सदन के पटल पर गरमाया सियासी माहौल
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर से उबाल देखने को मिल रहा है। विधानसभा के भीतर राज्य का दर्जा बहाल करने से जुड़ा प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद से ही पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। इस राजनीतिक हलचल के बीच सोमवार को सदन की कार्यवाही के दौरान तीखी नोकझोंक और भारी हंगामे के पूरे आसार बने हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है, क्योंकि दोनों प्रमुख राजनीतिक धड़े अपनी-अपनी वैचारिक और राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं।
बीते सप्ताह की शुरुआत में ही इस विषय को लेकर प्रशासनिक हलकों में सरगर्मी तेज हो गई थी। मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से जब यह कदम उठाया गया, तो राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। जानकारों का कहना है कि लंबे समय से केंद्र शासित प्रदेश बने इस क्षेत्र में पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग जनता की भावनाओं से जुड़ी हुई एक संवेदनशील नस है, जिस पर हर राजनीतिक दल अपनी पैठ बनाना चाहता है।
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विपक्ष का कड़ा रुख और गंभीर आरोप
भारतीय जनता पार्टी ने इस प्रस्ताव के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। भाजपा विधायकों का स्पष्ट आरोप है कि इस प्रशासनिक और राजनीतिक कदम की आड़ में 1953 से पहले की पुरानी व्यवस्था और स्वायत्तता से जुड़े विवादास्पद मुद्दों को पिछले दरवाजे से वापस लाने की कोशिश की जा रही है। विपक्षी दल का तर्क है कि इस तरह के प्रस्ताव लाकर सरकार केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण करना चाहती है और जनता का ध्यान असल विकास कार्यों से भटकाने का प्रयास कर रही है।
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने तो यहाँ तक मांग कर डाली है कि ऐसे एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली मौजूदा सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए। उनका कहना है कि संवैधानिक दायरे से बाहर जाकर इस प्रकार के कदम उठाना देश की संघीय व्यवस्था के अनुकूल नहीं है और यह क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता है। सदन के भीतर भाजपा ने इसी आपत्ति के चलते जोरदार प्रदर्शन किया था जिसके कारण कार्यवाही को बीच में ही रोकना पड़ा था।
मुख्यमंत्री का पलटवार और स्पष्टीकरण
विपक्षी दलों के तीखे हमलों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि लाए गए इस प्रस्ताव का दायरा बेहद स्पष्ट है और इसका उद्देश्य केवल और केवल जम्मू-कश्मीर के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाلي पर लोकतांत्रिक तरीके से मतदान कराना है। उन्होंने विपक्ष पर यह गंभीर आरोप भी लगाया कि वे इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सदन में चर्चा या मतदान से बचने के लिए जानबूझकर व्यवधान पैदा कर रहे हैं।
"हमारा यह प्रस्ताव किसी भी रूप में असंवैधानिक नहीं है। हमने केवल जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप राज्य का दर्जा वापस पाने की मांग की है। विपक्ष यदि इसमें कोई कमी निकालता है, तो उसे सदन के पटल पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए, हंगामा करने से सच नहीं छिप सकता।" — उमर अब्दुल्ला, मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर
मुख्यमंत्री ने आगे स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 370 या अन्य पुराने मामलों से जुड़े विषय इस प्रस्ताव का हिस्सा नहीं हैं, क्योंकि वे पहले से ही सदन की आधिकारिक संपत्ति का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने चुनौती दी कि यदि विपक्ष को लगता है कि प्रस्ताव में इस्तेमाल की गई भाषा देश के संविधान के विरुद्ध है, तो वे सीधे तौर पर उसे इंगित करें।
अन्य दलों की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय समीकरण
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अन्य राजनीतिक दलों की भूमिका भी काफी दिलचस्प हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग का खुला समर्थन किया है, जिससे सत्ताधारी दल को वैधानिक बल मिला है। वहीं, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व ने भी इस कदम को उचित ठहराते हुए कहा है कि राज्य का दर्जा किसी राजनीतिक दल की खैरात नहीं है, बल्कि यहाँ की आम जनता का एक बुनियादी और नैसर्गिक अधिकार है जिसे बिना किसी देरी के बहाल किया जाना चाहिए।
क्षेत्रीय दलों का मानना है कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से यहाँ प्रशासनिक और स्थानीय स्तर पर कई तरह की व्यावहारिक परेशानियाँ पेश आ रही हैं, जिनका एकमात्र समाधान पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना ही है। जनता के बीच भी इस मुद्दे को लेकर गहरी उत्सुकता और संवेदनशीलता है, क्योंकि हर कोई यह जानना चाहता है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों और केंद्र सरकार के बीच का यह गतिरोध किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
भविष्य की राजनीतिक चालें और जनता की उम्मीदें
आने वाले दिनों में विधानसभा के भीतर होने वाली बहस इस क्षेत्र के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी। एक तरफ जहाँ सत्ता पक्ष अपनी वैधानिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं को जनता के बीच स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं विपक्ष भी हर मोर्चे पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है। इस खींचतान के बीच आम नागरिकों की नजरें पूरी तरह से इस बात पर टिकी हैं कि क्या वास्तव में उन्हें उनकी पुरानी पहचान और अधिकारों का प्रशासनिक स्वरूप वापस मिल सकेगा या यह मुद्दा केवल बयानबाजी तक ही सीमित रह जाएगा।
पत्रकारिता के जानकारों का मानना है कि इस पूरे विवाद ने एक बार फिर केंद्र और क्षेत्रीय नेतृत्व के बीच के संबंधों को केंद्र में ला दिया है। जैसे-जैसे सदन की कार्यवाही आगे बढ़ेगी, तमाम राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों को धार देने का प्रयास करेंगे, जिससे राज्य की राजनीति में गर्माहट बनी रहने के पूरे आसार हैं।






