नीतिगत बदलाव और कड़े नियमों से उद्योग जगत में बढ़ती नाराजगी
देश के प्रमुख टेक्सटाइल हब के रूप में पहचान बनाने वाले एक बड़े औद्योगिक शहर में इन दिनों सियासी और कारोबारी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। दशकों की मेहनत से खड़े हुए इस औद्योगिक साम्राज्य के सामने अब एक नया संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। कारोबारियों का कहना है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से जुड़े कड़े पर्यावरणीय नियम और अचानक होने वाले नीतिगत बदलाव उनके व्यापार की रफ्तार को धीमा कर रहे हैं। लंबे समय से स्थानीय स्तर पर मिल रही प्रशासनिक अड़चनों और नियमों की पेचीदगियों के कारण अब निवेशकों का धैर्य जवाब देने लगा है।
विशेष रूप से मतलौडा इलाके में फ्री जोन के प्रावधानों को अचानक समाप्त किए जाने के बाद स्थिति और गंभीर हो गई है। कई ऐसे उद्यमी जिन्होंने भारी भरकम निवेश कर जमीनें खरीदी थीं और शुरुआती निर्माण कार्य शुरू कर दिया था, उन्हें बीच में ही काम रोकना पड़ा। कारोबारियों का तर्क है कि यदि सरकार को ऐसे नीतिगत फैसले लेने ही थे, तो उनके लिए पर्याप्त समय या वैकल्पिक व्यवस्था दी जानी चाहिए थी। इस प्रकार के अप्रत्याशित निर्णयों ने निवेशकों के भरोसे को ठेस पहुंचाई है, जिससे वे अपने भविष्य के विस्तार के लिए अन्य विकल्पों की तलाश करने को मजबूर हो रहे हैं।
दूसरी ओर, पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश ने इस स्थिति का फायदा उठाने की पूरी तैयारी कर ली है। हाल ही में नोएडा में आयोजित एक बड़े टेक्सटाइल फेयर के दौरान यूपी सरकार के नुमाइंदों ने सक्रियता दिखाते हुए पानीपत के निवेशकों को अपने यहां नए कारखाने लगाने के लिए आमंत्रित किया। वहां दी जा रही सिंगल विंडो क्लियरेंस, आकर्षक पूंजीगत सब्सिडी और बिजली दरों में छूट जैसी सुविधाओं ने स्थानीय निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
संबंधित खबरें
सब्सिडी और वित्तीय दावों के भुगतान में लंबी देरी बनी मुख्य समस्या
व्यापारियों और उद्योग संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख चेहरों का साफ कहना है कि कागजों पर सरकारी योजनाएं बहुत लुभावनी होती हैं, लेकिन मैदानी स्तर पर उनका क्रियान्वयन बेहद सुस्त है। हरियाणा सरकार की ओर से निर्यातकों को बढ़ावा देने के लिए फ्रेट सब्सिडी और मेलों में हिस्सा लेने पर मिलने वाले मार्केट डेवलपमेंट असिस्टेंस यानी एमडीए का भुगतान पिछले तीन से चार सालों से लंबित पड़ा हुआ है। बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने के बावजूद जब इन फाइलों का निपटारा नहीं होता, तो कारोबारियों की परेशानी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
हैंडलूम और टेक्सटाइल क्षेत्र से जुड़े दिग्गजों का मानना है कि किसी भी उद्योग को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक सुगम और पारदर्शी वित्तीय तंत्र की आवश्यकता होती है। जब पूंजी लंबे समय तक सरकारी विभागों में अटकी रहती है, तो नई मशीनरी खरीदने या उत्पादन बढ़ाने के लिए बैंक ऋणों पर निर्भरता बढ़ जाती है, जिससे लागत और अधिक हो जाती है। इसके विपरीत, अन्य पड़ोसी राज्य अब ऐसी नीतियां लेकर आ रहे हैं जहां कागजी कार्रवाई न्यूनतम हो और वित्तीय प्रोत्साहन समय पर मिल जाए।
"हमारी इंडस्ट्री को आज इस मुकाम तक पहुंचने में पचास साल का लंबा वक्त लगा है। यदि नीतियां और रियायतें समय पर नहीं मिलेंगी और उद्योग दूसरे राज्यों की तरफ पलायन करने लगे, तो इससे पूरे प्रदेश के औद्योगिक ढांचे को गहरा नुकसान पहुंचेगा। सरकार को समय रहते उद्योगपतियों की इन व्यावहारिक समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए।" — विनोद धमीजा, अध्यक्ष, हरियाणा चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री
उत्तर प्रदेश के आकर्षक प्रस्तावों और पैकेजों से क्यों आकर्षित हो रहे हैं निवेशक
पड़ोसी राज्य की नई कपड़ा और गारमेंटिंग नीति में निवेशकों को रिझाने के लिए कई बड़े प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत प्लांट और मशीनरी में किए जाने वाले निवेश पर पच्चीस प्रतिशत तक की भारी पूंजीगत सब्सिडी दी जा रही है। इसके अलावा, सरकारी एजेंसियों से खरीदी जाने वाली जमीनों पर भी क्षेत्र के अनुसार विशेष छूट का प्रावधान रखा गया है। नई इकाइयों को शुरुआती दस वर्षों तक बिजली ड्यूटी में पूरी तरह से राहत देने जैसी घोषणाओं ने निवेशकों के लिए एक मजबूत और सुरक्षित माहौल तैयार किया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि पीएम मित्रा पार्क जैसी योजनाओं के तहत मिलने वाली सस्ती बिजली और निजी पार्कों के विकास के लिए पचास प्रतिशत तक की आर्थिक सहायता ने यूपी को निवेशकों के लिए एक मुफीद विकल्प बना दिया है। यही वजह है कि मतलौडा क्षेत्र में अपनी यूनिट लगाने की तैयारी कर रहे दर्जनों माइक्रो और मिंक ब्लैंकेट निर्माता अब एनसीआर की सीमाओं से बाहर जाकर अपनी नई संभावनाएं तलाश रहे हैं। यमुना पार के इन इलाकों में उन्हें सस्ती जमीन और आसान नियमों का जो भरोसा मिल रहा है, वह हरियाणा के मौजूदा औद्योगिक माहौल पर भारी पड़ता नजर आ रहा है।
सामूहिक क्लस्टर निर्माण और भविष्य की बड़ी चुनौतियां
आगामी रणनीतियों के तहत अब स्थानीय कारोबारी नोएडा और अन्य मंचों पर पड़ोसी राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ सीधी बैठकें करने की योजना बना रहे हैं। इन मुलाकातों में जमीन के बड़े भूखंडों का अधिग्रहण कर एक आधुनिक टेक्सटाइल क्लस्टर विकसित करने पर चर्चा हो रही है। इस प्रस्तावित क्लस्टर में साझा प्रदूषण नियंत्रण यानी सीईटीपी और कॉमन बॉयलर जैसी आधुनिक सुविधाएं स्थापित करने का प्रस्ताव है, जिससे छोटे और मध्यम दर्जे के निर्माताओं को उत्पादन लागत में बड़ी राहत मिल सकेगी।
कारोबारियों का एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि यदि हरियाणा प्रशासन ने अपनी नीतियों में लचीलापन नहीं दिखाया और लंबित वित्तीय दावों का तुरंत भुगतान नहीं किया, तो आने वाले समय में औद्योगिक पलायन को रोक पाना नामुमकिन हो जाएगा। दशकों पुरानी टेक्सटाइल पहचान को बचाने के लिए अब राज्य सरकार के नीति निर्धारकों को बेहद सूझबूझ और तत्परता के साथ ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि निवेशकों का भरोसा दोबारा जीता जा सके।








