नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट बढ़ाए जाने के तुरंत बाद देश की सियासत में भूचाल आ गया है। इस आर्थिक फैसले के आते ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बेहद तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेताओं ने सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए आरोप लगाया है कि सरकार की गलत नीतियों के कारण देश की आम जनता पर महंगाई का पहाड़ टूट पड़ा है। पार्टी ने तंज कसते हुए प्रधानमंत्री को 'महंगाई मैन' करार दिया है और कहा है कि आम आदमी का जीना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
रिजर्व बैंक के इस कदम से होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की किस्तें यानी ईएमआई महंगी होना तय माना जा रहा है। ऐसे समय में जब मध्यम वर्ग पहले से ही घरेलू बजट को लेकर परेशान है, लोन की बढ़ी हुई किस्तें उनकी मुश्किलें और ज्यादा बढ़ा देंगी। कांग्रेस का कहना है कि सरकार दावा तो अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का करती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर आम आदमी की बचत खत्म हो रही है और रसोई का बजट पूरी तरह बिगड़ चुका है। पार्टी ने मांग की है कि सरकार तुरंत ऐसे कदम उठाए जिससे बढ़ती कीमतों पर लगाम लग सके और जनता को सीधी राहत मिल सके।
बढ़ती ब्याज दरों से आम आदमी की जेब पर सीधा असर
ब्याज दरें बढ़ने का सीधा असर सीधे तौर पर आम आदमी के सपनों के घर और गाड़ी खरीदने की योजना पर पड़ता है। बैंक अब लोन के एवज में ज्यादा पैसा वसूलेंगे जिसका मतलब है कि हर महीने ग्राहक के खाते से अधिक रकम कटेगी। जानकारों का मानना है कि इससे बाजार में पैसों का बहाव कम होगा, लेकिन साथ ही आम नागरिकों की खर्च करने की क्षमता भी घटेगी। कांग्रेस पार्टी ने इसी बात को मुद्दा बनाते हुए सरकार पर आर्थिक प्रबंधन में पूरी तरह विफल रहने का गंभीर आरोप लगाया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है और आम नागरिक को कर्ज के जाल में धकेला जा रहा है.
दूसरी तरफ, सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ताओं ने रिजर्व बैंक के इस फैसले का बचाव किया है। सरकार का तर्क है कि वैश्विक स्तर पर चल रही आर्थिक उथल-पुथल और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ऐसे कड़े फैसले लेना जरूरी हो जाता है। वित्त मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय बैंक देश के आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर पूरी तरह स्वतंत्र रूप से फैसले लेता है। सरकार का दावा है कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया के मुकाबले अब भी सबसे तेजी से आगे बढ़ रही है और सरकार ने हमेशा गरीबों और मध्यम वर्ग के हितों की रक्षा के लिए काम किया है।
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महंगाई और बेरोजगारी पर गरमाई देश की सियासत
आगामी चुनावों और राजनीतिक माहौल को देखते हुए महंगाई का मुद्दा एक बार फिर सबसे बड़ा हथियार बन गया है। कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को घर-घर तक ले जाने की तैयारी कर रही है ताकि जनता के बीच सरकार की आर्थिक नीतियों की नाकामी को उजागर किया जा सके। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी बाजारों तक में लोग अब खुलकर यह चर्चा कर रहे हैं कि दाल, तेल, सब्जी से लेकर अब घर के लोन तक सब कुछ महंगा होता जा रहा है। अर्थशास्त्रियों का भी यह मानना है कि यदि महंगाई की यह रफ्तार नहीं रुकी, तो आने वाले दिनों में आम जनता के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना भी बेहद कठिन हो जाएगा।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल में यह बात सामने आई है कि बाजार में खरीदार कम हो रहे हैं और लोग जरूरत का सामान खरीदने से पहले भी कई बार सोच रहे हैं। छोटे व्यापारियों और दुकानदारों का कहना है कि मंदी की मार उनके व्यापार को अंदर से खोखला कर रही है। जब तक सरकार और रिजर्व बैंक मिलकर ब्याज दरों और महंगाई के बीच संतुलन नहीं बनाते, तब तक आम आदमी की मुश्किलें कम होती नहीं दिखतीं। राजनीतिक बयानबाजी अपनी जगह जारी है, लेकिन असली सवाल यही है कि क्या आम नागरिक को इस आर्थिक चक्रव्यूह से बाहर निकालने के लिए कोई ठोस नीति बनाई जाएगी या नहीं।
आम जनता की उम्मीदें और आगे की आर्थिक चुनौतियां
देश के हर कोने से मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोग अब सरकार से सीधे राहत पैकेजों की मांग कर रहे हैं। लगातार बढ़ रही महंगाई और घटती बचत ने लोगों के भविष्य की प्लानिंग को पूरी तरह उलट-पुलट कर रख दिया है। बुजुर्गों को मिलने वाले ब्याज से लेकर युवाओं की नौकरी और वेतन तक, हर मोर्चे पर अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। राजनीतिक दलों की खींचतान के बीच आम मतदाता अब बस यही चाहता है कि उसकी थाली का खर्च और सिर पर छत का बोझ कुछ कम हो।



