कोरबा में महिला सशक्तिकरण की नई इबारत: खेती के साथ लघु उद्योगों से बदल रही तकदीर
देश के ग्रामीण इलाकों में अब महिलाओं की तस्वीर तेजी से बदल रही है। छत्तीसगढ़ के ऊर्जाधानी कहे जाने वाले कोरबा जिले में ग्रामीण महिलाओं ने स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी लिखी है, जो पूरे देश के लिए एक नजीर बन चुकी है। यहां जिला प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे 'सेवा संकल्प अभियान' के माध्यम से महिलाओं को लगातार आगे बढ़ने का मौका मिल रहा है। पारंपरिक कृषि कार्यों के भरोसे रहने वाली ये महिलाएं अब आधुनिक व्यावसायिक गतिविधियों और लघु उद्योगों से जुड़कर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती दे रही हैं।
सामान्य तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में खेती-किसानी ही आजीविका का मुख्य साधन मानी जाती है। लेकिन खेती पूरी तरह से मौसम, मानसून और फसल चक्र पर निर्भर होती है। ऐसे में सालभर नियमित आमदनी हासिल करने के लिए कोरबा की महिलाओं ने अनूठा रास्ता निकाला है। उन्होंने कृषि के साथ-साथ स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए विभिन्न प्रकार के घरेलू और सजावटी सामान बनाने शुरू कर दिए हैं, जिनकी बाजार में भारी मांग बनी हुई है।
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बांस शिल्प से लेकर कोसा धागा तक: हुनर के दम पर बाजार में छा गईं ग्रामीण महिलाएं
प्रदर्शनियों और मेलों में इन महिलाओं द्वारा तैयार किए गए उत्पादों की विविधता देखकर हर कोई हैरान रह जाता है। स्थानीय स्तर पर मिलने वाले कच्चे माल और पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों से ये महिलाएं बेहतरीन वस्तुएं तैयार कर रही हैं। बांस शिल्प कला के जरिए सुंदर टोकरियां, सजावटी सामान और घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाई जा रही हैं। इसके अलावा स्थानीय घास-फूस और वनोपज के जरिए उच्च गुणवत्ता वाली झाड़ू तैयार कर शहरी बाजारों तक आपूर्ति की जा रही है।
इतना ही नहीं, कोरबा क्षेत्र की महिलाएं कोसा धागा उत्पादन, मिट्टी के पारंपरिक कलात्मक उत्पाद और शुद्ध घरेलू अचार-पापड़ बनाने के कार्य में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से इन उत्पादों को बड़े पैमाने पर तैयार किया जा रहा है। इन समूहों ने न केवल महिलाओं को संगठित किया है, बल्कि उन्हें अपने हुनर को एक व्यावसायिक रूप देने का बड़ा अवसर भी प्रदान किया है। बाजार में इन उत्पादों को मिल रहे अच्छे रिस्पॉन्स ने महिलाओं के हौसलों को और अधिक बुलंद कर दिया है।
'सेवा संकल्प अभियान' और मेलों ने खत्म की बिचौलियों की भूमिका
ग्रामीण कारीगरों और छोटे उत्पादकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके उत्पादों के लिए सही बाजार और उचित दाम पाना होती है। पूर्व में बिचौलिया संस्कृति के कारण मेहनतकश महिलाओं को उनके काम का उचित मुनाफा नहीं मिल पाता था। लेकिन 'सेवा संकल्प अभियान' और विभिन्न प्रशासनिक प्रदर्शनियों के माध्यम से अब एक ऐसा खुला मंच मिल गया है, जहां ये महिलाएं सीधे ग्राहकों और खरीदारों से रूबरू हो पाती हैं।
"कृषि के भरोसे जीवन चलाना कठिन होता था क्योंकि फसल साल में एक या दो बार ही आती है। अब हम बांस शिल्प और अन्य घरेलू सामान बनाकर साल के बारह महीने कमाई कर रहे हैं। इस अभियान ने हमारे जीवन में बड़ा बदलाव ला दिया है।"— सावित्री बाई, स्व-सहायता समूह सदस्य, कोरबा
सीधे बिक्री होने के कारण बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इसका सीधा फायदा यह हो रहा है कि प्रत्येक उत्पाद की पूरी कीमत सीधे महिलाओं के खातों और हाथों में पहुंच रही है। इस पारदर्शी व्यवस्था ने महिलाओं की वित्तीय स्थिति में सुधार लाने के साथ-साथ उनमें व्यापारिक समझ को भी विकसित किया है। महिलाएं अब अपने दम पर वित्तीय फैसले लेने में पूरी तरह सक्षम हो रही हैं।
'लखपति दीदी' बनने का सपना हो रहा साकार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही नई ऊर्जा
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं संचालित की जा रही हैं। कोरबा की इन महिलाओं की सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि सही दिशा में थोड़ा सा मार्गदर्शन और प्रशासनिक सहयोग मिल जाए, तो ग्रामीण स्तर पर चमत्कारिक बदलाव लाए जा सकते हैं। हस्तशिल्प, लघु उद्योग और कुटीर उद्योगों से जुड़कर ये महिलाएं 'लखपति दीदी' बनने के अपने सपने को तेजी से सच साबित कर रही हैं।
इस आर्थिक बदलाव का असर केवल व्यक्तिगत परिवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरे समाज की रूपरेखा बदल रही है। महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता ने समाज में उनके रुतबे और सम्मान को कई गुना बढ़ा दिया है। आज वे अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य का खर्च खुद उठाने में सक्षम हैं। कोरबा की इन महिलाओं का यह संघर्ष और सफलता का सफर देश की अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा का एक ऐसा स्रोत बन चुका है, जो उन्हें भी अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत देता है।





