आठ साल का लंबा इंतजार और न्याय की आस
उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में मील का पत्थर साबित होने वाली 68,500 सहायक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया लंबे समय से कानूनी पेंच और विसंगतियों के साए में है। इस भर्ती प्रक्रिया से जुड़े पीड़ित अभ्यर्थियों का सब्र अब जवाब देने लगा है। बीते आठ वर्षों से लगातार दर-दर की ठोकरें खाने के बाद इन बेरोजगार युवाओं ने अपनी आवाज बुलंद करने के लिए राजनीतिक गलियारों का रुख किया है। इसी कड़ी में अभ्यर्थियों का एक प्रतिनिधिमंडल देश की राजधानी और प्रदेश के सियासी केंद्र में सक्रिय नेताओं से लगातार संपर्क साध रहा है।
गांधी जयंती के पावन अवसर पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने पहुंचे इन युवाओं ने कोई उग्र प्रदर्शन करने के बजाय संवाद का रास्ता चुना। अभ्यर्थियों का कहना है कि वे बीते करीब एक दशक से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें कोरे आश्वासनों के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा। इस बार उन्होंने केंद्रीय राज्य मंत्री और अपना दल (एस) की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल से औपचारिक भेंट कर अपनी पूरी व्यथा उनके सामने रखी है।
अभ्यर्थियों ने केंद्रीय मंत्री को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है जिसमें भर्ती प्रक्रिया के दौरान बरती गई अनियमितताओं और आरक्षण नियमों के उल्लंघन का पूरा लेखा-जोखा दिया गया है। मुलाकात के दौरान युवाओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं निकाला गया, तो उनका संघर्ष और अधिक तीव्र हो जाएगा, जिसके लिए शासन-प्रशासन स्वयं जिम्मेदार होगा।
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आरक्षण विसंगतियों और आयोग की संस्तुतियों का पेच
इस पूरे विवाद के केंद्र में आरक्षण नियमों का सही ढंग से पालन न होना और ओबीजी समेत अन्य आरक्षित वर्गों के साथ कथित अन्याय है। आंदोलनकारी अभ्यर्थियों का मुख्य तर्क है कि उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस मामले में पहले ही स्पष्ट संस्तुतियां और आदेश जारी किए हैं। आयोग के निर्देशों के मुताबिक, उन सभी ओबीसी अभ्यर्थियों को योग्य माना जाना चाहिए जिन्होंने निर्धारित परीक्षा में 150 में से 60 अंक यानी 40 प्रतिशत या उससे अधिक अंक हासिल किए हैं।
लेकिन विडंबना यह है कि शासन और संबंधित विभागों द्वारा इन संस्तुतियों का प्रभावी और जमीनी अनुपालन आज तक सुनिश्चित नहीं किया गया है। अभ्यर्थियों का आरोप है कि लिखित परीक्षाओं और काउंसलिंग के दौरान आरक्षित वर्ग को मिलने वाली वैधानिक छूट और प्रावधानों को नजरअंदाज किया गया, जिसके कारण योग्य युवा चयन सूची से बाहर हो गए। पूर्व में बेसिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्रियों के साथ हुई बैठकों में भी इस बात पर सहमति बनी थी कि चयन प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ियां हुई हैं, इसके बावजूद ठोस सुधारात्मक कदम उठाने में टालमटोल की जा रही है।
राजकीय और प्रशासनिक स्तर पर फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रही हैं, लेकिन धरातल पर पीड़ित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र नसीब नहीं हुआ है। यही कारण है कि अब वेकी केंद्रीय मंत्रियों और सीधे मुख्यमंत्री स्तर पर हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं ताकि पारदर्शी तरीके से संशोधित चयन सूची का प्रकाशन किया जा सके।
हजारों खाली पदों पर नियुक्ति की पुरजोर मांग
68,500 शिक्षक भर्ती प्रक्रिया के आंकड़ों पर नजर डालें तो इसमें अभी भी भारी संख्या में सीटें रिक्त पड़ी हैं। प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 23,000 से अधिक पद खाली रह गए हैं। इन खाली सीटों में सबसे बड़ा हिस्सा अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी श्रेणी का है, जिसके अकेले 9,000 से अधिक पद बिना भरे ही छोड़ दिए गए हैं।
इसके अतिरिक्त, दिव्यांगजनों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों और भूतपूर्व सैनिकों के लिए आरक्षित कोटे की सीटें भी खाली पड़ी हैं। अभ्यर्थियों का सवाल है कि जब योग्य उम्मीदवार उपलब्ध हैं और सीटें भी रिक्त पड़ी हैं, तो फिर उन पदों पर नियुक्ति देने में किस प्रकार की प्रशासनिक अड़चन आ रही है। उनका तर्क है कि एक तरफ जहां प्रदेश के विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है और पढ़ाई प्रभावित हो रही है, वहीं दूसरी तरफ काबिल युवा सड़कों पर धक्के खाने को मजबूर हैं।
अभ्यर्थियों ने चेतावनी दी है कि यदि इन सभी रिक्त पदों को योग्य अभ्यर्थियों से नहीं भरा गया, तो यह सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान होगा। वे चाहते हैं कि सरकार संवेदनशीलता दिखाते हुए इन खाली पदों पर चरणबद्ध तरीके से नियुक्ति प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी करे।
केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल का मिला सकारात्मक भरोसा
अभ्यर्थियों के प्रतिनिधिमंडल की गुहार सुनने के बाद केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने उन्हें पूरी सहानुभूति और समर्थन का भरोसा दिया है। मुलाकात के दौरान अभ्यर्थी आशुतोष ने विस्तार से पूरी स्थिति से मंत्री को अवगत कराया और बताया कि किस प्रकार वे लोग पिछले आठ सालों से मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेल रहे हैं।
"अभ्यर्थियों ने अपनी समस्याओं को बहुत ही शालीनता से रखा है। इस संवेदनशील मामले को पूरी प्रमुखता के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष उठाया जाएगा ताकि इन युवाओं को न्याय मिल सके।" — अनुप्रिया पटेल, केंद्रीय मंत्री एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, अपना दल (एस)
केंद्रीय मंत्री की तरफ से मिले इस आश्वासन के बाद अभ्यर्थियों की उम्मीदों को एक बार फिर पंख लगे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि चूंकि मामला अब देश और प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच रहा है, इसलिए निश्चित रूप से कोई सकारात्मक और व्यावहारिक रास्ता निकलेगा। हालांकि, अभ्यर्थियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल मौखिक आश्वासनों के भरोसे अब और लंबा इंतजार करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।
आगे की रणनीति और आर-पार की चेतावनी
लंबे समय से आंदोलनरत शिक्षक अभ्यर्थियों ने अपनी आगामी रणनीति को लेकर भी पत्ते खोल दिए हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार जल्द ही इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाती है और संशोधित चयन सूची जारी कर नियुक्ति का आधिकारिक शेड्यूल घोषित नहीं करती है, तो उनका आंदोलन और अधिक उग्र होगा।
जरूरत पड़ने पर ये युवा राज्य भर से जुटकर राजधानी लखनऊ में आमरण अनशन और महाआंदोलन करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। उनका यह संघर्ष केवल नौकरी पाने की जिद नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और न्याय की आखिरी लड़ाई है। अब देखना यह होगा कि केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और कब तक इन बेरोजगार युवाओं को उनका हक मिल पाता है।




