द फ्रीलान्स (नई दिल्ली/विशेष रिपोर्ट): भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) यानी राशन व्यवस्था देश के करोड़ों गरीबों के जीवन का आधार है। पिछले कुछ वर्षों में इस व्यवस्था को डिजिटल और पारदर्शी बनाने के लिए कई बड़े कदम उठाए गए हैं, जिनमें 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' (ONORC) जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं शामिल हैं। सरकार का दावा है कि इस तकनीक के माध्यम से अब देश के किसी भी कोने में राशन प्राप्त करना आसान हो गया है। लेकिन, ज़मीनी स्तर पर तस्वीर उतनी चमकदार नहीं है जितनी कागजों पर दिखाई देती है। 'द फ्रीलान्स' के वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर्स द्वारा जुटाई गई ग्राउंड रिपोर्ट्स से यह साफ होता है कि एक तरफ जहां प्रशासनिक सुधारों के जरिए राहत देने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी की बुनियादी परेशानियां आज भी जस की तस बनी हुई हैं।
अदालत और दफ्तरों के चक्कर काटता बारह साल का संघर्ष
सरकारी दावों के उलट, व्यवस्था की लाचारी का सबसे दर्दनाक चेहरा हाल ही में उत्तर प्रदेश से सामने आया, जहां एक दिव्यांग व्यक्ति को केवल अपना राशन कार्ड बनवाने के लिए पूरे 12 साल तक संघर्ष करना पड़ा। एक दशक से अधिक समय तक दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद जब यह मामला तूल पकड़ा, तब जाकर जिलाधिकारी (DM) को इस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए त्वरित कार्रवाई के आदेश देने पड़े। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि जिला स्तर पर नौकरशाही की संवेदनहीनता और लाल फीताशाही किस हद तक आम आदमी के मौलिक अधिकारों का हनन करती है। इतने लंबे समय तक एक दिव्यांग को उसके हक के लिए दर-दर भटकाना प्रशासनिक विफलता की पोल खोलता है।
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विशेष शिविरों का आयोजन और आवेदन प्रक्रिया
राशन कार्ड बनवाने और उनमें संशोधन कराने की जटिलताओं को कम करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में प्रशासन द्वारा विशेष शिविरों (कैंप) का आयोजन किया जा रहा है। हाल ही में अतरासी क्षेत्र में लगाए गए ऐसे ही एक राशन कार्ड शिविर में स्थानीय लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। आंकड़ों के अनुसार, इस एक दिवसीय शिविर में कुल 22 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 9 आवेदन नए राशन कार्ड के लिए थे जबकि 13 आवेदन मौजूदा कार्डों में नाम संशोधन या अन्य सुधारों के लिए जमा किए गए। इस तरह के शिविर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जरूरतमंदों के लिए भले ही राहत का जरिया बन रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर नागरिक को अपना कार्ड बनवाने के लिए इस तरह के विशेष आयोजनों का ही इंतजार करना पड़ेगा या नियमित प्रक्रिया को सुचारू बनाया जाएगा?
राज्य स्तर पर राहत: सरसों के तेल के वितरण में बदलाव
राज्यों की अपनी कल्याणकारी नीतियों के तहत भी राशन कार्ड धारकों को सहूलियतें दी जा रही हैं। हरियाणा राज्य से राशन कार्ड धारकों के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है, जहां अब राज्य सरकार ने सरसों के तेल के वितरण के नियमों में संशोधन किया है। अब उपभोक्ताओं को यह तेल पुराने बड़े पैकों के बजाय आधे और एक लीटर के सुविधाजनक पैक में उपलब्ध कराया जाएगा। इतना ही नहीं, लाभार्थियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अब तीन महीने का कोटा एक साथ दिया जाएगा। इस कदम से डिपो धारकों और आम जनता दोनों को वितरण प्रक्रिया में होने वाली परेशानियों से राहत मिलने की उम्मीद है।
'वन नेशन, वन राशन कार्ड' का तकनीकी पहलू और जमीनी चुनौतियां
केंद्र सरकार की 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' योजना प्रवासियों और मजदूरों के लिए वरदान साबित हो रही है। इस तकनीक आधारित व्यवस्था के तहत अब कोई भी व्यक्ति अपने आधार से जुड़े बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के माध्यम से देश की किसी भी उचित मूल्य की दुकान (फेयर प्राइस शॉप) से अपना तयशुदा राशन ले सकता है। इससे खासकर उन कामगारों को बड़ी राहत मिली है जो रोजगार की तलाश में अपने गृह राज्य से दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। हालांकि, इसके बावजूद इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या, सर्वर डाउन रहने की शिकायतें और ग्रामीण इलाकों में तकनीकी जागरूकता की कमी आज भी इस योजना के पूर्ण क्रियान्वयन में बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।
विरोध प्रदर्शन और जनता का असंतोष
प्रशासनिक नियमों की जटिलता और पारदर्शिता के अभाव में कई स्थानों पर जनता का गुस्सा भी फूट पड़ा है। हाल ही में प्रभात खबर की रिपोर्ट्स के अनुसार, राशन कार्ड और जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए तय किए गए नए और कथित जटिल नियमों के विरोध में जनता और विभिन्न संगठनों द्वारा विरोध मार्च निकाले गए हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि नए नियमों के कारण गरीबों के लिए अपने दस्तावेज़ बनवाना लगभग असंभव हो गया है, जिससे वे सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हो रहे हैं। यह बढ़ता असंतोष इस बात का संकेत है कि नीति निर्माताओं और ज़मीनी हकीकत के बीच एक चौड़ी खाई मौजूद है।
निष्कर्ष और भविष्य की दिशा
राशन कार्ड जैसी बुनियादी आवश्यकता आज भी भारत के सामाजिक ताने-बाने और प्रशासनिक दक्षता का सबसे बड़ा पैमाना है। 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' जैसी तकनीकी पहल और हरियाणा जैसी राज्य-स्तरीय राहत योजनाएं सकारात्मक दिशा में उठाए गए कदम हैं। वहीं दूसरी ओर, 12 साल तक कागजों के लिए भटकने वाले दिव्यांगों के मामले और नियमों के खिलाफ सड़कों पर उतरती जनता यह चेतावनी भी देती है कि जब तक जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार और नौकरशाही का अड़ियल रवैया खत्म नहीं होता, तब तक शत-प्रतिशत योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना मुमकिन नहीं होगा। सरकार और प्रशासन को तकनीक के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को भी अपनी कार्यशैली का हिस्सा बनाना होगा।







