मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर गरमाई सियासत
देश की राजधानी दिल्ली सहित विभिन्न हिस्सों में इन दिनों मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया चल रही है। इस प्रक्रिया ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इसी बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेता साकेत गोखले ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की मतदाता सूची में स्थिति को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। गोखले ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया है कि क्या देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त खुद सभी वैधानिक पैमानों पर खरे उतरते हैं और क्या पिछली एसआईआर के दौरान उनका रिकॉर्ड पूरी तरह स्पष्ट है।
यह मामला ऐसे समय में तूल पकड़ रहा है जब निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में दिल्ली में एसआईआर के तहत मसौदा मतदाता सूची जारी की गई है। इस सूची के आने के बाद से ही प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चाओं का बाजार गर्म है, क्योंकि कई नामी-गिरामी हस्तियों और राजनेताओं को भी अपने दस्तावेजों व प्रपत्रों में विसंगतियों के चलते नोटिस थमाए गए हैं। टीएमसी नेता के इन तीखे सवालों ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिस पर अब राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं।
संबंधित खबरें
साकेत गोखले के गंभीर आरोप और चुनावी आंकड़ों की पड़ताल
राज्यसभा के पूर्व सदस्य और टीएमसी नेता साकेत गोखले ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर सिलसिलेवार पोस्ट कर दावा किया कि उन्होंने ज्ञानेश कुमार की चुनावी पृष्ठभूमि की खुद जांच-पड़ताल की है। गोखले के मुताबिक, वर्तमान में ज्ञानेश कुमार का नाम दिल्ली की मतदाता सूची में 'ज्ञानेश कुमार पुत्र सुबोध कुमार' के रूप में दर्ज है। हालांकि, जब उनके अतीत के राज्यों और कैडर का मिलान किया गया, तो कई पेचीदगियां सामने आईं।
गोखले ने तर्क दिया कि ज्ञानेश कुमार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, वह केरल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे हैं और उनकी तैनाती राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी लंबी अवधि तक रही है। इन तीनों राज्यों—उत्तर प्रदेश, केरल और दिल्ली—की पिछली एसआईआर सूचियों की जब तलाश की गई, तो वहां इस नाम का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। टीएमसी नेता का कहना है कि यदि पिछली सूचियों में प्रविष्टि नहीं मिलती है, तो इसे प्रशासनिक भाषा में 'तार्किक विसंगति' माना जाता है।
"यदि किसी व्यक्ति का नाम 2002-2003 की एसआईआर से नहीं जोड़ा जा सकता है, तो उसे तार्किक विसंगति के तौर पर चिह्नित किया जाता है और नोटिस जारी किया जाता है। देश को यह जानने का हक है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार की पात्रता का आधार क्या है।" — साकेत गोखले, तृणमूल कांग्रेस नेता
'अनमैप्ड वोटर' और तार्किक विसंगति का पेच
एसआईआर प्रक्रिया के तहत 'अनमैप्ड वोटर' और 'तार्किक विसंगति' जैसे शब्द इन दिनों काफी चर्चा में हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा उन मतदाताओं को 'अनमैप्ड वोटर' की श्रेणी में रखा जा रहा है, जिनके खुद के या उनके माता-पिता के नाम 2002 या 2005 की एसआईआर प्रक्रिया के बाद तैयार अंतिम मतदाता सूचियों में नहीं मिल पा रहे हैं। इस श्रेणी के तहत आने वाले नागरिकों को अपने दस्तावेज सत्यापित करने के लिए नोटिस भेजे जा रहे हैं।
साकेत गोखले ने इसी तकनीकी प्रावधान का हवाला देते हुए निर्वाचन आयोग से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि यदि उत्तर प्रदेश, केरल और दिल्ली की पुरानी सूचियों में सीईसी का नाम नहीं है, तो मौजूदा मतदाता सूची में उनका नाम किस प्रकार और किन दस्तावेजों के आधार पर जोड़ा गया है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या सामान्य नागरिकों की तरह मुख्य निर्वाचन आयुक्त को भी 'तार्किक विसंगति' के संबंध में कोई नोटिस जारी किया गया है या उनके मामले में कोई अलग नियम लागू होता है।
दिग्गज हस्तियों को नोटिस मिलने से बढ़ा विवाद
टीएमसी नेता की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब दिल्ली में चल रही एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियों और जानी-मानी शख्सियतों को नोटिस जारी किए जाने को लेकर पहले से ही विवाद उपजा हुआ है। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और निर्वाचन आयुक्त एस एस संधू सहित कई अति-विशिष्ट लोगों को उनके गणना प्रपत्रों में पाई गई विसंगतियों के संबंध में नोटिस भेजे गए हैं।
जब देश के इतने बड़े और वरिष्ठ नेताओं को प्रक्रियागत विसंगतियों के कारण नोटिस मिल सकते हैं, तो आम जनता के बीच इसको लेकर प्रशासनिक सख्ती और पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। निर्वाचन आयोग ने एसआईआर के तहत 97 लाख से अधिक मतदाताओं वाली मसौदा सूची जारी की है, जिसमें से 33.13 लाख से अधिक मतदाताओं को विभिन्न प्रकार की विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए जा रहे हैं। इस बड़े पैमाने पर हो रही सत्यापन प्रक्रिया के कारण आम लोगों के साथ-साथ राजनीतिक दलों में भी असहजता का माहौल देखा जा रहा है।
निर्वाचन आयोग की चुप्पी और भविष्य की राह
साकेत गोखले द्वारा उठाए गए इन तीखे सवालों और सार्वजनिक रूप से मांगी गई स्पष्टीकरण के बाद से अभी तक भारत निर्वाचन आयोग या मुख्य निर्वाचन आयुक्त कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या बयान सामने नहीं आया है। आयोग इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या इन राजनीतिक सवालों के जवाब में कोई विस्तृत प्रशासनिक स्पष्टीकरण जारी किया जाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर जैसी संवेदनशील और वृहद प्रशासनिक प्रक्रियाओं के दौरान पारदर्शिता और समानता का पालन होना अत्यंत आवश्यक है ताकि जनता का निर्वाचन प्रणाली पर अटूट विश्वास बना रहे। जैसे-जैसे मतदाता सूची के पुनरीक्षण का यह कार्य आगे बढ़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा कि आयोग इन राजनीतिक बहसों और तकनीकी विसंगतियों के दाawaओं का किस प्रकार समाधान करता है और क्या देश के नागरिकों को इस पूरी प्रक्रिया की एक पारदर्शी तस्वीर देखने को मिलती है।


