उत्तर प्रदेश में दलित वोटों की सियासत हुई तेज
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों दलित वोटों को साधने की होड़ मची हुई है। राज्य में विधानसभा चुनाव भले ही अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। प्रदेश की करीब 21 फीसदी दलित आबादी किसी भी दल की सियासी नैया पार लगाने या डुबाने का माद्दा रखती है। यही वजह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों ही इस अहम वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जो दल दलित मतदाताओं का भरोसा जीतने में कामयाब रहेगा, राज्य की सत्ता का रास्ता उसी के लिए आसान होगा।
इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। हाल ही में अखिलेश यादव ने प्रदेश की सभी आरक्षित (रिज़र्व) विधानसभा सीटों के प्रमुख पदाधिकारियों की एक अहम बैठक बुलाई थी। इस बैठक का मुख्य एजेंडा दलित समाज के बीच पार्टी की पकड़ को मजबूत करना और पार्टी की नीतियों को बूथ स्तर तक पहुंचाना था। समाजवादी पार्टी इस बात को अच्छी तरह समझती है कि बिना दलितों को साधे सत्ता के सिंहासन तक पहुंचना नामुमकिन है, इसलिए रणनीति में बड़े बदलाव किए जा रहे हैं।
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सपा का 'मिशन 65' और बूथ स्तर पर खास रणनीति
समाजवादी पार्टी ने यूपी की कुल 86 आरक्षित विधानसभा सीटों में से उन 65 सीटों पर विशेष फोकस किया है, जहां पिछले विधानसभा चुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। इन सीटों पर कमजोरियों को दूर करने के लिए पार्टी ने एक खास फॉर्मूला तैयार किया है। समाजवादी पार्टी की योजना हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 27 हजार नए वोट अपने पक्ष में जोड़ने की है। इसके लिए पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को गांवों और दलित बस्तियों में जाकर सीधा संवाद स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार दलितों के मुद्दों, उनके अधिकारों और संविधान संरक्षण की बात मजबूती से उठा रहे हैं। उन्होंने हाल ही में यह गंभीर आरोप भी लगाया था कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में प्रदेश के कई जिलों में डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया गया है। इसके अलावा, प्रतीकात्मक रूप से भी पार्टी ने अपनी पहचान में बदलाव किए हैं। सपा छात्र सभा की ड्रेस को नीले रंग में बदला गया है और अखिलेश यादव खुद कई मौकों पर नीला गमछा पहने नजर आए हैं, जिसे राजनीतिक हलकों में दलित प्रतीकों को अपनाने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
मायावती की कमजोर होती पकड़ और सपा की नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती को हमेशा से दलितों की सबसे बड़ी नेता माना जाता रहा है। मायावती के नेतृत्व में बसपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार भी चलाई है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में राजनीतिक समीकरण काफी बदले हैं। वर्ष 2014 के बाद से एक बड़े पैमाने पर दलित वोट बैंक बसपा से छिटककर भारतीय जनता पार्टी की तरफ शिफ्ट हुआ है। इसके अलावा, मौजूदा समय में बसपा के आंतरिक और पारिवारिक समीकरणों में चल रही उठापटक का फायदा उठाने की कोशिश भी समाजवादी पार्टी कर रही है।
हालिया चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो राजनीतिक दलों के लिए दलित वोटों का समीकरण काफी दिलचस्प नजर आता है। लोकसभा चुनावों के आंकड़ों के मुताबिक, जाटव मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा अभी भी बसपा के साथ है, लेकिन गैर-जाटव दलित मतदाताओं का झुकाव तेजी से अन्य दलों की ओर हुआ है। इसी गैप को पाटने के लिए अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पूरी ताकत झोंक रही है ताकि बसपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके।
बीजेपी की काट: सुंदरीकरण और विकास का दांव
समाजवादी पार्टी की इस दलित-केंद्रित रणनीति का जवाब देने के लिए भारतीय जनता पार्टी भी पूरी तरह से तैयार बैठी है। बीजेपी का मानना है कि केवल प्रतीकों की राजनीति से जनता का भला नहीं होने वाला है। इस पर तीखा प्रहार करते हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा है,
"अखिलेश यादव चाहें अपना पूरा शरीर नीला कर लें, तब भी दलित समाज समाजवादी पार्टी को वोट नहीं देगा क्योंकि वे उनके काले कारनामों को अच्छी तरह जानते हैं।" — ब्रजेश पाठक, उपमुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश
बीजेपी लोकसभा चुनावों में हुए कुछ दलित वोटों के नुकसान की भरपाई करने के लिए धरातल पर काम कर रही है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य महान दलित महापुरुषों की मूर्तियों, स्मारकों और पार्कों की सुरक्षा व सुंदरीकरण के लिए 400 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट जारी किया है। इसके तहत प्रदेश की हर विधानसभा में लगभग 10 स्मारकों और मूर्तियों के आसपास बाउंड्री वॉल और ग्रिल लगाने का काम तेजी से किया जा रहा है, ताकि दलित समाज में यह संदेश जाए कि सरकार उनके सम्मान के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
आगामी चुनावों पर पड़ेगा बड़ा असर
यूपी की सियासत में दलित वोटों को लेकर चल रही यह खींचतान आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा और दशा तय करेगी। एक तरफ जहां अखिलेश यादव पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए नया सामाजिक समीकरण साधने में जुटे हैं, तो वहीं बीजेपी विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे के साथ अपने वोट बैंक को सुरक्षित करने में लगी है। आने वाले दिनों में यह मुकाबला और अधिक दिलचस्प होने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि हर दल जानता है कि उत्तर प्रदेश की गद्दी पर वही काबिज होगा जो दलित बस्तियों के दिलों तक अपनी पहुंच बनाने में कामयाब होगा।




