पश्चिम बंगाल में वोटरों के अधिकार छिनने पर उठा बड़ा सवाल
देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश ने पश्चिम बंगाल में हुए चुनावों के दौरान मतदाता सूची से जुड़े मामलों को लेकर बेहद कड़े शब्दों में अपनी बात रखी है। उनका यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब देश के विभिन्न राजनीतिक दल चुनावी सुधारों और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर आमने-सामने हैं। इस पूरे विवाद ने देश की न्यायपालिका और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
जानकारों का मानना है कि लोकतंत्र की मूल आत्मा जनता के मतदान के अधिकार में निहित होती है। यदि किसी प्रशासनिक या कानूनी प्रक्रिया के तहत एक बहुत बड़ा वर्ग अपने इस अधिकार से वंचित हो जाता है, तो यह पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर एक काला धब्बा माना जाता है। पूर्व न्यायाधीश की इस टिप्पणी ने न केवल आम नागरिकों बल्कि कानूनी विशेषज्ञों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारी चुनाव प्रणालियां इतनी मजबूत हैं कि वे आम आदमी के अधिकारों की पूरी रक्षा कर सकें।
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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस नरीमन की तीखी प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज, जस्टिस नरीमन ने एसआईआर प्रक्रिया को लेकर बेहद तीखे तेवर अपनाए हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस बात का गहरा अफसोस है कि पश्चिम बंगाल में लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए, इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने समय रहते इस पर रोक लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने इसे एक बेहद चौंकाने वाला और चिंताजनक आंकड़ा करार दिया है।
जस्टिस नरीमन के अनुसार, जिन लोगों के नाम सूची से हटाए गए थे, उनमें से केवल 22 लाख लोगों ने ही कानूनी अपील करने का साधन जुटाया। बाकी के लाखों लोग वे थे जिनके पास न्याय पाने के लिए आवश्यक संसाधन या जागरूकता नहीं थी। हैरान करने वाली बात यह रही कि जिन 22 लाख लोगों ने अपील की, उनमें से लगभग 1 लाख मामलों में से 93 फीसदी फैसले मतदाताओं के पक्ष में आए। इससे यह स्पष्ट होता है कि बड़े पैमाने पर नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से मताधिकार से बाहर किया गया था।
न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां की टिप्पणी और अदालती प्रक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज, जस्टिस उज्जवल भुइयां द्वारा दिए गए बयानों को भी काफी अहमियत दी जा रही है। उन्होंने पहले ही यह बात उठाई थी कि यदि किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार छिन जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया को बुनियादी तौर पर मनमानी ही कहा जाएगा। किसी भी प्रकार के तर्कों या कानूनी दांव-पेच से इस तरह की त्रुटियों को सही नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय के इन बयानों ने प्रशासनिक और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही तय करने की मांग को और तेज कर दिया है। कानूनी विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव जैसे संवेदनशील और पवित्र विषय में जरा सी भी लापरवाही या मनमानी पूरे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर सकती है। इसलिए यह जरूरी है कि अदालते और चुनाव आयोग ऐसे मामलों में पूरी तरह सतर्क रहें।
"अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार छिन जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी है। किसी भी तरह के तर्क से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता।" — जस्टिस उज्जवल भुइयां, सुप्रीम कोर्ट
राजनीतिक गलियारों में भूचाल और कांग्रेस का हमला
न्यायपालिका के इन बयानों के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। विपक्षी दलों ने इसे सरकार और निर्वाचन आयोग के खिलाफ एक बड़ा हथियार बना लिया है। कांग्रेस पार्टी ने विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्जवल भुइयां की टिप्पणियों का हवाला देते हुए आक्रामक रुख अपना लिया है। पार्टी का दावा है कि इन बयानों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
कांग्रेस का यह भी आरोप है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास अब अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बचा है क्योंकि उन्होंने संविधान की मूल भावना और उसके प्रावधानों का उल्लंघन किया है। विपक्षी दलों की इस मांग ने आने वाले दिनों में संसद और सड़क दोनों जगहों पर बड़े राजनीतिक संघर्ष के संकेत दे दिए हैं।
लोकतंत्र के भविष्य और चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर चिंतन
वर्तमान समय में देश के भीतर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और डिजिटल डेटा की शुद्धता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जब न्यायपालिका के भीतर से ही ऐसी आवाजें आने लगती हैं कि नागरिकों के अधिकार छीने जा रहे हैं, तो आम जनता का विश्वास तंत्र पर से डगमगाने लगता है। यह आवश्यक हो गया है कि चुनाव आयोग इन तमाम गंभीर आरोपों और टिप्पणियों पर खुलकर स्थिति स्पष्ट करे।
देश के हर नागरिक को यह जानने का हक है कि उसके मतदान के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। यदि समय रहते इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो चुनावी प्रक्रिया की साख पर स्थायी धब्बा लग सकता है, जिससे हमारे महान लोकतंत्र की नींव हिल सकती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि देश के सर्वोच्च न्यायालय और निर्वाचन आयोग इस दिशा में क्या सुधारात्मक कदम उठाते हैं।




