सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति पर महत्वपूर्ण निर्देश
देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति को लेकर चल रहे विवाद पर एक अहम फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहाना की पीठ ने केंद्र सरकार और सीबीएसई को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे कक्षा 6 के विद्यार्थियों को भी वही राहत और छूट दें जो पहले से ही कक्षा 7, 8 और 9 के छात्रों को दी जा रही है। अदालत का यह आदेश उन लाखों विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो नई नीति के क्रियान्वयन को लेकर असमंजस की स्थिति में थे।
यह पूरा मामला शैक्षणिक प्रणाली में किए जा रहे व्यापक सुधारों से जुड़ा है। सीबीएसई ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और विद्यालय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा 2023 के तहत अपने पाठ्यक्रम में बदलाव किए हैं। इन बदलावों के तहत स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए भारतीय मूल की दो भाषाओं सहित कुल तीन भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य बनाया गया है। हालांकि, इसे किस सत्र से और किस प्रकार लागू किया जाए, इसको लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा और कानूनी आपत्तियां सामने आ रही थीं, जिसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा।
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कक्षा 6 और वरिष्ठ कक्षाओं के नियमों में एकरूपता की मांग
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जब कक्षा 7, 8 और 9 के विद्यार्थियों को त्रि-भाषा नीति के कुछ प्रावधानों में राहत दी गई है, तो कक्षा 6 के बच्चों को इससे वंचित क्यों रखा जाए। इससे पहले, सीबीएसई के एक आधिकारिक बयान में यह स्पष्ट किया गया था कि वर्तमान में जो छात्र इन वरिष्ठ कक्षाओं में पढ़ रहे हैं, उन्हें जब वे कक्षा 10 में प्रवेश करेंगे तो तीसरी भाषा की कोई अलग से बोर्ड परीक्षा देने की बाध्यता नहीं होगी।
लेकिन जब बात कक्षा 6 की आई, तो केंद्र सरकार और बोर्ड का रुख शुरू में थोड़ा सख्त नजर आया। सरकार की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि इस शैक्षणिक वर्ष से ही नई नीति का पूर्ण पालन होना चाहिए, क्योंकि अधिकांश संस्थानों ने इसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार कर लिया है। इसके बावजूद, पीठ ने व्यावहारिक कठिनाइयों को समझते हुए यह सुझाव दिया कि छोटे बच्चों पर अचानक बढ़ते शैक्षणिक दबाव को नियंत्रित करने के लिए नीति के क्रियान्वयन को कुछ समय के लिए विनियमित किया जाना चाहिए।
अदालत में पेश किए गए आंकड़े और सॉलिसिटर जनरल के तर्क
मामلا की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत के सामने देश भर के स्कूलों की स्थिति से जुड़े ताजा आंकड़े रखे। सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को अवगत कराया कि देश के लगभग 99 प्रतिशत विद्यालयों ने तीन भाषाओं के अध्ययन से जुड़ी इस नीति को पूरी तरह से अपना लिया है और वहां बच्चों के लिए आवश्यक सुविधाएं व शिक्षक भी उपलब्ध करा दिए गए हैं।
सरकार की तरफ से यह भी बताया गया कि केवल 1.25 प्रतिशत स्कूल ही ऐसे बचे हैं जहां बुनियादी सुविधाओं का थोड़ा अभाव है और वहां भी इन्हें शीघ्र पूरा किया जा रहा है। सरकार का यह पक्ष था कि नीति को सुचारू रूप से लागू करने के लिए अब अधिकांश शिक्षण संस्थान पूरी तरह तैयार हैं, इसलिए इसे टालने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। हालांकि, अदालत ने स्कूलों की तैयारी के आंकड़ों के साथ-साथ विद्यार्थियों की मानसिक और शैक्षणिक सुगमता को भी प्राथमिकता देने की बात कही।
न्यायमूर्ति बागची का सुझाव और स्कूलों को अतिरिक्त समय
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि कक्षा 6 में पढ़ने वाले छोटे बच्चों के लिए इस त्रि-भाषा नीति के कठोर कार्यान्वयन को फिलहाल कुछ समय के लिए स्थगित किया जा सकता है। ऐसा करने से न केवल छात्रों को नई व्यवस्था के अनुकूल ढलने का पर्याप्त मौका मिलेगा, बल्कि सीबीएसई और स्कूलों को भी अपना बुनियादी ढांचा पूरी तरह मजबूत करने के लिए अतिरिक्त समय मिल जाएगा।
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि बदलाव अचानक होने पर बच्चों और अभिभावकों दोनों पर अनावश्यक मानसिक दबाव बनता है। इसलिए यह जरूरी है कि नियमों को लागू करते समय लचीलापन दिखाया जाए ताकि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों में ज्ञान का प्रसार करना बने, न कि उन्हें किसी प्रशासनिक जटिलता में उलझाना।
"हम निर्देश देते हैं कि छठी कक्षा के छात्रों को भी वही छूट दी जाए जो सातवीं कक्षा के छात्रों को दी गई है ताकि छात्रों पर बेवजह का दबाव न पड़े।" — सर्वोच्च न्यायालय पीठ
आगे की कानूनी प्रक्रिया और समय सीमा
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को अपनी बात रखने के लिए एक निश्चित समय सीमा तय की है। अदालत ने सीबीएसई को आदेश दिया है कि वह आगामी चार सप्ताह के भीतर इस मामले में अपना विस्तृत जवाब औपचारिक रूप से दाखिल करे। इसके पश्चात, याचिकाकर्ता को जवाब का प्रति-उत्तर देने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया जाएगा।
अदालत ने इन सभी याचिकाओं पर अगली सुनवाई के लिए अब से छह सप्ताह बाद की तारीख तय की है। इस अवधि के दौरान यह देखना दिलचस्प होगा कि सीबीएसई और केंद्र सरकार अदालत के इस मौखिक और लिखित निर्देशों के बाद किस प्रकार का औपचारिक हलफनामा पेश करती है। तब तक देश भर के हजारों स्कूलों और अभिभावकों की नजरें इस मामले पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका सीधा असर स्कूली शिक्षा के भविष्य और पाठ्यक्रम पर पड़ने वाला है.

