महज पांच किलो मुरब्बे से शुरू हुआ सफर
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की कहानी आज देश भर की महिलाओं के लिए प्रेरणा का एक नया स्रोत बन चुकी है। कभी चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली ग्रामीण महिलाओं ने साबित कर दिया कि अगर मजबूत इरादे और कुछ कर दिखाने का जज्बा हो, तो अभावों को भी अवसरों में बदला जा सकता है। इस प्रेरणादायक कहानी की शुरुआत होती है मात्र पांच किलो आंवले के मुरब्बे से, जिसे दो साधारण सहेलियों ने मिलकर तैयार किया था। आज यही छोटा सा प्रयोग एक बड़े कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है, जिससे कई परिवारों के जीवन में बड़ा बदलाव आया है।
जिले की रानीगंज तहसील के अंतर्गत आने वाले देवगढ़ कमासिन गांव की रहने वाली कमलेश कुमारी और उनकी सहेली सुषमा ने इस पूरे सफर की नींव रखी थी। शुरुआती दौर में इन दोनों के पास न तो बड़ा पूंजी निवेश था और न ही कोई हाई-फाई बिजनेस प्लान। बस मन में कुछ अलग करने कीलक और अपने पैरों पर खड़े होने की जिद थी। उन्होंने आंवले की बंपर पैदावार वाले अपने इलाके की खूबी को पहचाना और उसी से अपनी आजीविका का रास्ता तलाशने की ठान ली।
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बाएफ संस्था से मिला अनुभव और आगे बढ़ने का हौसला
कमलेश कुमारी और सुषमा सीधे तौर पर अचानक इस मुकाम पर नहीं पहुंचीं। इससे पहले वे ग्रामीण स्तर पर काम करने वाली एक जानी-मानी संस्था बाएफ (BAIF) के साथ जुड़ी हुई थीं। यह संस्था मुख्य रूप से पशुधन संवर्धन और किसानों के कल्याण के लिए काम करती थी। इस संगठन के साथ काम करने के दौरान इन दोनों सहेलियों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिलाओं की समस्याओं और बाजार की नब्ज को बहुत करीब से समझने का मौका मिला।
संस्था में काम करते-करते दोनों के मन में यह विचार आया कि क्यों न वे किसी दूसरे के लिए काम करने के बजाय खुद का कोई ऐसा काम शुरू करें, जिससे न केवल उनकी अपनी आर्थिक स्थिति सुधरे, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ा जा सके। जब उन्होंने इस विचार को गांव के अन्य लोगों के सामने रखा, तो शुरुआती दौर में उन्हें निराशा ही हाथ लगी। किसी ने भी उनका साथ देने की हिम्मत नहीं जुटाई। लेकिन इन दोनों ने हार नहीं मानी और आगे का रास्ता खुद तय करने का फैसला किया।
सावित्री बाई फुले स्वयं सहायता समूह का हुआ गठन
गांव के स्तर पर समर्थन न मिलने के बावजूद कमलेश और सुषमा ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। वे गौरा ब्लॉक कार्यालय गईं और वहां सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल की। इसके बाद उन्होंने विधिवत रूप से 'सावित्री बाई फुले स्वयं सहायता समूह' की शुरुआत की। इस समूह में कमलेश को कमान सौंपी गई, जबकि उनकी करीबी सहेली सुषमा को सचिव की जिम्मेदारी दी गई। यह जुलाई 2020 का वह दौर था, जब कोरोना महामारी के साये में पूरी दुनिया परेशान थी और लोग आजीविका के संकट से जूझ रहे थे।
समूह के गठन के बाद महिलाओं को एकजुट करने का काम शुरू हुआ। साल 2021 में इस समूह को सरकारी प्रक्रिया के तहत एक लाख दस हजार रुपये का ऋण मिला। इस राशि को समूह की दस महिलाओं के बीच बराबर हिस्सों में बांटा गया ताकि हर कोई अपनी रुचि के अनुसार काम शुरू कर सके। किसी महिला ने इस पैसे से बकरी पालन का काम शुरू किया, तो किसी ने अपने घर के बाहर ही सिलाई और बुनाई की छोटी सी दुकान खोल ली।
मशीनों के आने से आंवला उत्पादों को मिली रफ्तार
समूह से जुड़ी अन्य महिलाएं जहां सिलाई और पशुपालन में जुट गईं, वहीं कमलेश और सुषमा ने आंवले के अनूठे और पौष्टिक उत्पाद तैयार करने पर पूरा ध्यान केंद्रित किया। शुरुआत में वे हाथों से ही सारा काम करती थीं, लेकिन जैसे-जैसे काम बढ़ने लगा, उन्होंने अपनी बचत और समूह के पैसों से तकनीकी मदद लेनी शुरू की। उन्होंने कानपुर से आंवले की बर्फी बनाने वाली मशीन करीब 80 हजार रुपये में खरीदी और इसके साथ ही 27 हजार रुपये खर्च कर जूस निकालने वाली मशीन भी स्थापित कर ली।
इन आधुनिक मशीनों के आने से उनके काम की रफ्तार कई गुना बढ़ गई। अब वे केवल पारंपरिक मुरब्बा तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आंवले का स्वादिष्ट अचार, शुद्ध जूस, पौष्टिक बर्फी और लड्डू जैसे कई उत्पाद तैयार करने लगीं। उनकी इस सफलता को देखकर गांव की दूसरी महिलाएं भी प्रेरित हुईं और धीरे-धीरे इस मुहिम से जुड़ती चली गईं। आज यह समूह आंवले के उत्पादों के अलावा जरूरत के मुताबिक मास्क, मोमबत्ती और त्योहारों पर राखियां बनाने का काम भी पूरी खूबी के साथ कर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना ने भरी उड़ान
इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा और गौरवशाली क्षण तब आया, जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में इस स्वयं सहायता समूह की मेहनत का विशेष रूप से उल्लेख किया। प्रधानमंत्री द्वारा प्रतापगढ़ की इन महिलाओं के आत्मनिर्भरता के प्रयासों को राष्ट्रीय फलक पर सराहे जाने से समूह की हर महिला का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। रातोंरात इन महिलाओं की चर्चा पूरे देश में होने लगी और उनके छोटे से गांव का नाम राष्ट्रीय पटल पर चमक उठा।
"चूल्हा-चौका का काम करती थीं, बहुत बड़े सपने नहीं थे। जब से इस समूह से जुड़ी हूं, दुनिया को देखने का नजरिया बदल गया है। आंवला उत्पाद बेचकर अब घर की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।" — कविता देवी, समूह सदस्य
बदल चुकी है 11 परिवारों की आर्थिक तसवीर
आज सावित्री बाई फुले स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है। जो महिलाएं कभी आर्थिक रूप से पूरी तरह अपने पतियों या परिवारों पर निर्भर थीं, वे आज खुद अपने परिवार का आर्थिक संबल बन चुकी हैं। समूह की प्रमुख कमलेश कुमारी इस पूरे कारोबार को सफलता के साथ संभालते हुए हर महीने 20 हजार रुपये से अधिक की कमाई कर रही हैं। उनके साथ काम करने वाली आशा विश्वकर्मा और कविता देवी जैसी महिलाएं भी अब गर्व से कहती हैं कि वे अपने बच्चों की पढ़ाई और घर की जरूरतों को खुद पूरा कर पा रही हैं। प्रशासन की ओर से भी इन महिलाओं को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे इनका हौसला सातवें आसमान पर है।






