बच्चों का घर आते ही बदल जाना: क्या है इसके पीछे का छिपा हुआ सच?
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता अक्सर इस बात से हैरान परेशान रहते हैं कि उनका बच्चा बाहर दोस्तों की महफिल में, स्कूल के खेल के मैदान में या रिश्तेदारों के बीच पूरी तरह से ऊर्जावान, हंसमुख और खुशमिजाज रहता है। लेकिन जैसे ही वह अपने घर की दहलीज के अंदर कदम रखता है, उसका पूरा मिजाज बदल जाता है। उसका चेहरा उतर जाता है, वह चुपचाप अपने कमरे में चला जाता है या फिर बात-बात पर चिड़चिड़ापन दिखाने लगता है। माता-पिता अक्सर इसे बच्चे की जिद, बदतमीजी या बिगड़ैल स्वभाव मान लेते हैं, लेकिन इसके पीछे मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक कारण कुछ और ही होते हैं।
मशहूर डॉक्टर और पेरेंटिंग एक्सपर्ट सुनील मित्तल का कहना है कि अक्सर पेरेंट्स उनके पास आकर यही शिकायत करते हैं कि घर में उनका बच्चा उनसे काफी कटा-कटा और चिढ़ा-चिढ़ा रहता है। जबकि वही बच्चा बाहर की दुनिया में एकदम सामान्य और खुशहाल नजर आता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बदलाव के पीछे बच्चों की कोई दुर्भावना नहीं होती, बल्कि इसके पीछे घर का माहौल और माता-पिता का बच्चों के साथ व्यवहार करने का तरीका मुख्य रूप से जिम्मेदार होता है।
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लगातार टोकना और जरूरत से ज्यादा उम्मीदें बनाना
बच्चों के इस तरह के व्यवहार के पीछे सबसे बड़ा कारण घर के अंदर मिलने वाली लगातार 'नैगिंग' यानी हर बात पर टोकटाकी है। जब बच्चा घर के अंदर प्रवेश करता है, तो उसे अक्सर इस तरह के सवालों और हिदायतों का सामना करना पड़ता है—'यहां क्यों बैठे हो?', 'वहां क्यों बैठे हो?', 'अभी तक होमवर्क क्यों नहीं किया?', 'ये कर लो, वो कर लो।' इस प्रकार की लगातार रोक-टोक बच्चे के मानसिक सुकून को तोड़ देती है।
इसके अलावा, कई बार माता-पिता अपने बच्चों से अनरियलिस्टिक एक्सपेक्टेशन यानी अवास्तविक उम्मीदें रख लेते हैं। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा हर क्षेत्र में अव्वल रहे, हर नियम का सख्ती से पालन करे और उनकी हर बात पर बिना किसी सवाल के हामी भरे। जब बच्चा इन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाता, तो वह मानसिक तनाव का शिकार होने लगता है। ऐसे में घर का माहौल उसके लिए इमोशनली अनसेफ यानी भावनात्मक रूप से असुरक्षित लगने लगता है और वह चाहकर भी घर के अंदर खुलकर सांस नहीं ले पाता।
इमोशनल एग्जॉर्शन और मानसिक थकान का शिकार
डॉक्टर मित्तल आगे बताते हैं कि कारण चाहे जो भी हो, लेकिन इस तरह की निरंतर डीलिंग से बच्चा गंभीर इमोशनल एग्जॉर्शन यानी भावनात्मक थकान महसूस करने लगता है। बाहर की दुनिया में बच्चों को एक ऐसा स्पेस मिलता है जहां उन्हें जज नहीं किया जाता, जहां वे अपनी मर्जी से हंस-बोल सकते हैं। इसके विपरीत, घर के भीतर उन्हें हर वक्त खुद को साबित करने का दबाव महसूस होता है।
जब बच्चा अपने ही घर में इस प्रकार का मानसिक दबाव झेलता है, तो वह धीरे-धीरे माता-पिता से दूरी बनाने लगता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर कोई बच्चा अपने पेरेंट्स से थोड़ी दूरी बना रहा है या कम बात कर रहा है, तो उसे क्रूर या आज्ञाकारी न मानना ही समझदारी है। असल में, वह बच्चा अपनी इमोशनल वेलबीइंग यानी मानसिक स्वास्थ्य को बचाने के लिए एक हेल्दी बाउंड्री खींच रहा होता है ताकि वह अंदर से पूरी तरह टूट न जाए।
"पेरेंट्स यह समझने की कोशिश करें कि लगातार इस तरह की डीलिंग से बच्चा इमोशनल एग्जॉर्शन महसूस कर सकता है। ऐसे में अगर बच्चा पेरेंट्स से दूरी बना ले, तो वह क्रूर नहीं होता है, बल्कि अपनी इमोशनल वेलबीइंग के लिए एक बाउंड्री बना रहा होता है।" — डॉ. सुनील मित्तल, पेरेंटिंग एक्सपर्ट
परिवार के रिश्तों में पुराना इतिहास और भावनाओं का ओवरफ्लो
मनोविज्ञान के जानकारों का यह भी कहना है कि हम बाहरी दोस्तों, सहपाठियों और अनजान लोगों की छोटी-मोटी गलतियों या बातों को बहुत आसानी से माफ कर देते हैं। उनके साथ हमारा रिश्ता वर्तमान क्षण पर आधारित होता है। लेकिन जब बात माता-पिता और परिवार की आती है, तो समीकरण पूरी तरह बदल जाते हैं। परिवार के साथ सिर्फ आज क्या कहा गया, यही मायने नहीं रखता, बल्कि अतीत में जो कुछ भी कहा गया है या जिस तरह का व्यवहार पहले हुआ है, उसका गहरा असर भी साथ बना रहता है.
यही वजह है कि परिवार के सदस्यों के सामने आते ही कई बार सहनशीलता कम हो जाती है, संयम टूटने लगता है और भावनाओं का सैलाब यानी इमोशंस का ओवरफ्लो होने लगता है। बच्चे के मन में पिछले अनुभवों की कड़वाहट या अनसुलझे तनाव दबे रहते हैं, जो घर पहुंचते ही बाहर आने लगते हैं। माता-पिता को इस बात की गहराई को समझना होगा और अपने बात करने के तरीके में बदलाव लाना होगा ताकि बच्चा घर को जेल नहीं बल्कि सुकून की जगह समझे।
निष्कर्ष: माता-पिता को क्या कदम उठाने चाहिए?
यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा बाहर की तरह घर में भी उतना ही सहज, खुश और खुलकर रहे, तो आपको अपनी पेरेंटिंग स्टाइल में कुछ सकारात्मक बदलाव करने होंगे। बच्चे पर हर समय पाबंदियां लगाने, उसे टोकने और अपनी अधूरी इच्छाएं उस पर थोपने की बजाय उसके दोस्त बनने की कोशिश करें। घर का माहौल ऐसा होना चाहिए जहां बच्चा अपनी बात बिना किसी डर के कह सके। जब बच्चों को यह अहसास होगा कि उनके घर में उनकी भावनाओं की कद्र होती है और उन्हें बिना शर्त प्यार मिलता है, तो उनका चेहरा घर आते ही नहीं उतरेगा, बल्कि वे परिवार के साथ सुकून के पल बिताना पसंद करेंगे।




