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जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, सियासी गलियारों में बढ़ी हलचल

जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग से जुड़े अहम कानूनी मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तय है। इस बीच स्थानीय विधानसभा में भी इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच तीखी तकरार देखने को मिल रही है, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•28 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, सियासी गलियारों में बढ़ी हलचल
📷 जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, सियासी गलियारों में बढ़ी हलचल — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • सुप्रीम कोर्ट में जहूर अहमद भट बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई आज होने की संभावना है।
  • इससे पहले पिछले साल 10 अक्टूबर को इस मामले पर अदालत में सुनवाई हुई थी।
  • जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य के दर्जे की मांग को लेकर लाए गए प्रस्ताव पर भारी हंगामा हो चुका है।

सुप्रीम कोर्ट में आज होगी अहम सुनवाई

देश की सबसे बड़ी अदालत में आज एक बार फिर जम्मू-कश्मीर के भविष्य और उसके प्रशासनिक स्वरूप से जुड़े महत्वपूर्ण विषय पर सुनवाई होने जा रही है। अदालत में यह मामला 'जहूर अहमद भट बनाम भारत संघ' शीर्षक के तहत सूचीबद्ध है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिकाओं में केंद्रशासित प्रदेश को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने की पुरजोर मांग की गई है। कानूनी जानकारों की नजर इस बात पर टिकी है कि अदालत इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या कोई नया निर्देश जारी होता है।

इससे पहले इस कानूनी लड़ाई के तहत पिछले साल 10 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। उस दौरान अदालत ने सॉलिसिटर जनरल को याचिकाकर्ताओं की तमाम दलीलों का विस्तार से जवाब दाखिल करने के वास्ते चार सप्ताह का समय दिया था। अब देखना यह है कि इतने लंबे अंतराल के बाद आज की अदालती कार्यवाही में केंद्र सरकार की तरफ से क्या आधिकारिक पक्ष रखा जाता है और बेंच किस दिशा में आगे बढ़ती है।

इस मामले की महत्ता केवल कानूनी गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश के इस अतिसंवेदनशील क्षेत्र की राजनीतिक दिशा पर भी पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट की हर एक टिप्पणी पर आम नागरिकों से लेकर शीर्ष राजनीतिक दलों तक की पैनी नजर बनी हुई है, क्योंकि राज्य का दर्जा बहाल होना स्थानीय प्रशासन और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।

विधानसभा में प्रस्ताव और राजनीतिक घमासान

एक तरफ जहां अदालत में कानूनी दांवपेच चल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय विधानसभा का माहौल भी काफी गर्म है। हाल ही में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा सदन में राज्य का दर्जा तत्काल प्रभाव से बहाल किए जाने की मांग वाला एक प्रस्ताव पेश किया गया। इस प्रस्ताव के आते ही राजनीतिक दलों के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई, जिससे सदन की कार्यवाही बाधित होने की नौबत आ गई।

विपक्षी दलों, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। भाजपा का आरोप है कि इस प्रस्ताव को लाने का तरीका और इसकी अंतर्निहित भावनाएं नियमों के अनुकूल नहीं हैं और इसके जरिए राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। विरोध के कारण सदन में ऐसा गतिरोध पैदा हुआ कि कार्यवाही को दिनभर के लिए स्थगित करना पड़ा।

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि उनके द्वारा लाया गया प्रस्ताव पूरी तरह से जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है और इसका मकसद केवल लोकतांत्रिक अधिकारों की पुनर्स्थापना है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल इस अहम मुद्दे पर किसी भी प्रकार के मतदान से कतरा रहे हैं और इसी वजह से सदन में जानबूझकर हंगामा किया गया।

विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया और बर्खास्तगी की मांग

विधानसभा के भीतर उपजे इस राजनीतिक भूचाल ने राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। भाजपा ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए इस तरह के प्रस्ताव लाने पर सरकार को बर्खास्त तक करने की मांग कर डाली है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि इस तरह के कदमों से क्षेत्र में अनावश्यक रूप से अस्थिरता पैदा हो सकती है और संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन होता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार के गठन के बाद से ही अधिकारों के बंटवारे और पूर्ण राज्य के दर्जे को लेकर केंद्र और राज्य के बीच वैचारिक दूरियां साफ दिखाई दे रही हैं। सरकार अपनी चुनावी गारंटियों को पूरा करने के लिए कानूनी और विधाई दोनों मोर्चों पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रही है, जिसका विरोध विपक्षी खेमा पुरजोर तरीके से कर रहा है।

"हमारा उद्देश्य केवल जनता के हकों की रक्षा करना और उन्हें उनका लोकतांत्रिक अधिकार दिलाना है। राज्य का दर्जा हमारी प्राथमिक मांग है जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता।" — उमर अब्दुल्ला, मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर

कानूनी जानकारों की राय और भविष्य की राह

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहा यह मामला भारतीय संघवाद और संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या के लिहाज से बेहद अहम है। अदालत यह तय करेगी कि केंद्रशासित प्रदेश को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने की प्रक्रिया और उसके अधिकार क्षेत्र किस प्रकार निर्धारित किए जाएंगे। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती के लिए राज्य का दर्जा अति आवश्यक है।

जैसे-जैसे मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी, यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार अदालत के समक्ष क्या दलीलें पेश करती है। क्या आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर के लोगों को कोई बड़ी राहत मिल पाएगी, या फिर यह कानूनी और राजनीतिक संघर्ष अभी और लंबा खिंचेगा? इन तमाम सवालों के जवाब आने वाले हफ्तों में मिलने की पूरी उम्मीद है, जिस पर हर देशवासी की निगाहें टिकी हुई हैं।

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