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महंगाई पर डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दांव: G7 देशों ने खोले इमरजेंसी ऑयल रिजर्व, भारत तक पहुंचेगा राहत का खजाना

पश्चिम एशिया में जारी भारी संघर्ष और ईंधन संकट के बीच जी-7 देशों ने अपने रणनीतिक भंडार से 10 करोड़ बैरल कच्चा तेल और डीजल बाजार में जारी करने का बड़ा फैसला किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के बाद उठाए गए इस कदम से वैश्विक बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
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तकनीक व ऑटोमोबाइल डेस्क•3 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•44
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महंगाई पर डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दांव: G7 देशों ने खोले इमरजेंसी ऑयल रिजर्व, भारत तक पहुंचेगा राहत का खजाना
📷 महंगाई पर डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दांव: G7 देशों ने खोले इमरजेंसी ऑयल रिजर्व, भारत तक पहुंचेगा राहत का खजाना — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • G7 देशों के संगठन ने अपने आपातकालीन भंडार से 10 करोड़ बैरल क्रूड ऑयल और डीजल बाजार में उतारने पर सहमति जताई है।
  • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) इस पूरी प्रक्रिया का समन्वय कर रही है, जिसके तहत शुरुआती 20 दिनों में भारी मात्रा में डीजल सप्लाई किया जाएगा।
  • पश्चिम एशिया युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के कारण दुनिया भर में ईंधन की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया था।

पश्चिम एशिया में सुलग रही जंग की आग और सप्लाई चेन बाधित होने के कारण पूरी दुनिया में ईंधन का भारी संकट पैदा हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी और क्रूड ऑयल की आवाजाही ठप होने से पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे आम जनता की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है। इस वैश्विक हाहाकार के बीच भारत समेत दुनिया के तमाम देशों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। दुनिया की सात प्रमुख औद्योगिक महाशक्तियों ने मिलकर अपने रणनीतिक तेल भंडार खोल दिए हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल उतारने का बड़ा ऐलान किया है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की अगुवाई में हुई G7 देशों की उच्चस्तरीय बैठक में इस बात पर पूर्ण सहमति बनी कि करीब 100 मिलियन यानी 10 करोड़ बैरल कच्चा तेल और डीजल चरणबद्ध तरीके से बाजार में उतारा जाएगा। इस पूरे अभियान को अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA के जरिए अगले चार महीनों के भीतर अमलीजामा पहनाया जाएगा। जानकारों का मानना है कि इस कदम से न केवल वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की किल्लत दूर होगी, बल्कि भारत जैसे आयातक देशों को भी बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा रुख और यूरोपीय देशों पर दबाव

इस बड़े फैसले के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा राजनीतिक दबाव और अमेरिका में आसमान छूती ईंधन की कीमतें मुख्य वजह रहीं। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले ट्रंप प्रशासन पर घरेलू बाजार में गैस और डीजल के रिकॉर्ड तोड़ दामों को नियंत्रित करने का भारी दबाव था। अमेरिका स्थित ऑटोमोबाइल एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिकी बाजारों में डीजल के दाम ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गए थे, जिससे रिपब्लिकन पार्टी की लोकप्रियता रेटिंग में गिरावट दर्ज की जा रही थी।

अपनी रणनीति के तहत, अमेरिका ने यूरोपीय संघ और सहयोगियों पर अपने भारी-भरकम डीजल भंडार का इस्तेमाल करने के लिए दबाव बनाया था। वाशिंगटन ने साफ चेतावनी दी थी कि यदि यूरोपीय देश इस दिशा में तेजी से कदम नहीं उठाते हैं, तो अमेरिका अपने घरेलू हितों को ध्यान में रखते हुए डीजल के निर्यात पर पाबंदी लगा सकता है। चूंकि यूरोप रूस से ईंधन आयात बंद होने के बाद से अमेरिकी डीजल पर काफी हद तक निर्भर हो चुका है, इसलिए इस चेतावनी के बाद यूरोपीय राजधानियों में खलबली मच गई और आखिरकार G7 देश इस आपातकालीन रिलीज पर राजी हो गए.

"यूरोप अपने भारी भंडार वाले डीजल की एक बड़ी मात्रा जारी करने पर सहमत हो गया है, और यह प्रक्रिया तत्काल प्रभाव से शुरू होगी ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था को संकट से उबारा जा सके।" — डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति

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शुरुआती 20 दिनों में भारी मात्रा में डीजल की होगी सप्लाई

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के समन्वय से चलाए जाने वाले इस चार महीने के अभियान की रूपरेखा बेहद आक्रामक बनाई गई है। समझौते के तहत, G7 सदस्य और उनके साझेदार देश शुरुआती 20 दिनों के भीतर ही बाजार में बड़े पैमाने पर डीजल झोंक देंगे। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि युद्ध के कारण अचानक से ठप पड़े ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन को तुरंत पटري पर लाया जा सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में परिवहन और माल ढुलाई पूरी तरह से डीजल पर निर्भर है। ऐसे में यदि डीजल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी होती है, तो खाने-पीने की चीजों से लेकर हर जरूरी सामान के दाम बढ़ जाते हैं। G7 के इस तात्कालिक कदम से मालभाड़े की लागत कम होगी और आम उपभोक्ताओं को महंगाई के मोर्चे पर कुछ राहत मिलेगी। हालांकि, यह भी देखा जाना बाकी है कि मार्च महीने में हुए पुराने समझौतों के मुकाबले इस नए कोटे में कितना फ्रेश ऑयल शामिल किया जाता है।

ब्रिटेन और यूरोपीय देशों की बढ़ती मुश्किलें

इस वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों की आंतरिक स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। ब्रिटेन के मोटरिंग संगठनों के अनुसार, देश में एक सामान्य परिवार की कार का टैंक फुल कराने का खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है, जो युद्ध शुरू होने के समय की तुलना में काफी ज्यादा है। ब्रिटेन अपनी कुल डीजल जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है और देश के पास सीमित दिनों का ही रणनीतिक रिजर्व बचा है।

दूसरी तरफ, कुछ यूरोपीय देशों के पास अपेक्षाकृत बड़ा स्टॉक मौजूद है, लेकिन अमेरिका के दबाव के बाद अब सभी सदस्य देश मिलकर साझा मोर्चे पर काम करने को मजबूर हैं। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह संयुक्त आपातकालीन रिलीज समय पर बाजार में नहीं आती, तो यूरोप के कई हिस्सों में परिवहन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती थी और महंगाई दर बेकाबू हो सकती थी।

भारत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए क्या हैं मायने?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया के घटनाक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य की रुकावटों से भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी मनोवैज्ञानिक और वित्तीय दबाव बढ़ रहा था। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से देश में आयात बिल भारी हो जाता है और राजकोषीय घाटे पर असर पड़ता है।

G7 देशों द्वारा 10 करोड़ बैरल क्रूड ऑयल बाजार में उतारे जाने से अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमतों में नरमी आने की पूरी संभावना है। जब वैश्विक बाजार में सप्लाई बढ़ती है, तो दाम नीचे आते हैं, जिसका सीधा फायदा भारत जैसी तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को मिलता है। घरेलू रिफाइनरियों को सही दरों पर कच्चा तेल मिलने से पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में स्थिरता बनी रहेगी, जिससे आम आदमी की जेब को राहत मिलती रहेगी।

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