उत्तराखंड में सितंबर के अंत में कुदरत का कहर
देश के कई हिस्सों से मानसून की विदाई का समय नजदीक आ चुका है, लेकिन पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में बादलों का मिजाज अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। सामान्य तौर पर पंद्रह सितंबर के बाद मानसून की सक्रियता कम मानी जाती है, परंतु इस बार सितंबर का आखिरी हफ्ता भी झमाझम बारिश और प्राकृतिक आपदाओं के साए में गुजर रहा है। मौसम विभाग की चेतावनियों के बाद पूरे प्रशासनिक तंत्र को पूरी तरह मुस्तैद कर दिया गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
पर्वतीय अंचलों में हो रही इस बेमौसम बरसात ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। न केवल ग्रामीण इलाकों बल्कि प्रमुख पर्यटन स्थलों और तीर्थ मार्गों पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। लगातार गिर रहे पानी और पहाड़ों से आ रहे मलबे ने रास्तों को अवरुद्ध करना शुरू कर दिया है, जिससे आवागमन जोखिम भरा हो गया है।
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कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक रेड अलर्ट का साया
मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार राज्य के विभिन्न हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश होने की आशंका जताई गई है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आपदा प्रबंधन विभाग ने कई जिलों में रेड अलर्ट घोषित किया है। शुरुआती दौर में कुमाऊं मंडल के कई जिलों में इसका सबसे ज्यादा असर देखा गया, जहां प्रशासन ने लोगों से घरों से बाहर न निकलने की अपील की है।
इसके बाद गढ़वाल मंडल के पर्वतीय जिलों में भी मौसम का मिजाज बिगड़ता नजर आया। नदियों और नालों का जलस्तर अचानक बढ़ने की वजह से निचले इलाकों में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश दिए गए हैं। आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी लगातार स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं और हर घंटे की रिपोर्ट ली जा रही है।
चारधाम यात्रा पर लगा अस्थायी ब्रेक
खराब मौसम और लगातार हो रही बारिश का सबसे बड़ा असर पवित्र चारधाम यात्रा पर पड़ा है। यमुनोत्री, गंगोत्री, बदरीनाथ और केदारनाथ धाम की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को मौसम साफ होने तक सुरक्षित स्थानों पर ही रुकने की सलाह दी गई है। यात्रा मार्गों पर कई जगहों पर पहाड़ी से पत्थर गिरने और भूस्खलन होने की घटनाएं सामने आई हैं, जिसके चलते जोखिम मोल लेना खतरनाक साबित हो सकता है।
प्रशासन ने साफ शब्दों में कहा है कि तीर्थयात्रियों की जान की सुरक्षा सबसे पहले है। इसीलिए एहतियात के तौर पर यात्रा को कुछ दिनों के लिए रोक दिया गया है ताकि मौसम सामान्य होने के बाद इसे दोबारा सुचारू रूप से शुरू किया जा सके। जो यात्री रास्ते में फंसे हुए हैं, उन्हें स्थानीय प्रशासन की ओर से भोजन और ठहरने की उचित सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं।
बंगाल की खाड़ी में बन रहा नया दबाव
आखिरकार सितंबर के अंत में इतनी तेज बारिश क्यों हो रही है, इस सवाल के जवाब में मौसम वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन से जुड़े जानकारों का मानना है कि इसके पीछे समुद्री हलचल बड़ी वजह है। बंगाल की खाड़ी में लगातार बन रहे कम दबाव के क्षेत्रों के कारण नमी से भरी हवाएं पहाड़ों की तरफ रुख कर रही हैं, जिससे बादलों का डेरा उत्तराखंड में बना हुआ है।
"प्रशासनिक रूप से मानसून की अवधि भले ही तय हो, लेकिन जलवायु परिवर्तन और बंगाल की खाड़ी के मौसमी दबाव के कारण अब सितंबर के बाद भी बारिश और आपदाओं का खतरा बना रहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए हमने इस बार अपनी पूरी मशीनरी को हाई अलर्ट पर रखा है ताकि किसी भी चुनौती से समय रहते निपटा जा सके।" — विनोद कुमार सुमन, आपदा प्रबंधन सचिव
नॉन-मानसून सीजन में भी आपदाओं का खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ बारिश के दौरान ही नहीं, बल्कि मानसून की विदाई के बाद भी पहाड़ों में खतरा टलता नहीं है। कई बार मौसम खुलने के बाद भी पहाड़ियों के अंदरूनी हिस्सों में हलचल बनी रहती है, जिससे अचानक भूस्खलन या सड़क धंसने जैसी घटनाएं सामने आती हैं। यही कारण है कि इस बार सरकार और आपदा प्रबंधन अमला किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।
नदी किनारे रहने वाले लोगों और खनन कार्यों में जुटे श्रमिकों को भी विशेष चेतावनी जारी की गई है। जलस्तर में होने वाले अचानक बदलाव से बड़े हादसे हो सकते हैं, इसलिए स्थानीय प्रशासन लगातार मुनादी करवा रहा है ताकि किसी भी अनहोनी को टाला जा सके। आने वाले कुछ दिन राज्य के लिए मौसम के लिहाज से काफी संवेदनशील बने रहने की पूरी संभावना है।





