आज के डिजिटल और सोशल मीडिया के इस दौर में रील्स बनाने का भूत सिर चढ़कर बोल रहा है। इस अंधी दौड़ में अब शिक्षण संस्थान भी अछूते नहीं रहे हैं, जिन्हें कभी ज्ञान, अनुशासन और संस्कारों का मंदिर माना जाता था। हाल ही में सामने आए कुछ वीडियो ने शिक्षा जगत को झकझोर कर रख दिया है। इन वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह युवा पीढ़ी और विशेषकर छात्राएं फूहड़ एवं अश्लील गीतों पर ठुमके लगा रही हैं। इस तरह की हरकतें न केवल अकादमिक परिसरों की मर्यादा को तार-तार कर रही हैं, बल्कि अभिभावकों और शिक्षकों के माथे पर भी चिंता की गहरी लकीरें खींच रही हैं।
यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आए दिन इस तरह के वीडियो इंटरनेट पर आग की तरह फैल जाते हैं। कभी कक्षाओं के अंदर, कभी कॉलेज के ऑडिटोरियम में तो कभी कैंपस के खुले मैदानों में फिल्मी और बेहद आपत्तिजनक भद्दे गानों पर डांस करने का यह ट्रेंड तेजी से पैर पसार रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या आधुनिकता के नाम पर हम अपनी संस्कृति और संस्कारों की सीमाओं को भूलते जा रहे हैं? क्या शिक्षा का असली उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रह गया है और नैतिक मूल्यों की बलि दी जा रही है?
सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया और लाइक्स की अंधी भूख
आज की युवा पीढ़ी के बीच सोशल मीडिया पर छा जाने की सनक इस हद तक बढ़ चुकी है कि वे इसके लिए किसी भी सीमा को पार करने को तैयार रहते हैं। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉट्स और फेसबुक वीडियो पर रातों-रात लोकप्रिय होने और वायरल होने का चस्का इन पर इस कदर हावी है कि इन्हें यह होश ही नहीं रहता कि वे किस जगह पर खड़े हैं। स्कूल और कॉलेज जैसे पवित्र स्थान, जहां युवाओं का भविष्य गढ़ा जाता है, उन्हें अब कंटेंट क्रिएशन का स्टूडियो बना दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्चुअल दुनिया में मिलने वाले लाइक्स, कमेंट्स और व्यूज का यह नशा युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और आचरण को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। कम समय में शोहरत पाने की इस होड़ में छात्र अपनी शालीनता और सामाजिक मर्यादा की परवाह करना भी छोड़ चुके हैं। जब शिक्षण संस्थानों में इस तरह की गतिविधियां खुलेआम होने लगती हैं, तो इसका समाज पर बेहद नकारात्मक संदेश जाता है। नई पीढ़ी के मन में संस्थानों के प्रति जो सम्मान का भाव होना चाहिए, वह धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है।
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प्रशासन की अनदेखी और बिगड़ता अनुशासनात्मक माहौल
इस पूरे घटनाक्रम का एक और डरावना पहलू शिक्षण संस्थानों के प्रबंधनों की उदासीनता है। क्या प्रोफेसरों, शिक्षकों और कॉलेज प्रशासनों को इन गतिविधियों की भनक नहीं होती? या फिर वे विवादों से बचने के लिए आंखें मूंद लेते हैं? यह एक बड़ा सवाल है जिस पर विचार करना बेहद जरूरी है। जब परिसरों में इस तरह के फूहड़ प्रदर्शन बेरोक-टोक होने लगते हैं, तो इसका मतलब साफ है कि निगरानी तंत्र पूरी तरह से फेल हो चुका है।
कई मामलों में तो यह भी देखा गया है कि खुद शिक्षक या कॉलेज के कर्मचारी भी इन रील्स का हिस्सा बन जाते हैं या फिर इस पर चुप्पी साध लेते हैं। यदि समय रहते इन प्रवृत्तियों पर लगाम नहीं कसी गई, तो शैक्षणिक संस्थानों की गरिमा पूरी तरह से मिट्टी में मिल जाएगी। परिसरों में मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर कड़े नियम बनाने की आवश्यकता है, ताकि पढ़ाई के समय केवल शिक्षा और अनुशासन पर ही ध्यान केंद्रित किया जा सके।
"शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल डिग्रियां हासिल करना नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान बनना है। यदि परिसरों से ही अनुशासन और संस्कारों की नींव हिलने लगे, तो सभ्य समाज की कल्पना करना असंभव हो जाएगा। आज जरूरत इस बात की है कि शिक्षण संस्थान अपनी खोई हुई साख को वापस पाने के लिए सख्त कदम उठाएं।" — डॉ. रमेश चंद्र शर्मा, शिक्षाविद् एवं समाजशास्त्री
अभिभावकों की चिंता और नैतिक पतन का बढ़ता दायरा
इस प्रकार की घटनाओं से सबसे ज्यादा आहत अभिभावक होते हैं, जो अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च करके बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए भेजते हैं। माता-पिता यह उम्मीद करते हैं कि उनका बच्चा स्कूल या कॉलेज में जाकर अपने भविष्य को संवारेगा और देश का जिम्मेदार नागरिक बनेगा। लेकिन जब वे अपने बच्चों को इस तरह के फूहड़ और अश्लील कृत्यों में लिप्त देखते हैं, तो उनका दिल बैठ जाता है।
पारिवारिक संस्कारों और आधुनिक स्वतंत्रता के बीच की यह बारीक रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। बच्चों को यह समझाना होगा कि मनोरंजन और अशुद्धता में बहुत बड़ा अंतर होता है। संस्कृति के नाम पर परोसी जा रही फूहड़ता हमारी युवा पीढ़ी को किस दिशा में ले जा रही है, इस पर आज हर स्तर पर मंथन करने की जरूरत है। केवल पुलिस या प्रशासन के भरोसे बैठकर इस समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता, बल्कि इसके लिए सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता फैलानी होगी।
भविष्य के लिए चेतावनी: कैसे सुधरेगा शिक्षण संस्थानों का माहौल?
यदि इस समस्या से समय रहते नहीं निपटा गया, तो इसके परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं। आज के छात्र कल के देश निर्माता हैं। अगर उनका नैतिक पतन इसी रफ्तार से जारी रहा, तो हम एक खोखले समाज का निर्माण कर रहे होंगे। शैक्षणिक संस्थानों को चाहिए कि वे अपने परिसरों में अनुशासन की पुरानी परंपराओं को कड़ाई से लागू करें। रील्स और सोशल मीडिया के नाम पर कॉलेज परिसरों में होने वाली हरकतों पर पैनी नजर रखी जानी चाहिए।
नियम तोड़ने वाले छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर होना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, युवाओं को यह समझाने की आवश्यकता है कि सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया और वास्तविक जीवन में बहुत अंतर है। असली सम्मान लाइक्स से नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र, ज्ञान और संस्कारों से मिलता है। समाज के सभी वर्गों को मिलकर इस सांस्कृतिक प्रदूषण के खिलाफ अपनी आवाज उठानी होगी, तभी जाकर हमारी आने वाली पीढ़ी एक सुरक्षित और सही दिशा में आगे बढ़ सकेगी।







