रसोई के बजट को झटका दे रही प्याज की महंगाई
भारतीय रसोई में प्याज एक ऐसी चीज है जिसके बिना शायद ही किसी खाने की कल्पना की जा सकती है। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, प्याज का इस्तेमाल हर घर में प्रमुखता से होता है। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से प्याज की कीमतों में जिस तेजी से इजाफा हुआ है, उसने आम आदमी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। चाहे इसे मौसम की मार कहें या फिर बाजार के कारोबारियों का खेल, इन दिनों प्याज के बढ़ते दामों ने घर के पूरे बजट को हिलाकर रख दिया है।
पिछले एक साल की बात करें तो प्याज की खुदरा और थोक कीमतों में इतनी तेजी से उछाल आया है कि हर कोई हैरान है। ऐसा हम अपनी तरफ से नहीं कह रहे हैं, बल्कि सरकार की ओर से जारी किए गए आधिकारिक आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं। आम आदमी को महंगाई की इस चुभन का अहसास तब और ज्यादा होता है जब वह सब्जी की दुकान पर जाकर अपनी जेब टटोलता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर इन आंकड़ों के पीछे की सच्चाई क्या है और क्यों हर साल साल के इन खास महीनों में ही प्याज के दाम आग उगलने लगते हैं।
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उपभोक्ता मंत्रालय के आंकड़े खोल रहे हैं पोल
हाल ही में उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने प्याज की कीमतों को लेकर कुछ चौकाने वाले आंकड़े सार्वजनिक किए हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक, थोक बाजार में प्याज के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। 21 सितंबर को प्याज का थोक भाव 4,615.98 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बिक रहा था, जबकि ठीक एक साल पहले इसी अवधि में इसकी कीमतें करीब 3,299.85 रुपये प्रति क्विंटल थीं। यानी महज एक साल के भीतर प्याज की थोक कीमतों में लगभग 135 प्रतिशत तक की भारी बढ़त देखने को मिली है।
इन सरकारी आंकड़ों से एक बात साफ हो जाती है कि खुदरा बाजारों के मुकाबले थोक बाजारों में महंगाई की मार ज्यादा तेजी से पड़ी है। जब थोक में ही माल इतना महंगा मिलेगा, तो जाहिर है कि आम ग्राहकों को खुदरा दुकानों पर और भी अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सप्लाई चेन में गड़बड़ी और जमाखोरी जैसी समस्याएं भी इस थोक महंगाई को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे आम जनता पिस रही है.
आखिर क्यों सिर्फ सितंबर और अक्टूबर में ही क्यों उछलते हैं दाम?
यह एक ऐसा सवाल है जो हर साल लोगों के मन में उठता है। साल के बाकी 10 महीनों में भले ही प्याज के दाम एक सामान्य दायरे में रहें या फिर शांत बने रहें, लेकिन सितंबर और अक्टूबर का महीना आते ही इसमें अचानक भूचाल आ जाता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो एक महीने पहले प्याज की जो औसत कीमत करीब 40.79 रुपये प्रति किलो थी, वह बढ़कर 21 सितंबर को 54.23 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गई।
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण फसल चक्र और मंडियों में प्याज की आवक का गणित है। मार्च और अप्रैल के महीनों में रबी की फसल बाजार में आती है, जिसका स्टॉक किसी तरह अगली खरीफ की फसल आने तक चलाना होता है। ऐसे में सितंबर और अक्टूबर आते-आते पुराना स्टॉक लगभग समाप्त होने की कगार पर पहुंच जाता है। नए स्टॉक के बाजार में पूरी तरह उतरने से पहले के इस अंतराल (Transition Period) में मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर पैदा हो जाता है, जिससे कीमतें आसमान छूने लगती हैं।
मौसम की मार और सरकारी गोदामों की स्थिति
फसल चक्र के अलावा मौसम की अनिश्चितता ने भी प्याज की कीमतों को अस्थिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछले कुछ महीनों के दौरान देश के प्रमुख प्याज उत्पादक राज्यों, खासकर महाराष्ट्र में बेमौसम बारिश और गर्मी के प्रकोप ने फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है। खेतों में ही फसल सड़ जाने की वजह से उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है।
हालात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकारी एजेंसियों के पास जो बफर स्टॉक रखा होता है, उसमें से भी करीब 30 प्रतिशत प्याज गर्मी और नमी के कारण खराब हो गया। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ने और पड़ोसी देशों में उत्पादन के समीकरण बदलने से भारतीय बाजारों पर दबाव और अधिक बढ़ गया है। इन तमाम वजहों का सामूहिक असर यह हुआ है कि आम आदमी की थाली से प्याज का स्वाद फीका पड़ने लगा है।
बाजार विशेषज्ञों की राय और आगे की स्थिति
अर्थशास्त्रियों और कृषि बाजार के जानकारों का मानना है कि जब तक नई खरीफ की फसल मंडियों में बड़े पैमाने पर नहीं आ जाती, तब तक उपभोक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद बेहद कम है। हालांकि सरकार लगातार कीमतें नियंत्रित करने के लिए अपने स्टॉक से प्याज खुले बाजार में उतार रही है, लेकिन मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने के कारण तुरंत राहत मिलती नहीं दिख रही।
"प्याज की कीमतों में यह उतार-चढ़ाव मुख्य रूप से स्टोरेज क्षमता की कमी और फसल चक्र के अंतर के कारण होता है। जब तक किसानों के पास आधुनिक कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं होगी, तब तक हर साल सितंबर-अक्टूबर में ऐसी ही महंगाई का सामना करना पड़ेगा।" — कृषि बाजार विशेषज्ञ
संक्षेप में कहें तो, जब तक देश में कृषि विपणन और भंडारण की व्यवस्था को पूरी तरह से दुरुस्त नहीं किया जाता, तब तक साल के इन खास महीनों में आम आदमी को महंगाई की इस आंधी का सामना करना ही पड़ेगा। फिलहाल ग्राहकों को यही सलाह दी जाती है कि वे जरूरत के हिसाब से ही खरीदारी करें और बजट को संतुलित रखें।






