मुंबई में मोहन भागवत का बड़ा बयान, धर्म और राष्ट्र को बताया एक-दूसरे का पूरक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने देश की सांस्कृतिक और वैचारिक नींव को लेकर एक बेहद अहम बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भारत के संदर्भ में धर्म और राष्ट्र को कभी भी अलग-अलग खानों में नहीं बांटा जा सकता है। ये दोनों अवधारणाएं आपस में इस तरह जुड़ी हुई हैं कि एक के बिना दूसरे के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। संघ प्रमुख का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश और दुनिया के स्तर पर वैचारिक और सांस्कृतिक बहसों का दौर जारी है।
मुंबई में आयोजित एक भव्य और महत्वपूर्ण सम्मेलन को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्र का असली उद्देश्य और मार्गदर्शक बल धर्म ही है। जब तक समाज और राष्ट्र में धर्म की सही और वास्तविक समझ बनी रहती है, तब तक देश सुरक्षित रहता है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में यह भी कहा कि यदि किसी भी स्थिति में धर्म संकट के दौर से गुजरता है, तो उसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव पूरे देश को भुगतना पड़ेगा।
इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रबुद्ध जन और युवा बड़ी संख्या में उपस्थित थे। संघ प्रमुख ने अपने संबोधन के जरिए यह समझाने का प्रयास किया कि पश्चिमी देशों की 'रिलिजन' की अवधारणा और भारतीय सनातन परंपरा के 'धर्म' के विचार में जमीन-आसमान का अंतर है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्म का अर्थ केवल व्यक्तिगत पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोने और उच्च मानवीय मूल्य सिखाने वाली व्यवस्था है।
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वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की ओर देख रही दुनिया
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए मोहन भागवत ने आज के वैश्विक परिदृश्य का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया विकास की अंधी दौड़, पर्यावरण से जुड़े गंभीर संकटों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन के मूल्यों के बीच एक संवेदनशील संतुलन तलाश रही है। ऐसे तमाम विरोधाभासों और अशांति के माहौल के बीच दुनिया की नजरें भारत की तरफ टिकी हुई हैं।
संघ प्रमुख ने इस बात पर गर्व जताया कि भारत ने इतिहास में कभी भी किसी अन्य देश पर बलपूर्वक कब्जा करने या वहां के लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन कराने की नीति का समर्थन नहीं किया। इसके विपरीत, भारत ने हमेशा अपने ज्ञान, विज्ञान और आध्यात्मिक धरोहर को पूरी मानवता के कल्याण के लिए दुनिया के साथ साझा किया है। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बात स्वीकार की जा रही है कि आधुनिक युग की जटिल समस्याओं का सही रास्ता भारत की भूमि से ही निकलेगा।
भारत की इस विशाल विरासत का जिक्र करते हुए उन्होंने वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता के साथ-साथ जैन आगम, त्रिपिटक, गुरु ग्रंथ साहिब और देश के महान संतों की शिक्षाओं को देश का सबसे बड़ा खजाना बताया। उन्होंने कहा कि इस अमूल्य ज्ञान भंडार में मानव जीवन की हर समस्या का समाधान मौजूद है, जिसकी आज पूरी दुनिया को बेहद आवश्यकता है।
भक्ति की शक्ति और मानवता के सुरक्षित भविष्य की रक्षा का संदेश
कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने आध्यात्मिक पक्ष पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में भक्ति की शक्ति का विशेष महत्व है, जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने भीतर की दिव्यता को पहचान कर ईश्वर के करीब पहुंच सकता है। यह मार्ग किसी भय या दबाव पर आधारित नहीं है, बल्कि प्रेम, समर्पण और आंतरिक शांति पर टिका हुआ है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस महान ज्ञान परंपरा को सहेजने और आगे बढ़ाने वाले लोगों के जीवन और उनकी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना मात्र किसी एक वर्ग की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरी मानवता की सेवा का कार्य है। जब हम अपनी इस संस्कृति और परंपरा की रक्षा करते हैं, तो हम केवल कुछ व्यक्तियों को नहीं बचा रहे होते, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य की नींव मजबूत कर रहे होते हैं।
"हमारा राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं। राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है और धर्म राष्ट्र को बनाए रखता है। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। अगर एक मौजूद है, तो दूसरा भी मौजूद है। अगर एक नहीं है, तो दूसरा भी नहीं है।" — मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख
संत ज्ञानेश्वर महाराज के स्मरण के साथ 'ज्ञानरंग : ज्ञानेश्वरी' ऐप का लोकार्पण
अपने मुंबई प्रवास के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया। शाम के समय उन्होंने प्रभादेवी स्थित प्रतिष्ठित रवींद्र नाट्य मंदिर में आयोजित एक भव्य समारोह में शिरकत की। यह आयोजन संत ज्ञानेश्वर महाराज के 750वें जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में रखा गया था, जहां बड़ी संख्या में संत, महात्मा और श्रद्धालु मौजूद रहे।
इस अवसर पर मोहन भागवत ने 'ज्ञानरंग : ज्ञानेश्वरी' नाम से एक आधुनिक मोबाइल एप्लिकेशन का आधिकारिक लोकार्पण किया। इस डिजिटल पहल का उद्देश्य संत ज्ञानेश्वर महाराज के विचारों और उनकी महान कृति ज्ञानेश्वरी को आज की तकनीकी पीढ़ी तक आसानी से पहुंचाना है। इस दौरान उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग जब आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान के प्रसार के लिए किया जाता है, तो समाज को इसका दीर्घकालिक लाभ मिलता है।
निष्कर्ष: सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण का अटूट रिश्ता
मोहन भागवत के इन बयानों से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को देश की अखंडता और प्रगति की धुरी मानता है। जब तक देश का समाज अपने मूल संस्कारों, नैतिक मूल्यों और धर्म की सही समझ से जुड़ा रहेगा, तब तक राष्ट्र किसी भी बाहरी या भीतरी चुनौती का मजबूती से सामना कर सकेगा। मुंबई के इन आयोजनों ने एक बार फिर से इस बात को रेखांकित किया है कि भारत की असली ताकत उसकी प्राचीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर में निहित है, जिसे संजोकर रखना हर नागरिक का दायित्व है।








