नई दिल्ली/वाशिंगटन: वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल गूंज रहा है—क्या अमेरिका और चीन की बढ़ती नजदीकियां या व्यावहारिक समझौते भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए एक बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं? हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम, जिनमें जी-2 की चर्चाओं से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड (QUAD) की प्रासंगिकता तक शामिल हैं, इस बात की गवाही देते हैं कि दुनिया एक बार फिर बड़े गठबंधनों के दौर से गुजर रही है। 'द फ्रीलान्स' के लिए मेरी ऑन-द-ग्राउंड पड़ताल और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिकारों से बातचीत बताती है कि भारत के नीति-निर्माताओं के लिए आने वाले दिन आसान नहीं होने वाले हैं।
जी-2 की सुगबुगाहट और भारत की चिंताएं
शीत युद्ध के बाद के दौर में अमेरिका और चीन के बीच कभी अत्यधिक प्रतिस्पर्धा तो कभी गहरे आर्थिक संबंध (जिन्हें 'चाइमेरिका' भी कहा गया) देखे गए हैं। लेकिन हाल के वर्षों में दोनों महाशक्तियों के बीच जिस तरह के कूटनीतिक संवाद और व्यापारिक सौदेबाजी देखने को मिल रही है, उसने नई दिल्ली में रणनीतिक हलकों को सतर्क कर दिया है। यदि वाशिंगटन और बीजिंग वैश्विक मुद्दों पर द्विपक्षीय रूप से फैसले लेने यानी 'जी-2' जैसी अनौपचारिक व्यवस्था की ओर बढ़ते हैं, तो भारत जैसे क्षेत्रीय और उभरती हुई वैश्विक ताकतों की सौदेबाजी की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
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क्वाड (QUAD) के समक्ष विश्वसनीयता की परीक्षा
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह यानी 'क्वाड' हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के आक्रामक रुख को संतुलित करने के लिए बनाया गया था। लेकिन, यदि अमेरिका के रुख में चीन को लेकर कोई बड़ा व्यावहारिक बदलाव आता है, तो क्वाड के भविष्य पर सवालिया निशान लग सकते हैं। क्या वाशिंगटन बीजिंग के साथ अपने व्यापक आर्थिक हितों के आगे भारत की सुरक्षा चिंताओं को दरकिनार कर सकता है? यह वह सवाल है जिसका जवाब साउथ ब्लॉक के रणनीतिकार तलाशने में जुटे हैं।
पुतिन-जिनपिंग महामिलन और बदलता वैश्विक समीकरण
स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब हम यूरेशियाई मंचों पर नजर डालते हैं। ट्रंप प्रशासन के जाने के बाद और अमेरिकी नीतियों के बदलते परिदृश्य में, बीजिंग में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का महामिलन इस बात का स्पष्ट संदेश था कि अमेरिका के खिलाफ ध्रुवीकरण कितना गहरा हो चुका है। रूस और चीन की यह गहरी दोस्ती भारत के लिए एक कूटनीतिक दुविधा पैदा करती है, क्योंकि रूस भारत का पारंपरिक और दशकों पुराना रक्षा साझीदार रहा है, जबकि चीन के साथ भारत की सीमा पर तनाव जगजाहिर है।
एक्सपर्ट्स की राय: भारत को चाहिए 'मल्टी-अलाइनमेंट' की धार
अंतरराष्ट्रीय मामलों के वरिष्ठ विश्लेषकों का मानना है कि भारत को अब पारंपरिक गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़कर 'मल्टी-अलाइनमेंट' यानी बहु-सहयोग की नीति को और अधिक आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाना होगा। ग्लोबल साउथ (Global South) की आवाज बनकर भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर अडिग रहना होगा, भले ही अमेरिका और चीन अपने समीकरण कितनी भी तेजी से क्यों न बदलें।
"वैश्विक राजनीति में कोई भी देश किसी का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता, केवल हित स्थायी होते हैं। अमेरिका-चीन के बीच सामरिक सौदेबाजी के इस दौर में भारत को अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता और सैन्य सुदृढ़ीकरण पर सबसे अधिक जोर देना होगा।" — वरिष्ठ रणनीतिक विश्लेषक
अंततः, यह साफ है कि आने वाला समय भारत के कूटनीतिक कौशल की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक होने वाला है। एक तरफ जहाँ पश्चिमी देशों के साथ तकनीकी और रक्षा साझीदारी जरूरी है, वहीं रूस और यूरेशियाई ताकतों के साथ संतुलन बनाए रखना भी नई दिल्ली की कूटनीति की पहली प्राथमिकता होना चाहिए।








