नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की सबसे बड़ी अदालत ने चुनाव आयोग को एक बहुत ही गंभीर मामले में आड़े हाथों लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान वोटों की गिनती के वीडियो फुटेज गायब होने पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि चुनाव आयोग की तरफ से ऐसे बेतुके और घटिया बहाने अब बिल्कुल भी नहीं चलेंगे। मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने सुनवाई के दौरान आयोग के अधिकारियों से सीधा सवाल किया कि आखिर यह जरूरी रिकॉर्डिंग कहां चली गई और यह गायब कैसे हो गई?
यह पूरा मामला साल 2023 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों से जुड़ा हुआ है। चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए हर केंद्र पर काउंटिंग के दौरान की वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने का नियम होता है। लेकिन जब अदालत में इस फुटेज को पेश करने की बारी आई, तो चुनाव आयोग की तरफ से इसे ढूंढ पाने में असमर्थता जताई गई। आयोग के वकीलों और अधिकारियों के पास इस बात का कोई पुख्ता जवाब नहीं था कि वह जरूरी डिजिटल रिकॉर्डिंग इस समय कहां पर मौजूद है। इसके बाद से ही देश के राजनीतिक गलियारों और कानूनी हलकों में इस बात पर बहस तेज हो गई है कि देश के सबसे बड़े चुनावी संस्थान से ऐसे अहम दस्तावेज कैसे गायब हो सकते हैं।
वीडियो फुटेज गायब होने पर कोर्ट का सख्त रुख
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों का गुस्सा साफ तौर पर देखने को मिला। कोर्ट ने दो टूक कहा कि चुनाव जैसे पवित्र और संवेदनशील लोकतांत्रिक काम में इस तरह की लापरवाही किसी भी कीमत पर सहन नहीं की जाएगी। जब कोर्ट ने पूछा कि वीडियो कहां है, तो आयोग की तरफ से गोलमोल जवाब दिए गए। इस पर अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इस प्रकार के बहाने बनाकर जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता है। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि चुनाव प्रक्रिया की हर एक बात पर देश की जनता का भरोसा टिका होता है, और ऐसे में फुटेज का गायब होना उस भरोसे को सीधे तौर पर ठेस पहुंचाता है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालतों का यह सख्त रवैया भविष्य के लिए एक बड़ा संदेश है। देश के अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों और भविष्य की तैयारियों के मद्देनजर यह जरूरी है कि हर एक इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो साक्ष्य को पूरी तरह सुरक्षित रखा जाए। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से यह उम्मीद की जाती है कि वह अदालत और जनता के सामने पूरी पारदर्शिता के साथ काम करे। लेकिन इस मामले में जिस तरह से वीडियो न मिलने की बात सामने आई है, उसने पूरी व्यवस्था पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
इस पूरी घटना के बाद से आम जनता और विपक्षी दलों के मन में भी कई तरह की आशंकाएं जन्म ले रही हैं। लोकतंत्र में वोट की गिनती का हर एक पल बहुत कीमती और संवेदनशील होता है। यदि उसी गिनती का वीडियो रिकॉर्ड ही सुरक्षित न मिले, तो हार-जीत के अंतर पर सवाल उठाने वालों को बल मिल जाता है। जानकारों का कहना है कि चुनाव आयोग को अब अपनी तकनीकी टीमों और स्टोर रूम की सुरक्षा व्यवस्था को और ज्यादा पुख्ता करना होगा, ताकि भविष्य में कभी भी ऐसा अजीबोगरीब मौका न आए जब यह कहना पड़े कि फुटेज मिल नहीं रही है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, इस मामले में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग को कोर्ट के सामने कोई ठोस हलफनामा दाखिल करना पड़ सकता है। अदालत ने इस मामले को बहुत हल्के में नहीं लिया है और वह चाहती है कि सच जल्द से जल्द देश के सामने आए। क्या वह वीडियो वाकई डिलीट हो गया है या फिर उसे किसी दूसरी जगह सुरक्षित रखा गया है, इन सभी सवालों के जवाब अब चुनाव आयोग को कानूनी प्रक्रिया के तहत देने ही होंगे। देश की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि अगली सुनवाई में आयोग सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या सफाई पेश करता है।
पारदर्शिता पर बड़ा संकट और आगे की राह
लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह बेहद जरूरी है कि चुनाव से जुड़े हर दस्तावेज और फुटेज की कड़ी निगरानी हो। कर्नाटक चुनाव के इस मामले ने एक बार फिर से यह दिखा दिया है कि डिजिटल रिकॉर्ड को सहेजने के मामले में अभी भी सिस्टम में कई बड़ी कमियां मौजूद हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस फटकार के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि चुनाव आयोग देश भर के अपने सभी दफ्तरों में पुराने रिकॉर्ड को लेकर एक बार फिर से चेकिंग अभियान चलाएगा।
द फ्रीलान्स की यह विशेष रिपोर्ट इस बात की गवाही देती है कि जब न्यायपालिका सवाल पूछती है, तो बड़ी से बड़ी संस्थाओं को भी जवाब देना ही पड़ता है। आम आदमी और मतदाता यह देखना चाहते हैं कि उनके द्वारा डाले गए वोटों की गिनती पूरी पारदर्शिता के साथ हो और उसका पूरा सबूत हमेशा सुरक्षित रहे। इस मामले का जो भी अगला कानूनी मोड़ होगा, हमारी टीम सबसे पहले और सबसे सटीक रूप से आप तक पहुंचाती रहेगी।









