हिरासत के एक साल बाद मुखर हुए सोनम वांगचुक
प्रख्यात पर्यावरण एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने अपनी लंबी हिरासत और लद्दाख के हालात को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन के सामने कड़े सवाल खड़े किए हैं। अपनी रिहाई के एक साल पूरा होने के मौके पर सार्वजनिक किए गए एक तीखे बयान में उन्होंने लेह में हुई पुलिस फायरिंग की न्यायिक जांच रिपोर्ट को फौरन सार्वजनिक किए जाने की मांग की है। वांगचुक का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब लद्दाख क्षेत्र में शांति और व्यवस्था को लेकर स्थानीय लोगों की भावनाएं लगातार उद्वेलित बनी हुई हैं। उन्होंने अपनी छह महीने की उस कठिन नजरबंदी का भी जिक्र किया जो उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए के तहत दी गई थी।
अपने संबोधन और बयानों के जरिए वांगचुक ने स्पष्ट कर दिया है कि वे लद्दाख के युवाओं के अधिकारों और न्याय की लड़ाई को किसी भी कीमत पर रुकने नहीं देंगे। उन्होंने उन तमाम कानूनी बाधाओं और प्रशासनिक कदमों पर सवाल उठाए, जिनका सामना उन्हें और उनके समर्थकों को पिछले एक साल के दौरान करना पड़ा था। उनके इस नए रुख ने एक बार फिर पहाड़ी इलाके के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है और सरकार पर नैतिक दबाव बढ़ना शुरू हो गया है।
लेह और आसपास के इलाकों में इस बयान के बाद चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। आम नागरिक से लेकर स्थानीय संगठनों तक हर कोई इस बात की समीक्षा कर रहा है कि आखिर इतने महीने बीत जाने के बाद भी घटना की सच्चाई सामने क्यों नहीं आ सकी है। वांगचुक ने जिस बेबाकी से अपनी बात रखी है, उससे यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी बहस का रूप ले सकता है।
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जोधपुर सेंट्रल जेल की काल कोठरी और एनएसए की सख्ती
घटनाक्रम को याद करते हुए सोनम वांगचुक ने बताया कि उन्हें किस तरह से प्रशासनिक तंत्र का कड़ा सामना करना पड़ा था। उन्हें 26 सितंबर 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के प्रावधानों के तहत अचानक हिरासत में ले लिया गया था। इसके तुरंत बाद उन्हें उनके गृह क्षेत्र लद्दाख से बेहद दूर राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। वांगचुक के अनुसार, जेल की चार दीवारों के भीतर उन्हें लगभग छह महीने तक कड़े पहरे और अकेलेपन में रखा गया, जहां बाहरी दुनिया से उनका संपर्क लगभग न के बराबर था।
कानूनी और प्रशासनिक लड़ाइयों के लंबे दौर के बाद आखिरकार सरकार ने 14 मार्च 2026 को उनके हिरासत आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके बाद उनकी जेल से रिहाई संभव हो पाई थी। वांगचुक का कहना है कि यह पूरी कार्रवाई असहमति की आवाज़ों को दबाने का एक प्रयास थी, लेकिन जेल के भीतर रहने के बावजूद उनके हौसले कमजोर नहीं पड़े। उन्होंने कहा कि लद्दाख के लोगों के हितों के लिए किए जा रहे उनके शांतिपूर्ण संघर्ष को इस तरह की दमनकारी नीतियों से रोका नहीं जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति की आवाज़ को इस प्रकार एनएसए जैसे कठोर कानूनों के दायरे में लाना गंभीर आत्ममंथन का विषय है। वांगचुक के इन खुलासों से प्रशासनिक कार्रवाई और मानवाधिकारों के हनन के बीच की बहस एक बार फिर से केंद्र में आ गई है, और नागरिक समाज के लोग इस पर खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
लेह फायरिंग कांड: वह काला दिन और अनसुने सवाल
सोनम वांगचुक ने 24 सितंबर 2025 को लेह में हुई उस खौफनाक घटना का विशेष रूप से उल्लेख किया जब पुलिस की गोलीबारी में चार युवा अपनी जान गंवा बैठे थे और कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में भारी रोष फैल गया था, जिसके चलते सरकार को आनन-फानन में न्यायिक जांच आयोग का गठन करना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बीएस चौहान की अध्यक्षता में इस आयोग को घटना की तह तक जाने और अपनी रिपोर्ट सौंपने का जिम्मा सौंपा गया था।
हालांकि, एक साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी उस आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिस पर वांगचुक ने तीखा ऐतराज जताया है। उन्होंने कई चुभते हुए सवाल उठाए हैं कि आखिर उस दिन गोली चलाने का आदेश किसने दिया था, क्या भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस के पास अन्य कोई शांतिपूर्ण विकल्प मौजूद नहीं थे, और प्रदर्शनकारियों के शरीर के संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सों को ही निशाना क्यों बनाया गया। वांगचुक ने जोर देकर कहा कि जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन असल में क्या हुआ था और इसके लिए किसकी प्रशासनिक जवाबदेही तय होती है।
"लेह में अपनों को खोने वाले परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए केवल वादे काफी नहीं हैं। जब तक फायरिंग की न्यायिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती और दोषियों की जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब तक असली न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती। सरकार को पारदर्शिता दिखाते हुए सच को सामने लाना चाहिए।"— सोनम वांगचुक, पर्यावरण एक्टिविस्ट
मुआवजे की रकम को बताया नाकाफी, सरकार को अल्टीमेटम
मृतकों के परिवारों को दी गई आर्थिक सहायता पर सवाल उठाते हुए वांगचुक ने कहा कि सरकार की ओर से घोषित 15 लाख रुपये का मुआवजा किसी भी लिहाज से पर्याप्त नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इंसानी जिंदगी की अमूल्य क्षति की भरपाई किसी भी आर्थिक मदद से पूरी तरह संभव तो नहीं है, लेकिन एक संवेदनशील कल्याणकारी सरकार होने के नाते प्रशासन को पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी वित्तीय जिम्मेदारी का अधिक संवेदनशीलता से निर्वहन करना चाहिए। उन्होंने मांग की कि मृतकों के आश्रितों के लिए मुआवजे की राशि को तुरंत बढ़ाया जाए और साथ ही पुलिस फायरिंग में गंभीर रूप से घायल हुए लोगों को उनकी चोट और इलाज के खर्च के हिसाब से उचित आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।
इसके साथ ही वांगचुक ने सितंबर 2025 की घटनाओं के बाद स्थानीय नागरिकों के खिलाफ दर्ज किए गए आपराधिक मुकदमों का भी पुरजोर मुद्दा उठाया है। उपलब्ध आंकड़ों के हवाले से उन्होंने बताया कि इस दौरान कुल 87 लोगों को आरोपी बनाया गया था जिनमें से 81 की गिरफ्तारियां हुई थीं। हालांकि प्रशासन ने इनमें से 20 मामलों को वापस लेने की मंजूरी दी है, लेकिन वांगचुक ने मांग की है कि बाकी बचे मामलों की भी निष्पक्ष समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी के खिलाफ हिंसा के पुख्ता और विश्वसनीय सबूत मिलते हैं तो कानून अपना काम करे, लेकिन निर्दोष नागरिकों को बेवजह कानूनी शिकंजे में फंसाकर परेशान नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें कानून का पूर्ण संरक्षण मिलना चाहिए।








