अंतरिक्ष की दुनिया का सबसे बड़ा रहस्य: रूस क्यों पड़ोसी देश की जमीन से भेजता है अपने रॉकेट?
अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास पर नजर डालें तो रूस का नाम सबसे पहले चमकता है। दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह 'स्पुतनिक 1' अंतरिक्ष में भेजने से लेकर अंतरिक्ष में पहला मानव भेजने का गौरव भी सोवियत संघ को ही हासिल है। लेकिन क्या आपने कभी यह गौर किया है कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियों में शुमार रूस अपनी ही जमीन से अंतरिक्ष मिशन भेजने के बजाय एक पड़ोसी देश की जमीन का इस्तेमाल क्यों करता है? सुनने में भले ही यह अजीब लगे, लेकिन यह एक कड़वी और दिलचस्प सच्चाई है कि रूस के अंतरिक्ष अभियानों का मुख्य केंद्र उसकी अपनी भौगोलिक सीमाओं के भीतर नहीं बल्कि कजाकिस्तान की विशाल भूमि पर स्थित है।
इस अनूठी व्यवस्था के पीछे दशकों पुराना इतिहास, भौगोलिक मजबूरियां और अंतरिक्ष विज्ञान के कुछ बेहद कड़े नियम छिपे हुए हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी रूस और कजाकिस्तान के बीच अंतरिक्ष सहयोग का यह सिलसिला आज तक अटूट रूप से चल रहा है। आखिर क्या वजह है कि रूस अपने स्पेस प्रोग्राम के लिए बैकोनूर पर इतना अधिक निर्भर है, जबकि रूस के पास खुद का क्षेत्रफल दुनिया में सबसे बड़ा है? इस बात को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा और साथ ही अंतरिक्ष विज्ञान के भूगोल को भी समझना होगा।
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शीत युद्ध के दौर में कैसे पड़ी थी बैकोनूर कॉस्मोड्रोम की नींव?
कजाकिस्तान के साथ रूस के इस अंतरिक्ष रिश्ते की शुरुआत सोवियत संघ के दौर में हुई थी। साल 1955 का वह दौर था जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष की जंग यानी 'स्पेस रेस' अपने चरम पर थी। ऐसे में सोवियत सरकार को एक ऐसे विशाल और सुरक्षित लॉन्च पैड की सख्त जरूरत थी जहां से शक्तिशाली रॉकेटों का परीक्षण किया जा सके। कजाकिस्तान के उस वीरान और खुले इलाके को इसके लिए बिल्कुल मुफीद पाया गया। धीरे-धीरे यह जगह सोवियत अंतरिक्ष कार्यक्रम का दिल बन गई।
इतिहास के पन्नों को खंगालें तो दुनिया के कई ऐतिहासिक और कीर्तिमान रचने वाले अंतरिक्ष मिशन इसी जमीन से आसमान में दागे गए थे। अंतरिक्ष में जाने वाले पहले इंसान यूरी गगारिन ने भी यहीं से उड़ान भरी थी। साल 1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ और दुनिया के नक्शे पर कई नए देश उभरे, तो कजाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र बन गया। सोवियत संघ के टूटने के बाद भौगोलिक रूप से बैकोनूर कॉस्मोड्रोम कजाकिस्तान के हिस्से में आ गया, लेकिन वहां का पूरा लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी ढांचा रूस का था। इसके बाद दोनों देशों ने आपसी समझौते के तहत इस ऐतिहासिक अड्डे का इस्तेमाल जारी रखने का फैसला किया।
रॉकेट लॉन्चिंग के लिए कजाकिस्तान का भूगोल क्यों माना जाता है सबसे मुफीद?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए केवल अच्छी तकनीक ही नहीं, बल्कि एक सही भौगोलिक लोकेशन की भी बहुत जरूरत होती है। पृथ्वी लगातार अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूम रही है। यदि कोई रॉकेट पृथ्वी के घूर्णन की दिशा यानी पूर्व की ओर लॉन्च किया जाता है, तो उसे पृथ्वी की प्राकृतिक गति का एक अतिरिक्त 'बूस्ट' या धक्का मिल जाता है। इस प्राकृतिक गति के मिलने से रॉकेट को अपनी कक्षा यानी ऑर्बिट तक पहुंचने में कम ऊर्जा और कम ईंधन की खपत करनी पड़ती है।
रूस का अधिकांश मुख्य भूभाग उत्तर दिशा में स्थित है, जहां से अंतरिक्ष की कक्षा में रॉकेट भेजना अधिक कठिन और ऊर्जा खपत वाला काम है। इसके मुकाबले, कजाकिस्तान की लोकेशन रूस के मुकाबले काफी दक्षिण में है। हालांकि यह सीधे भूमध्य रेखा पर स्थित नहीं है, फिर भी उत्तरी रूस की तुलना में यह अंतरिक्ष अभियानों के लिए बेहद फायदेमंद स्थिति प्रदान करता है। इसके अलावा, रॉकेट लॉन्च के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले बूस्टर और रॉकेट के अलग हुए हिस्से वापस जमीन पर गिरते हैं, जिसके लिए बहुत बड़े और निर्जन इलाकों की आवश्यकता होती है। कजाकिस्तान के विशाल और वीरान मैदान इसके लिए बिल्कुल सही साबित होते हैं।
अरबों डॉलर की लीज और रूस-कजाकिस्तान का रणनीतिक समझौता
चूंकि बैकोनूर कॉस्मोड्रोम अब एक स्वतंत्र देश कजाकिस्तान की संप्रभुता के अंतर्गत आता है, इसलिए रूस इस पर अपनी मर्जी से मालिकाना हक नहीं जता सकता। इसके एवज में दोनों देशों के बीच एक लंबा और मजबूत कूटनीतिक समझौता हुआ है। एक लीज एग्रीमेंट के तहत रूस इस स्पेसपोर्ट का इस्तेमाल करने के बदले कजाकिस्तान सरकार को सालाना लगभग 115 मिलियन डॉलर यानी करोड़ों रुपये की भारी-भरकम लीज फीस देता है। दोनों देशों के बीच हुआ यह समझौता फिलहाल साल 2050 तक के लिए वैध है।
इस लीज समझौते के जरिए दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष कूटनीति के एक नए युग की शुरुआत हुई थी। रूस अपने तमाम कमर्शियल और मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों (जैसे सोयुज अंतरिक्ष यान लॉन्च) के लिए आज भी बड़े पैमाने पर इसी स्पेसपोर्ट पर निर्भर है। कजाकिस्तान के लिए भी यह आर्थिक रूप से बेहद फायदेमंद सौदा है, क्योंकि इससे देश को नियमित तौर पर भारी राजस्व प्राप्त होता है और वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर उसकी एक खास पहचान बनी रहती है।
अपनी ही जमीन पर स्पेसपोर्ट बना रहा है रूस: क्या कम हो रही है बैकोनूर पर निर्भरता?
भले ही बैकोनूर कॉस्मोड्रोम रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रमों का सबसे पुराना और भरोसेमंद साथी रहा हो, लेकिन किसी दूसरे देश की जमीन पर पूरी तरह निर्भर रहना मॉस्को के रणनीतिक हितों के लिहाज से हमेशा जोखिम भरा माना जाता रहा है। भविष्य में किसी भी प्रकार के भू-राजनीतिक तनाव या कूटनीतिक मतभेद से बचने के लिए रूस लंबे समय से अपनी खुद की जमीन पर एक अत्याधुनिक लॉन्च साइट विकसित करने की जुगत में था। इसी रणनीति के तहत रूस ने अपने सुदूर पूर्व (Far East) इलाके में 'वोस्तोचन्य कॉस्मोड्रोम' का निर्माण किया है।
"अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना किसी भी महाशक्ति के लिए सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता होती है, और वोस्तोचन्य का निर्माण इसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।" — अंतरिक्ष मामलों के विश्लेषक
वोस्तोचन्य कॉस्मोड्रोम के पूरी तरह चालू हो जाने के बाद रूस धीरे-धीरे कजाकिस्तान स्थित बैकोनूर पर अपनी निर्भरता को कम कर रहा है। हालांकि, तकनीकी जटिलताओं और बैकोनूर के ऐतिहासिक बुनियादी ढांचे की विशालता के कारण इस प्रक्रिया में अभी समय लग रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में बैकोनूर का रुतबा आज भी कम नहीं हुआ है, लेकिन बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच रूस अपनी अंतरिक्ष संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर देखा जाए तो रूस का कजाकिस्तान से रॉकेट लॉन्च करना महज एक संयोग नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में दर्ज समझौतों और भूगोल के अनूठे मेल का परिणाम है। सोवियत संघ के सुनहरे दौर की यादें समेटे बैकोनूर कॉस्मोड्रोम ने मानव जाति को अंतरिक्ष की सैर कराने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। भले ही रूस अब अपनी सीमा के भीतर नए स्पेसपोर्ट तैयार कर रहा है, लेकिन अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में बैकोनूर का यह पन्ना हमेशा स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगा।








