डेंगू और वायरल संक्रमण के दौर में क्यों गिरने लगते हैं प्लेटलेट्स?
बरसात के मौसम की शुरुआत के साथ ही देश के तमाम हिस्सों में डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी वेक्टर जनित बीमारियों का खतरा अचानक से काफी बढ़ जाता है। इन बीमारियों की चपेट में आने वाले मरीजों में सबसे आम और डरावनी समस्या प्लेटलेट्स काउंट में भारी गिरावट का आना है। आमतौर पर स्वस्थ इंसान के शरीर में प्लेटलेट्स की सामान्य संख्या डेढ़ लाख से साढ़े चार लाख के बीच होती है। हालांकि, जब यह आंकड़ा तेजी से नीचे लुढ़ककर 50,000 के आसपास या उससे भी कम पहुंच जाता है, तो मरीज और उनके परिवार वाले गहरी चिंता में डूब जाते हैं।
चिकित्सकीय भाषा में प्लेटलेट्स की इस कमी को थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया कहा जाता है। नोएडा स्थित मेदांता अस्पताल के मेडिकल ओंकोलॉजी विभाग के सीनियर कंसलटेंट डॉ. अंकुर नंदन वार्ष्णेय के अनुसार, प्लेटलेट्स हमारे शरीर के भीतर खून का थक्का जमाने और चोट लगने की स्थिति में ब्लीडिंग रोकने का सबसे अहम काम करते हैं। जब इनकी संख्या घटने लगती है, तो शरीर के भीतर अंदरूनी या बाहरी रक्तस्राव का जोखिम बढ़ जाता है। हालांकि, हर एक मरीज के लिए यह खतरा एक जैसा नहीं होता और डॉक्टरों की टीम कई अन्य पैमानों पर भी मरीज की शारीरिक स्थिति का आकलन करती है।
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सिर्फ प्लेटलेट्स के आंकड़े पर न जाएं, डॉक्टर इन बातों का भी रखते हैं खास ख्याल
अक्सर यह देखा गया है कि जैसे ही पैथोलॉजी रिपोर्ट में प्लेटलेट्स का काउंट 50,000 से नीचे आता है, लोग बिना किसी डॉक्टर की सलाह के खुद ही इलाज ढूंढने लगते हैं या मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ एक सिंगल लैब रिपोर्ट के आधार पर घबरा जाना पूरी तरह गलत है। डॉक्टर इस बात की गहराई से जांच करते हैं कि प्लेटलेट्स कितनी तेजी से नीचे गिरे हैं, मरीज के शरीर में कौन-कौन से लक्षण दिखाई दे रहे हैं और इस गिरावट के पीछे असली मेडिकल कारण क्या है।
कई मामलों में देखा गया है कि प्लेटलेट्स का गिरना अपने आप में कोई स्वतंत्र बीमारी नहीं होती, बल्कि यह शरीर के भीतर चल रही किसी अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्या का महज एक लक्षण भर होता है। इसलिए, इलाज की दिशा तय करने से पहले यह पता लगाना बेहद जरूरी हो जाता है कि शरीर में संक्रमण किस स्तर का है और प्रतिरक्षा तंत्र किस प्रकार प्रतिक्रिया दे रहा है। बिना कारण को समझे केवल प्लेटलेट्स बढ़ाने के नुस्खे आजमाने से मरीज की मुश्किलें और अधिक बढ़ सकती हैं।
प्लेटलेट्स कम होने के पीछे छिपे हो सकते हैं ये अन्य गंभीर कारण
हालांकि डेंगू और चिकनगुनिया को प्लेटलेट्स घटने का सबसे बड़ा और प्रचलित कारण माना जाता है, लेकिन इसके पीछे कई और चिकित्सा स्थितियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं। कई बार शरीर का अपना इम्यून सिस्टम ही गलती से अपने ही स्वस्थ प्लेटलेट्स को दुश्मन मानकर नष्ट करने लगता है। इस मेडिकल स्थिति को इम्यून थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया यानी आईटीपी कहा जाता है। इसके अलावा गंभीर लिवर संबंधी बीमारियां, स्प्लीन का आकार बढ़ना, विटामिन बी-12 या फोलेट की भारी कमी और बोन मैरो से जुड़ी विभिन्न जटिलताएं भी इस संकट को न्योता देती हैं।
"प्लेटलेट्स कम होना खुद में कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर में चल रही किसी अन्य समस्या का लक्षण है। इसलिए प्लेटलेट्स बढ़ाने का उपचार शुरू करने से पहले इसके मूल कारणों का पता लगाना सबसे ज्यादा जरूरी है। मरीजों को केवल काउंट देखकर मानसिक रूप से परेशान नहीं होना चाहिए।" — डॉ. अंकुर नंदन वार्ष्णेय, सीनियर कंसलटेंट, मेदांता अस्पताल
कुछ विशेष परिस्थितियों में कैंसर के मरीजों को दी जाने वाली कीमोथेरेपी भी प्लेटलेट्स काउंट में भारी गिरावट का एक प्रमुख कारण बनती है। कई मामलों में कैंसर कोशिकाओं का बोन मैरो तक फैल जाना भी इस स्थिति को जन्म दे सकता है। यही वजह है कि डॉक्टर मरीज के पिछले मेडिकल इतिहास और अन्य ब्लड रिपोर्ट्स का बारीकी से अध्ययन करने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं।
बारिश के मौसम में मच्छरों से बचाव और पानी जमा न होने देने की अहमियत
चूंकि डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर साफ और खड़े पानी में पनपता है, इसलिए इस मौसम में घरेलू स्तर पर सतर्कता बरतना सबसे बड़ा उपाय है। घर के आसपास रखे छोटे-छोटे गमले, कूलर की टंकियां, पुरानी बाल्टियाँ और छतों पर पड़े कबाड़ या टायरों में थोड़ा सा भी पानी जमा नहीं होने देना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइंस के मुताबिक, यह मच्छर केवल रात के समय ही नहीं, बल्कि दिन के उजाले में भी सक्रिय रहता है और काट सकता है। इसलिए दिन के समय भी पूरी बाजू के कपड़े पहनना और मच्छर रोधी क्रीम का इस्तेमाल करना बुद्धिमानी है।
यदि घर में किसी भी सदस्य को तेज बुखार, सिरदर्द, आंखों के पिछले हिस्से में तेज दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में असहनीय दर्द जैसे शुरुआती लक्षण महसूस हों, तो उन्हें बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बुखार उतर जाने के बाद भी यदि पेट में भयंकर दर्द, बार-बार उल्टी होना, मसूड़ों से खून आना या शरीर में अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे तुरंत हेल्थ इमरजेंसी मानकर नजदीकी अस्पताल का रुख करना चाहिए।
एनीमिया और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों को न करें हल्के में नजरअंदाज
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि मानसून के दिनों में खानपान और पोषण की कमी के कारण महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कानपुर के वरिष्ठ डॉक्टरों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों में खून की कमी यानी एनीमिया जच्चा और बच्चा दोनों की सेहत के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकती है। गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर, प्लेटलेट्स और अन्य जरूरी रूटीन जांचों को कभी भी टालना नहीं चाहिए।
संतुलित और पौष्टिक आहार, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन और समय पर की जाने वाली मेडिकल जांचें ही किसी भी गंभीर बीमारी से हमारा बचाव कर सकती हैं। यदि किसी व्यक्ति में प्लेटलेट्स कम होने के लक्षण दिखते हैं, तो उसे खुद से कोई भी दर्द निवारक या मनचाही दवा खाने से बचना चाहिए। डॉक्टर की देखरेख में रहकर पर्याप्त आराम और सही न्यूट्रिशन लेने से मरीज बहुत कम समय में पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।






