुस्तैदी के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि ग्रामीण मतदाता किस करवट बैठते हैं और कौन सी राजनीतिक ताकतें स्थानीय निकायों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल होती हैं।








